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जबाब

 “अरे बहू, मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी! इतनी लापरवाही? इन दिनों तुमसे तो बहुत गलतियाँ हो रही हैं। कल भी बेचारा राजी भूखा ही ऑफिस चला गया, और तुम बस सोती रहीं, सीमा!”

देवकी देवी ने अपनी बहू सीमा को डांटते हुए कहा।

“अरे मां, कल से सिर में बहुत तेज़ दर्द है। कुछ समझ में ही नहीं आ रहा, ठीक से नींद भी नहीं आती। ऊपर से पेट में भी कई दिनों से अजीब सा दर्द है, बार-बार बहुत थकान सी हो जाती है। इसलिए सोचा था कि देई के घर मिठाई भेज दूं, उसे फोन करके बोल देती हूँ, बाजार से लाते समय लेते आएगा।”
सीमा ने धीमे से जवाब दिया।

“बस-बस, बहुत हो गए तुम्हारे बहाने! रोज़ की यही कहानी है। इतना दर्द था तो रहीम हलवाई को भी फोन नहीं कर सकती थी? त्योहार सर पर है, पता है न? और वह बेचारे की बेटी, क्या करेगी अब? अगर तुमसे थोड़ी मदद मांगी जाती है तो नखरे शुरू हो जाते हैं। जबसे सोनू पैदा हुआ है, तुम्हारे नखरे ही खत्म नहीं होते!”
देवकी देवी ने फिर ऊंची आवाज़ में डांटा।

“माफ कर दीजिए मां, आगे से ध्यान रखूंगी।”
सीमा ने बात और न बढ़ाने में ही भलाई समझी। आखिर सास को उसकी तकलीफ से कोई फर्क नहीं पड़ता था, और वह भी उस हालत में कुछ बोल नहीं पा रही थी। फिर भी उसने पति राजी को फोन किया और भाभी के घर मिठाई भिजवाने को कहा।

“अरे यार सीमा, आज मैं बहुत बिज़ी हूं, रात को देर से घर आऊंगा। तुम मां से कोई बहाना बना लेना, प्लीज।", राजी ने जल्दी में फोन काट दिया।

अब सीमा क्या कर सकती थी? दर्द की दवा लेकर थोड़ा आराम किया और रहीम हलवाई की दुकान पर निकल गई।

“चाचा, क्या-क्या मिठाइयाँ तैयार हैं? भाभी के घर भेजनी है, और घर के लिए भी ले जाऊंगी।”
सीमा ने रहीम से पूछा।

“बहू रानी, अभी तो बस बेसन के लड्डू ही बने हैं। ऐसा करो, कल सुबह आरती बेटी की सारी पसंदीदा मिठाइयाँ ताज़ा बनवा देंगे, और तुम्हारे घर भी भिजवा दूँगा। वैसे भी शाम हो गई है, फर्क तो नहीं पड़ेगा? वैसे भी तुम ठीक लग नहीं रही हो, आँखें भी सूजी हुई हैं। सब ठीक तो है?”
रहीम चाचा ने फिक्र जताई।

“हां चाचा, बस ऐसे ही सिर में दर्द है, त्योहार है तो आराम का टाइम नहीं मिलता।”
सीमा ने मुस्कुराकर कहा।

“कोई बात नहीं, कल सुबह करवा दूँगा। वैसे, अब मसालेदार चाय बन रही है, शाम का टाइम है, पी लो और आराम करो।”
रहीम चाचा ने सीमा को बैठने का इशारा किया और गरमागरम चाय परोस दी।

चाय का घूंट लेते ही सीमा को अपनी मां की याद आ गई, आँखों में आंसू आ गए। किसी तरह खुद को संभाला और चाय खत्म की। फिर कुछ गरम कचौड़ियाँ बनवाईं और घर लौट आई।

