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धब्बे

 सायंकाल कालेज से घर आने पर लता आज सदा की भाँति माँ को पुकारने के बजाय कमरे में बैग पटक कर सीधे स्नानघर में घुस गई। अच्छे से स्नानकर उसने स्वयं को बड़ी तसल्ली से पोछा और फिर सुगन्धित टेलकम छिड़क कर कपड़े बदल लिए।

कपड़े तो खैर वह प्रतिदिन ही बदलती थी अलबत्ता सायंकाल स्नान करना उसकी आदत में न था।

माँ रसोई में चाय बनाते हुए सोच रही थी कि आज बिटिया की दिनचर्या में बदलाव कैसा?  दोपहर में ही मयंक ने आकर कहा था, "मम्मी, अब लता का कालेज जाना बंद करवा दीजिये।"

"क्यों भला?"

"मम्मी, आज मैं उसके कालेज गया था। वहाँ चुनाव हो रहे हैं और मेरा एक मित्र भी प्रत्याशी है। पता किया तो जानकारी हुई कि लता अक्सर सुनील के साथ गायब रहती है कॉलेज से। आज भी नहीं थी वह वहाँ पर।"

"राम राम! तू अपनी बहन पर ही लांछन लगा रहा है। छि:.."

"ठीक है, जिसदिन कुछ गड़बड़ हो जाय तब अपना सिर माथा धुन लेना।"  पैर पटकता हुआ मयंक बाहर निकल गया था।

चाय के प्याले लेकर सीढियाँ चढ़ते हुए वह सोच रही थी कि क्या लता सच में सुनील के साथ बाहर घूमने गयी थी? कहाँ गयी होगी? कितने देर अकेले रहे होंगे? इसी उधेड़बुन के साथ वह लता के कमरे में जा पहुँची।

लता बालों में कंघी कर रही थी। क्षण भर में जूड़ा बांध कर वह पलटी और एक प्याला माँ को देते हुए दूसरा स्वयं उठा लिया और चाय सिप करने लगी।

"आज कालेज में क्या पढ़ाया गया लता?" माँ ने पूछा।

"कुछ नहीं माँ, आजकल चुनाव हैं न इसलिए सब ठंडा पड़ा हुआ है।"

"चुनाव में तुम लोगों का क्या काम?"

"प्रत्याशियों का प्रचार करना पड़ता है मम्मी।"

"क्या कालेज के बाहर भी जाना पड़ता है?"

"हाँ, जो छात्र इस समय कॉलेज में नहीं आ रहे हैं और नज़दीक ही रहते हैं तो उनके घर जाकर कन्वेन्स करना पड़ता है। मम्मी, मैं तो सुनील के साथ ही रहती हूं।"

"आज भी बाहर जाना पड़ा था क्या?"

"नहीं, आज तो कॉलेज में ही रही हूँ मैं।"

इस उत्तर पर माँ ने लता की ओर देखा। लता ने दृष्टि झुका ली।

माँ बेटी के इस झूठ से डर गई।

लता ने जैसे तैसे  चाय समाप्त की और एक पुस्तक उठाकर छत पर चली गयी।

माँ कितनी ही देर वहाँ मूर्ति बनी बैठी रही। वह सोचने लगी कि कैसे उसने लता की हर इच्छा को मुँह से निकलते ही पूरा किया था। यदि कभी मना भी किया तो उसके पापा ने उसे उपलब्ध करा दिया। पहनने, खाने पीने और खेलने की सामग्री इशारे पर मिलते रहे हैं लता को।

लता दो वर्ष पहले ही तो रजस्वला होकर बालिका से स्त्री में परिवर्तित हुई थी। इतनी जल्दी देह में परिवर्तन, चेहरे में निखार और आँखों की सफेद पुतलियों में लाल लाल डोरे दिखने लगे थे। भरे भरे गाल, रक्ताभ अधर और शरीर की कसावट... कुल मिला कर उसका यौवन अब अभिसार का आह्वान करता हुआ दिखने लगा था। युवा हो रही बेटी पर माँ को पूरा विश्वास था।

और आज ... आज वह विश्वास दरक सा रहा है। आशंकावश वह सोच रही थी कि उसकी बेटी की मनोवृत्तियों कुत्सित भावना का जन्म भी कैसे हुआ? 

चाय के प्याले उठाकर धोने के लिए रखे और फिर स्नानघर में पड़े कपड़ों को धोने चली आईं। सामने हैंगर में लता के अंतःवस्त्र और सलवार कुर्ता टँगे हुए थे। न जाने क्यों उन्होंने उसके अंतःवस्त्र को उलट पलट कर देखा। उसमें खून के कुछ धब्बों के साथ बहुत से ऐसे धब्बे भी थे जिन्हें सभी विवाहिता स्त्रियाँ पहचानती हैं। वह स्वयं भी विवाह के बाद अपने अंतःवस्त्र में ऐसे धब्बे देखती आयी हैं।

एकाएक माँ की आँखों के सामने अँधेरा छा गया। उनके हृदय में आघात लगा जिसे वह सहन करने में असमर्थ हो गईं। उन्हें स्वप्न में भी विश्वास नहीं था कि उनकी बिटिया अपने यौवन के साथ ऐसा व्यवहार करेगी। वह सलोनापन, वह कौमार्य, वह अक्षत यौवना, वह पवित्रता,  वह सतीत्व, वह गौरवयुक्त आचरण और अपनी बेटी का सर्वस्व एक पल में तिरोहित हो गया। सहसा लता अपनी ही माँ की आँखों में अस्तित्वहीन हो गयी। जैसे उन्होंने उसे जन्म ही न दिया हो। जैसे अठारह वर्ष उसके साथ बिताए ही न हों। यह तो अच्छा हुआ कि उनके हाथों में स्नानघर का दरवाजा आ गया अन्यथा वहीं धड़ाम से गिर पड़ती।

अपने मुँह पर छींटे मार कर स्वयं को चैतन्य किया और रोते रोते कपड़े धोने बैठ गईं। सबसे पहले लता के अंतःवस्त्र को रगड़ रगड़ कर धोने लगी जैसे कि बेटी की अपवित्रता को माँ के आँसुओं से धोकर पवित्र कर देना चाहती थी। यह भी सोचती जा रही थी कि रात में इस बात को वह लता के पापा से अवश्य शेयर करेगी और कुछ रोकटोक की व्यवस्था भी।

लता के रजस्वला होने की अगली तिथि तक माँ की स्थिति दयनीय ही रहने वाली थी। इस सब से बेखर लता छत पर बैठी स्नानघर से माँ द्वारा कपड़ों पर लकड़ी का पटका चलाने की ध्वनि सुन रही थी।


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