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सेवा के बदले मेवा नहीं मिलता

 रोहन फोन पर बात कर रहे थे!

वो चुपचाप खड़ी सुनती रही पति को बात करते! फिर फोन रखते हि रोहन रोने लगा! वो डर गयी फ़िर पूछा उसने तो बताया , ' बाबूजी कि तबियत ठीक नहीं है, कोरोना से शरीर पुरा टूट गया है, क्या करू समझ में नहीं आ रहा'।

सोनाली ने कहा ले आईये बाबूजी को आप यहाँ हम आप मिल के सेवा करेंगे तो ठीक हो जाएंगे!

लेकिन वो लोग तुम्हें पसंद नहीं करते गालियाँ देते है तुम उसके बाद भी कह रही हो रोहन ने अपनी आशंका जतायी!

अरे अभी ये सब मत सोचो, ले आओ! रोहन दूसरे दिन ही ले आया अपने माता पिता को और सोनाली को सब स्थिति समझा वो ऑफिस के काम मे मश गूल हो गया।

इधर सोनाली ने अपने और बच्चों के सभी जरूरी समान एक रूम मे रख लिया बाकी दोनों रूम को उसने सास और ससुर के लिए ठीक कर दिया।

उनलोगों के आने के बाद सोनाली ने कहा मा बाबूजी आपलोग अपने अपने रूम आराम कीजिए किसी चीज़ की जरूरत हो या फिर जो भी खाने की इच्छा हो मुझे बोलिऐगा !

और बाबूजी कि सेवा में लग गई!  समय समय पर दवा, गरम पानी, नास्ता, सूप, कढ़ा, खाना, जितने भी पद  परहेज़  सब करती । इधर सास के लिए अलग से सब बनाती, दोनों बच्चे की अलग से जिम्मेदारी, करते करते वो बीमार हो गई। 2 महीने हो गए थे ससुर जी अब भले चंगे हो गए थे।

एक दिन रोहन ऑफिस से जल्दी घर आ गया उसने आते हि पूछा माँ सोनाली कहाँ है तो माँ ने कहा- अपने रूम मे सो रही होगी, दिनभर तो सोते रहती है, उसने कुछ नहीं कहा, लेकिन मन मे उसके ढेर सारे सवाल आये, ऑफिस तो मैं 11 बजे निकलता हूँ, तब तक सोनाली माँ बाबूजी के सभी काम कर चुकी रहती है, रात मे भी बिना बाबूजी को भाप दिलाये सोती नहीं, रोज के 12 बजते है उसको सोने मे, इधर से देख रहा हूँ, पीली पड़ गयी है और माँ इस तरह से क्यों बोल रही है

फिर वो अपने कमरे मे आया तो देखा सोनाली बेटी को दुध पिला रही थी बेटा पास में ही बैठा खेल रहा था, बेटे ने कहा पापा आपको पता है आज मम्मा ना गिर गयी थी बेहोश होके। फिर दादी ने उठाया। ये सुन वो घबरा गया बोला सोनाली तुमने मुझे फ़ोन क्यूँ नहीं किया?? क्या हुआ है तुम्हें? चलो डॉक्टर के पास, फिर वो उसे लेके डॉक्टर के पास जाने लगा तो माँ बोली कहाँ जा रहे हो, तो रोहन ने कहा थोड़ी देर बच्चे को देखना माँ मैं इसे दिखा के लाता हूँ।

माँ ने कहा क्या हुआ बहु को, सही तो लग रही है तू भी ना बेवजह परेशान हो रहा है, रोहन कुछ बोलना चाह रहा था लेकिन सोनाली ने टोक दिया माँ सही कह रही है आप भी ना, फिर वो किचन चली गयी सबके लिए नास्ता बनाने के लिए, सास ने कहा क्यूँ इतना परेशान करती हो मेरे बेटे को?? पति है तुम्हारा, तुम्हारा और तुम्हारे बच्चे का खर्च उठाता है, शर्म नहीं आती उसे परेशान करते हुए, उसकी आँख गीली हो गयी, वो चुपचाप से वहाँ से हट गयी, दूसरे दिन ऑफिस मे छुट्टी थी तो रोहन घर में ही था। वो चुपचाप देख रहा था सबको, दोपहर मे माँ आयी बोलने बेटा सुनो ना मेरा आँख के लेंस मे कुछ दिक्कत हो रही है मुझे दिखा दो, बाबूजी को भी, रोहन बोला ठीक हैं कल का नंबर लगा देता हूँ, फिर उसने माँ से पूछा - तुम्हें या बाबूजी को कोई दिक्कत हो रही है यहाँ ? तो माँ ने कहा ना रे बेटा ।

