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हक

 "क्या पूरी ज़िंदगी यहाँ बिताने के बाद भी मुझे मेरे ससुराल में इतना भी हक नहीं है कि मैं अपने बीमार पिता को कुछ दिन यहाँ रख सकूं और उनकी सेवा कर सकूं?" प्रियंका रोते हुए अपने पति संदीप से कह रही थी।

"अरे प्रियंका, पर हुआ क्या है? बाबूजी को क्या हुआ और यह तुम क्या कह रही हो, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है," संदीप ने हैरान होकर पूछा।

"आपको कैसे पता रहेगा जी? आप सुबह 8 बजे दुकान जाते हैं और रात के 10 बजे घर लौटते हैं। ऐसे में आपको कैसे पता चलेगा कि दिनभर आपके पीछे घर पर क्या हो रहा है? और ऊपर से माजी चाहती ही कहाँ हैं कि उनका बेटा अपने ससुराल का हाल-समाचार जाने। इसी बात का तो दुख है कि आप घर में रहते हुए भी घर की बातों से कहीं दूर हैं।"

"क्या पहेलियां बुझा रही हो प्रियंका? जो भी है, साफ-साफ कहो," संदीप ने दूसरी तरफ देखते हुए कहा।

फिर प्रियंका सारी बात बताती है, "अभी कुछ दिनों से बाबूजी का शुगर लेवल काफी बढ़ गया था और तबीयत खराब चल रही थी। गाँव में दिखाया गया, पर बीमारी ठीक होने की बजाय बढ़ती ही जा रही थी। इसलिए मैंने बड़े भैया से कहा कि बाबूजी को लेकर यहाँ चले आएं ताकि किसी अच्छे डॉक्टर से इलाज हो सके। मेरी बात मानकर बड़े भैया कल रात की ट्रेन पकड़कर आज सुबह-सुबह आपके जाने के बाद बाबूजी को लेकर आ गए। डॉक्टर ने एक हफ्ते की दवा लिख दी और इसी शहर में रहने की सलाह दी। इसलिए मैं बाबूजी के रहने की व्यवस्था देवर जी के बंद कमरे में कर रही थी। पर जैसे ही माजी को मेरे बाबूजी के यहाँ रुकने की बात पता चली, उन्हें यह बर्दाश्त नहीं हुआ और वह मुझसे झगड़ने लगीं। कहने लगीं कि 'मैं इस घर की मालकिन हूँ और मेरी मर्जी के बिना कोई इस घर में पनाह नहीं ले सकता। ऊपर से बहू के मायके वाले तो बिल्कुल नहीं। अगर एक बार बेटी के यहाँ रहने की आदत हो गई तो बार-बार आने की लत लग जाएगी।' इतना कहने के साथ ही उन्होंने मुझे बहुत खरी-खोटी सुनाई। फिर कहने लगीं, 'मेरी मर्जी के बिना मेरे बेटे के कमरे में अपने बाप को ठहराने वाली तुम कौन होती हो? अपने बाप के घर से लाई थी क्या ये मकान, जो किसी को भी यहाँ आश्रय दे रही हो? यह मेरा घर है, 'निर्मला निवास' है, कोई धर्मशाला नहीं जो अपनी मनमर्जी करोगी!'"

माँजी की चीखती आवाज़ सीधे बाबूजी और बड़े भैया के कानों में पड़ी और वे अपना सामान बाँध ही रहे थे कि माँजी ने बाबूजी को भला-बुरा कहना शुरू कर दिया, "शर्म नहीं आती है बेटी के घर बीमारी का बहाना लेकर रहने में। यह तुम्हारी बेटी का ससुराल है, कोई सराय नहीं।"

माँजी की ऐसी बातें सुनकर बाबूजी सन्न रह गए। उन्हें लग रहा था जैसे नस काटो तो खून नहीं निकलेगा, कितना बड़ा लांछन लगा दिया गया। अच्छा हुआ जो भैया तुरंत बाबूजी को अस्पताल के पास एक कमरे में ठहरा आए। अगर यहाँ रहते तो जीते जी मर जाते और बीमारी ठीक होने की बजाय बढ़ जाती।"