“माँ जी, रहीम चाचा से मिलकर आ रही हूँ। वे कह रहे हैं कि देई की पसंदीदा मिठाई कल सुबह ताज़ा बनवा देंगे और भिजवा देंगे। राजी भी आज ऑफिस से देर से आएगा, तो सोचा खुद ही जाकर रहीम चाचा से बात कर लूं। ये गरम कचौड़ियाँ भी लायी हूँ, चाय के साथ खिलाऊंगी।”
सीमा ने अपनी सास से कहा।

फिर उसने चाय बनाई, परोसी और बोली, “माँ जी, आप चाहें तो आज खिचड़ी बना देती हूँ, राजी लेट आएगा तो भारी खाना नहीं खाएगा।”

“अब क्या बोलूं, तुम्हारी ये खिचड़ी तो बहाना बन गई है! जो मन हो करो।”
देवकी देवी ने नाराज़ होकर कचौड़ी खाना शुरू कर दिया और सोनू के साथ खेलने लगीं।

सीमा ने खिचड़ी बना दी और मंदिर की सफाई में लग गई। सीमा अपने पति राजी, एक साल के बेटे सोनू और ससुर के साथ इसी घर में रहती है। कुछ दूरी पर सीमा की जेठानी आरती अपने पति और पांच साल के बेटे वंश के साथ रहती है। आरती के पति की सरकारी नौकरी है, अक्सर ट्रांसफर होता रहता है, इसलिए उनके सास-ससुर गाँव में ही रहते हैं।
बेटी घर के पास रहती है, तो जाहिर है माँ का दिल उसके लिए हर वक्त फिक्रमंद रहता है— “बिचारी अकेली कैसे सब करती होगी, बच्चा भी शरारती है, काम कितना है, थक जाती होगी...”
और जब त्योहार पर ससुर जी भी आरती के घर आने वाले हों, तो चिंता और भी बढ़ जाती है।

इधर सीमा मंदिर साफ कर रही थी, उधर सास बड़बड़ा रही थी, “बेचारा सुबह भूखा गया, रात में भी खिचड़ी ही खाता है, रानी को तो थकान ही थकान है...”
सीमा ने अपना काम खत्म किया, सोनू को खिलाया, डायपर बदला और खुद खाना खाने बैठ गई। तभी राजी भी आ गया। उसने खुद के लिए और पति के लिए खाना लगाया, माँ जी कमरे में जा चुकी थीं।

राजी ने खाने की मेज़ पर बैठते ही पूछा, “सीमा, क्या बात है, अब भी सिर में दर्द है?”
अंदर से माँ की आवाज़ आई, “हाँ हाँ, पूछ लो! बड़ी शान आ गई है अब। दिनभर भूखा रखो और फिर रानी बनने आ जाओ!”
राजी मुस्कुरा कर बोला, “छोड़ो माँ को, खाओ, फिर अंदर चलकर बात करेंगे।”
राजी ने सोनू को गोद में लेकर खिलाया, फिर दोनों खाना खाकर सो गए।
त्योहार की तैयारियों के चलते अगले कुछ दिन कब बीत गए, पता ही नहीं चला। इस बीच सीमा को पेट दर्द की शिकायत रहती, लेकिन फेस्टिवल की भाग-दौड़ में डॉक्टर भी नहीं जा पाई।

एक दिन देवकी देवी ने सुबह ही आदेश दे दिया, “सीमा, आज आरती के ससुर जी आ गए हैं, सबके लिए डिनर तैयार करके पैक कर देना, वहाँ चलना है।”

राजी ने कमरे से सुन लिया, “माँ, आज खाना होटल से मंगवा लेंगे, सीमा भी बहुत थक गई है, इतने लोगों का खाना बनाना मुश्किल है।”
देवकी देवी ने ताना मारा, “बड़ा अच्छा किया, बीवी की जी-हुज़ूरी सिखा दी! ऐसे ही दवाई क्या खिलाती हो, हमें भी बता दो, जो तुमसे न हो सका, वो सीमा कर रही है!”
सीमा चुप रही और रात में सोनू को सुलाकर खुद काम में लग गई। राजी ने भी मदद की, दोनों ने मिलकर जल्दी काम खत्म किया, चाय बनाई और साथ बैठकर पी। सीमा के चेहरे पर पहली बार थोड़ी राहत नजर आई।