तभी दो ऑनलाइन पार्सल आया, सोनाली ने पैसेँ दे के पार्सल लिया, माँ बाबूजी वही सामने ही बैठे थे बोले खोलो तो क्या है इसमे एक में बाबूजी के लिए ब्रांडेड जूते थे सैर के लिए बाबूजी को उसने दे दिया फिर माँ ने कहा वो दूसरा क्या है उसने दिखा दिया बच्चे के लिए गरम कपड़े थे लोकल के दुकान की सस्ती सी, माँ बाबूजी दोनों एक साथ बोल पड़े, ये रोहन भी ना बहुत पैसे बर्बाद करता है बच्चे पे इतना कौन खर्च करता है इतने पैसे में तो दो समय का खाना हो जाता। 'लेकिन माँ बच्चे के पास नहीं है,-सोनाली घुटती हुई बोली! माँ ने कहा नहीं है तो रोड पे मिलते है 100 में वो ले लेता।

सोनाली ने कहना चाहा बाबूजी के जूते की कीमत में तो पुरा महीने का रासन आ जाएगा लेकिन नहीं बोली वो , क्यों की आगे क्या होगा ये अछे से पता था उसने चुप रहने में हि भलाई समझी।

शाम मे रोहन ने सोनाली को कहा चलो थोड़ा बाहर घूमते है बच्चे को भी तैयार कर लो, सोनाली ने कहा लेकिन माँ बाबूजी घूम के अभी आएंगे उनके लिए कुछ नास्ता बना लेती हूँ, । रोहन ने कहा अरे जल्दी चले आएंगे चलो ना।

रोहन हॉस्पिटल लेके गया उसे, वहाँ पहले से डॉक्टर इंतज़ार कर रही थी, उसने उसे सोनाली का चेकअप किया, 103.ज्वार था तभी उसे, शरीर गर्म नहीं था, रक्त चाप बहुत कम था,

डॉक्टर बोली- कुछ टेस्ट है वो करा लीजिए, फ़िलहाल आराम करो, खाना ठीक से खाओ, ज्वार होने पे दवा लेना, फिर दो दिन के बाद मिलो।

घर आ गए सब, सोनाली पहले आयी घर बच्चे रोहन के साथ खेलने लगे बाहर।

घर आयी तो गेट खुला हुआ था, बाबूजी के रूम से आवाज़ आ रही थी, माँ बोल रही थी बाबूजी को, रोहन को देख रहे है इस औरत के चक्कर में कितना पैसा बरबाद कर रहा है, कितने   आराम देके रखा है इसे। बाबूजी बोले हाँ और ये हरामजादी नाटक कितना करती है हमलोगों का सेवा करने का।क्या करती है खाना बना देती है और गरम पानी दे देती है इतना ही ना, उसके लिए रोहन उसका खर्च भी तो उठाता है, माँ बोली सही कह रहे है इस  हरसंख कि वजह से आज मेरी बेटी ये सुख नहीं भोग रही, मेरी बेटी को यहाँ रहना चाहिए था, कुछ होता ही नहीं है इसे, कहा है भगवान पता नहीं,

ये सब सुनके सोनाली धक् से रह गयी?

और अपने रूम में आके खूब रो रही थी तभी उसने सुना रोहन और बच्चे की आवाज़ , वो अपना चेहरा साफ़ कर उठी।

रोहन दूसरे दिन माँ बाबूजी को  दिखा के लाया, सब ठीक था, माँ बाबूजी समान समेट रहे थे तो सोनाली ने देखा तो अचरज से पूछी, ये समान क्यू समेट रहे है तो रोहन ने जबाब दिया, अब माँ बाबूजी को घर कि याद आ रही है जाने दो फ़िर आएंगे। फिर पास आके उसके कानो मे कहा कल तुमने जो सुना वो मैंने भी सुना,

फिर दूसरे दिन रोहन माँ बाबूजी को घर पहुचा आया!


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