कहते-कहते प्रियंका रोने लगती है। संदीप उसे पानी देता है और कहता है, "पहले तुम शांत हो जाओ प्रियंका, फिर मैं माजी से बात करता हूँ।"

"इतनी बड़ी बात हो गई और मैं शांत हो जाऊँ? नहीं जी, बिल्कुल नहीं! अब तो फैसला होकर रहेगा। अरे, मैंने अपनी सारी जवानी आपके माई-बाबूजी की सेवा में बिता दी, बदले में कुछ नहीं माँगा। मुझे न तो उनके पैसे चाहिए थे, न ही कोई संपत्ति—बस मुझे मेरा और मेरे मायके वालों का सम्मान चाहिए था, पर यह चीज़ मुझे आज तक नहीं मिली।"

कहते-कहते प्रियंका का गला भर आता है। फिर कुछ देर शांत होकर कहती है, "आज आप मुझे ये बताइए कि क्या ये घर सिर्फ माई-बाबूजी का है? हमारा इस पर कोई हक नहीं? हमने अपनी शादी के बीस साल इस घर को सँवारने में दिए, फिर भी इस घर पर मेरा कोई हक नहीं? अगर ऐसा है तो हमारा घर कौन-सा है जिसे मैं हक से अपना कह सकूं? अगर बहू के लिए घर की हर जिम्मेदारी है, तो फिर घर पर हक क्यों नहीं? क्यों हमें इस हक से वंचित रखा जाता है, संदीप? क्यों हम अपने रिश्तेदारों को यहाँ नहीं बुला सकते? अगर ऐसा है तो मुझे भी मेरा घर चाहिए जिसे मैं हक से अपना कह सकूं!"

प्रियंका बार-बार रुकती है, पर आज वह चुप नहीं रहना चाहती थी। "अरे, बाबूजी कौन-सा शौक से आए थे अपनी बेटी के यहाँ रहने! वो तो मजबूरी थी, इसलिए आए। अगर उनका बस चलता तो वो बेटी के घर का पानी तक न पीते। और शुरू से वही तो करते आए हैं, क्योंकि उन्हें पता था माँजी का स्वभाव। वो तो मेरे ज़िद करने पर आए थे और मेरी वजह से ही उन्हें ये बेइज्जती सहनी पड़ी।"

आज माँजी का व्यवहार संदीप की आँखों में भी खटक गया। वह तुरंत प्रियंका का हाथ पकड़कर अपनी माँ के कमरे में गया, जहाँ निर्मला जी अपने पति महेश जी को आज सुबह हुई घटना की चर्चा कर रही थीं, जिसमें वह प्रियंका के परिवार वालों पर झूठा इल्जाम लगा रही थीं—

"सुनिए जी, ये जो बहू के परिवार वाले हैं, सब के सब भिखारी हैं! देखिए तो, कैसे दो पैसे बचाने के लिए बीमारी का बहाना बनाकर हमारे घर चले आए। शर्म भी नहीं आती है ऐसे बिन बुलाए भिखारियों को!"

इतना सुनकर संदीप पीछे से चिल्लाया, "माँ, आपको शर्म आनी चाहिए, अपनी बहू के बीमार पिता के बारे में ऐसा कहते हुए! आप ऐसा कैसे कह सकती हैं, वो भी बीमार आदमी के लिए? शर्म आती है मुझे आपकी ऐसी छोटी सोच पर! माँ, वो प्रियंका के जन्मदाता हैं, कुछ तो लिहाज किया होता उनका। और वे अपनी मर्जी से यहाँ नहीं आए थे, बल्कि प्रियंका ने बुलाया था। अगर यहाँ रुक भी जाते तो कौन सा अनर्थ हो जाता! माँ, आप भी तो अपनी बेटी के यहाँ जाती हैं न, तो फिर प्रियंका के बाबूजी क्यों नहीं आ सकते? अगर आपकी बेटी के ससुराल में आपका ऐसा अपमान किया जाता तो आपको कैसा लगता, माँ? कुछ तो रिश्तों का मान रखिए। और अगर प्रियंका के बाबूजी अपनी बीमारी का इलाज यहाँ रहकर कराते तो इसमें क्या बुराई थी, आखिर यह घर उनकी बेटी का भी तो है!"