अगले दिन सुबह, राजी ऑफिस चला गया, सास ने नाश्ते की लंबी लिस्ट पकड़ा दी— “ये सब बनाओ, और हाँ, बेटी के घर भी भेजना है।”
सीमा बच्चे की देखभाल और घर के काम के बीच झूलती रही। शाम तक लगभग सब तैयार था। तभी देवकी देवी बोलीं, “सीमा, ये दाल गरम कर देना, बहुत भूख लगी है, परसों आरती के ससुर जी के यहाँ भी भेजना है। सुनो राजी, खाना खा लो और गाड़ी निकालो, सब पैक करके अभी भेजना है।”

सीमा ने जल्दी-जल्दी खाना परोसा, राजी ने डिब्बे गाड़ी में रखे और सभी त्योहार में व्यस्त हो गए। इस दौरान सीमा का पेट दर्द लगातार बढ़ता गया, लेकिन उसने डॉक्टर को जाने से मना कर दिया।

एक दिन सास बोलीं, “सीमा, आरती की ससुराल वाले आए हैं, आज रात सबके लिए खाना पैक करना है, चलो साथ चलेंगे।”
राजी बोला, “माँ, होटल से खाना ले आते हैं, सीमा बहुत थक गई है।”
देवकी देवी बोलीं, “बीवी के गुलाम हो गए हो!”
सीमा चुप रही।
लेकिन अब रहीम चाचा की जलेबी और दूध असर दिखाने लगे थे।

शाम को सीमा, राजी और देवकी जी सब आरती के घर गए। सीमा ने सारा खाना किचन में रखा, चाय-नाश्ता बनाया, आरती की सास बोलीं, “बहू सीमा, कितना स्वादिष्ट खाना बनाती हो!”
आरती की सास बोलीं, “अब ये हमारी बेटी है, उसके लिए इतना करना तो फर्ज़ है।”
देवकी देवी पूरा श्रेय लेते हुए बोलीं, “मेरी बहू है, मदद तो करेगी ही!”

कुछ दिन बाद सीमा की तबियत और बिगड़ गई। राजी ने रहीम हलवाई से नाश्ता मँगवा लिया, डॉक्टर को दिखाया तो पता चला—हीमोग्लोबिन बहुत कम है, यूटरस में इन्फेक्शन है, अब कुछ दिन आराम करना जरूरी है।

एक दिन देवकी जी सुबह मंदिर से फोन कर बोलीं, “सीमा, मैं आरती के यहाँ जा रही हूँ, देर से आऊंगी।”
राजी ने सीमा को तैयार होने को कहा, सीमा की हालत खराब थी, लेकिन किसी तरह तैयार होकर निकल गई।
शाम को घर लौटे, सास उदास बैठी थीं। सीमा का दर्द अब छुपा नहीं रह पाया।

राजी बोला, “माँ, सीमा को आराम की जरूरत है। अब हमने सोनू के लिए डे-केयर ढूंढ लिया है, ताकि सीमा कुछ दिन पूरी तरह आराम कर सके। और अगर आप चाहें तो कुछ दिन आरती के पास रह आइए। डॉक्टर ने सख्त हिदायत दी है।”

देवकी जी कुछ बोल नहीं पाईं। बेटे ने पहली बार उनकी बहू का पक्ष ले लिया था।

तीन दिन बाद देवकी जी खुद राजी के कमरे में आईं, “बेटा, अब सोनू की जिम्मेदारी नहीं, पिताजी भी नहीं रहे, अब मैं खाना बनाऊँगी। सीमा की देखभाल के लिए मुझे बताना, मैं लेकर जाऊँगी।”


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