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दुर्भाग्य

 चार बेटों की मां है, तभी तो इतराती है, कभी सीधे मुंह बात ही नहीं करती। सुना है,रमा के ,दोनों बेटे विदेश में रच-बस गए हैं। कल ही रमा छत पर खड़ी थी, कह रही थी – तीसरा बेटा भी जल्द ही विदेश जाने वाला है और सबसे छोटे बेटे की सरकारी नौकरी लग गई है। सच, बड़े भाग्य वाली है रमा – पांचों उंगलियां घी में और सिर कढ़ाई में। और हो भी क्यों न, बड़े दुख सहकर बेचारी ने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया है। यह सब तो रमा की मेहनत का फल है, जो उसके बच्चे आज इतनी ऊंचाइयों पर हैं। सही है, शायद ही मोहल्ले का कोई व्यक्ति हो जो रमा की प्रशंसा ना करता हो।

पति के चल बसने के बाद रमा पर तो जैसे दुख का पहाड़ ही टूट पड़ा था। तब अभी उम्र ही क्या थी रमा की, ऊपर से चार छोटे बच्चों का साथ। ईश्वर की कृपा इतनी रही कि पति शासकीय कर्मचारी थे, बड़ी मशक्कत के बाद रमा को अनुकंपा से नौकरी मिल सकी। अकेले चार बच्चों को संभालना और नौकरी करना, ऊपर से परिवार वालों का कोई साथ नहीं। इस सब के बाद भी रमा ने हिम्मत नहीं हारी और आत्मा की मेहनत रंग लाई। एक औरत होकर इतना साहस!

एक समय ऐसा भी था जब यही बोलने वाले रमा के बारे में तरह-तरह की बातें कहते नहीं थकते थे – “सुरेश को गुज़रे दस दिन भी नहीं हुए, अभी उम्र ही क्या है बेचारे की, देखना, दूसरी शादी करेगी। हां, सही है, चार बच्चों को अकेले पालना भी तो कितना कठिन है। कौन समझेगा चार बच्चों की मां को!” जितने मुंह, उतनी बातें।

रमा के हृदय की वेदना तो वही समझ सकता था जिसने यह पीड़ा सही हो। पति से ही सारे रिश्ते होते हैं, पति नहीं तो कौन पूछता है? इस हिसाब की कसर भी रमा की देवरानी कामिनी ने पूरी कर दी। एक दिन वह भी रमा से बोल पड़ी – “दीदी, हमारे भी दो बच्चे हैं, दोनों बच्चों की फीस, भैया की तो सरकारी नौकरी थी, लेकिन इनके तो प्राइवेट काम है – चला तो चला, नहीं तो नहीं। दीदी, मेरी बातों का बुरा नहीं मानना, आप तो मेरी बड़ी बहन जैसी हो।” लेकिन रमा मन ही मन सब समझ गई, आंखों में आंसू भरकर कमरे की ओर जाती हुई बस खुद से ही सवाल कर रही थी। कल तक सुरेश जीवित थे, सारी दुनिया अपनी लगती थी। सुरेश के जाते ही रमा जीवन के कठिन दौर से गुजर रही थी।

आंखों में आंसू भी आते तो रमा को देखकर उसके बच्चे रोने लगते। रमा की हालत तो ऐसी थी जैसे शरीर से प्राण निकल गए हों और सांस चल रही हो। घर पर लोगों का आना-जाना लगा रहता, जितने लोग, उतनी बातें। सुरेश के ऑफिस के मित्रों के सहयोग और मशक्कत के बाद रमा को नौकरी मिल गई। नौकरी लगते ही घरवालों के तेवर तो बदल गए, लेकिन इन सब के बाद भी रमा के संघर्ष कहां कम होने वाले थे। चार छोटे बच्चों को किसके सहारे छोड़ती, देवरानी पहले से ही रमा के मन में खटास भरती थी।

परीक्षा तो एक-दो दिन की होती है, लेकिन कई बरसों का संघर्ष रमा को वजीर-सा मजबूत बना गया। अपने काम से काम रखना, न ज्यादा बोलना, न बातचीत। 35 साल की रमा आज 60 वर्ष की हो चुकी थी। मीठी चमकती काली आंखों पर चढ़ा मोटा चश्मा, जीवन के हर दृश्य को स्पष्ट करता था, लेकिन फुर्ती और आत्मनिर्भरता आज भी वैसी ही जैसी 35 साल पहले थी। कुर्सी पर बैठी रमा राहत की सांस ले रही थी – दोनों बड़े बेटे विदेश में रच-बस गए और तीसरा बेटा भी जल्द ही विदेश जाने वाला है, सबसे छोटे बेटे की भी रमा के रिटायरमेंट से पहले नौकरी लग गई। रमा के बेटे अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ रहे थे।

समय इतना विपरीत भी हो सकता है, यह कौन जान सकता है। रमा को अपने जीवन का एक विपरीत दौर देखना बाकी था। वृद्धावस्था की ओर तीव्रता से बढ़ते जीवन में ऐसा भी मोड़ आएगा, शायद रमा ने भी नहीं सोचा होगा।

सुबह का समय था, रमा दैनिक कार्यों में ही लगी थी। बाथरूम में नहाने का पानी रखकर रमा ने दरवाजा लगाया ही था कि जोर से आवाज आई। आवाज सुनकर देवरानी की बेटी दौड़ी आई, “ताई जी, ताई जी, क्या हुआ?” रमा चित्त हो चुकी थी। मीना जैसे-तैसे रमा को बाथरूम से बाहर निकाली। डाक्टरी जांच के बाद पता चला – रमा को लकवा मार गया है। यह खबर सुनकर तो जैसे घर में सन्नाटा ही पसर गया।

जब तक आदमी के पास पैसा है और उसके हाथ-पांव चल रहे हैं, तब तक दुनिया अपनी होती है। इनमें से एक भी चीज़ पीछे छूटी तो वही स्थिति रमा के साथ थी। देवरानी मन मसोसकर रमा की देखभाल कर रही थी, लेकिन बात-बात पर पति को ताना देती – “सुनो जी, मुझसे ये सारे काम नहीं होते। आप अपने भतीजों को फोन लगाकर कह दो कि चार-चार नौकर रख लें, मैं कोई नौकर नहीं हूं!”

बिस्तर पर पड़ी रमा कुछ बोल तो नहीं सकती थी, आंसू भरी मां की नजरें अपने बेटों को देखने के लिए तरस रही थीं। रमा के इशारे पर अपनी देवरानी कामिनी से पूछा, “बच्चे कब आ रहे हैं?” कामिनी जैसे इसी सवाल की प्रतीक्षा कर रही थी, “पड़ाव बच्चों को विदेश भेज दो, अब यहां हम घर के काम करें या आपको देखें! पैसा भेज दिया, बस, काम कौन करेगा सारा – हमारा तो दो वक्त का आराम भी बेकार हो गया।”

रमा की देखभाल के लिए बेटों ने नौकर-चाकर, डॉक्टर की व्यवस्था तो करा दी थी, लेकिन मां अपने बच्चों का प्यार भी चाहती है, बेटा पास बैठे, बुढ़ापे में मां के सुख-दुख को जाने। फिजियोथेरेपिस्ट की सहायता से रमा चेयर पर बैठी, थोड़ा-बहुत हाथ-पांव तो हिला लेती, लेकिन मन ही मन अपनी फूटी किस्मत पर आंसू बहा रही थी – जिसे सभी भाग्यवाली कहते नहीं थकते थे, वहीं भाग्यवाली व्हील चेयर पर बैठी-बैठी अपने ही भाग्य को कोस रही थी।


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