"खबरदार जो ऐसा कहा, संदीप! ये घर मेरा है, और इस घर में किसे रखना है, किसे नहीं—ये हम और तुम्हारी मर्जी से तय करेंगे, बहू या तुम नहीं!" रौब से चिल्लाते हुए महेश जी बोले।

"ठीक है, बाबूजी, यदि ये घर आपका है तो अब हम इस घर में एक पल भी नहीं रुकेंगे! जहाँ इंसानियत की कोई जगह न हो, जहाँ घमंड और रौब का बोलबाला हो, उस घर में मैं और प्रियंका अब नहीं रह सकते। हम कल ही इस घर को छोड़कर चले जाएँगे।" संदीप कहकर जाने लगा, तभी निर्मला जी उसका हाथ पकड़ लेती हैं और कहती हैं, "इतनी छोटी सी बात के लिए तू अपने माँ-बाप को छोड़कर चला जाएगा? तू चला जाएगा तो हम कैसे रहेंगे बेटा? मुझे माफ कर दे बेटा, पर ऐसे घर छोड़कर मत जा। चाहिए तो तू अभी के अभी बहू के बाबूजी को बुला ला, मैं अपने हाथों से उनका कमरा ठीक कर दूँगी, पर घर छोड़कर जाने की बात मत कर!"

खुद के भविष्य की चिंता और श्रवण कुमार जैसे बेटे और प्रियंका जैसी आज्ञाकारी बहू के दूर जाने के डर से, निर्मला जी पिघल जाती हैं।

"अब बात समझ में आई माँजी? यहाँ 24 घंटे आप लोगों की सेवा में हाजिर रहती हूँ, इसलिए हमारी कद्र नहीं है आप लोगों की नजरों में! 20 साल हो गए, माँजी, इस घर में मुझे आए हुए, पर आज भी मैं अपने किसी परिवार को यहाँ नहीं बुला सकी और न ही बुलाना चाहती थी, क्योंकि मुझे पता है आप लोगों का नेचर। पर इस बार तो आप हद ही पार कर गईं—मेरे बीमार पिता की आँखों में आँसू दे गईं! क्या गलती थी उनकी, यही न कि वो एक बेटी के बाप हैं और बेटी के कहने पर यहाँ चले आए। पर मेरी भी एक बात सुन लीजिए, मैं भले इस घर में रहूँ या न रहूँ, पर आप आगे से मुझसे कोई उम्मीद मत रखिएगा, क्योंकि आज जो आपने किया है, उसे मैं कभी नहीं भूल सकती, माँजी!" ऐसा कहकर प्रियंका अपने कमरे में चली जाती है और संदीप भी प्रियंका के पीछे-पीछे चला जाता है।

सुबह जब प्रियंका अपना सामान बाँध रही थी, तो संदीप ने आवाज़ लगाई, "प्रियंका, जल्दी बाहर आओ, देखो कौन आया है!"

प्रियंका भागती हुई आती है और देखती है—उसके बाबूजी और बड़े भैया महेश जी और निर्मला जी के साथ दरवाजे पर खड़े हैं। प्रियंका भागकर बाबूजी को बैठाती है और प्रश्नवाचक दृष्टि से बड़े भैया को देखती है। तब बड़े भैया कहते हैं, "सुबह-सुबह मैन जी और बाबूजी हमारे कमरे में आए, जहाँ हम लोग रुके थे और काफी देर मनाने लगे, अपने किए की माफी माँगने लगे, तो हमें आना ही पड़ा।"

"अरे बहू, अब खड़ी ही रहोगी या अपने बाबूजी को अपने कमरे में ले जाओगी? और हाँ, इनका पूरा ख्याल रखना, इन्हें किसी भी चीज़ की कोई कमी नहीं होनी चाहिए!"
संदीप बेटा, ऐसा कहते हुए महेश जी अपने कमरे में चले जाते हैं। फिर निर्मला जी कहती हैं, "समधी जी, जब तक आप ठीक नहीं हो जाते, तब तक यहीं आराम से रहिए, आखिर ये आपकी बेटी का घर है!"


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