"मम्मी जी आज चीकू का जन्म दिन है. भाईया ने बुलाया है आप सब को भी न्यौता दिया है." कुमुद सास कोयल जी से बोली.
"नही बहू तुम और रजत ही हो आना.मैं और रमा घर पर ही रहेगें."
"जी मम्मी जी.मैं सब्जी बना जाती हूँ और आटा लगा देती हूँ.आप दोनों को जब भूख हो रमा रोटियां सेंक देगी."
"क्या माँ आपने भाभी को क्यों जाने दिया. उनके मायके में हमेशा कुछ न कुछ होता रहता है.आप भी उन्हें कभी मना नही करती और भाभी को तो बस मायके जाने का बहाना चाहिए होता है."कुमुद के जाने के बाद गुस्से में रमा बोली.
"तो क्या हुआ बेटा जाने दे उसे.उसके जाने से तुझे परेशानी क्यों हो रही है."
"वो चली जाती है सारा काम मुझे करना पड़ता है."
"कौन सा काम करती है तू.वो सारे काम करके जाती हैं.बस रोटी ही तो बनानी है."
"फिर भी भाभी का हर दूसरे तीसरे महीने मायके जाना क्या सही है.ऐसे तो वो हमें कभी अपना ही नही पायेगी."
कुमुद की शादी को साल भर ही हुआ था. उसके मायके में मम्मी पापा, तीन बड़े भाई, भाभी और उनके छ बच्चे थे. क्योंकि परिवार बड़ा था इसलिए हर दूसरे तीसरे महीने उसके मायके में कोई न कोई फंक्शन होता रहता था कभी किसी का जन्मदिन तो कभी शादी की सालगिरह. कुमुद का मायका ससुराल से दस बारह किलोमीटर ही दूर था.इसलिए कुमुद भी बुलावे पर अक्सर चली जाती.कोयल जी को भी कुमुद के मायके जाने से कोई परेशानी नही थी वो तो कुमुद को खुशी खुशी भेज देती. बस रमा ही थी जो कुमुद के मायके जाने से चिढ़ जाती थी.क्योंकि कुमुद के न रहने पर घर का काम उसे करना पड़ता था.
"तो क्या उसे मायके से दूर करके वो हमें अपना लेगी."
"मम्मी आप बहु सीधी हो.सलोनी की मम्मी को देखो वो उसकी भाभी को मायके तो क्या आस पास घूमने भी नही जाने देती."
"बेटा दूसरे अपनी बहू के साथ क्या करते है मुझे उससे कोई मतलब नही.लेकिन मैं अपनी बहू पर किसी प्रकार की बंदिशें नही लगाना चाहती. तू आज नही समझेगी.कल जब तेरी शादी हो जायेगी तब समझेगी. बेटी को कितना ही प्यार करने वाला ससुराल क्यों न मिल जाये पर मायके का मोह कभी कम नही होता.मायके जा कुछ देर के लिए ही सही पर हम अपनी परेशानी, जिम्मेदारी से थोड़ी देर के लिए आजाद हो जाते है. तेरी दादी मुझे मायके नही भेजती थी कहती थी मुझसे अब घर का काम नही होता.बस कभी शादी ब्याह में ही जा पाती थी. माँ बाबा की बीमारी पर खैर खबर लेने या अपने भाई,भतीजों के जन्मदिन, सालगिरह पर कभी गई ही नही. मैं नही चाहती मायके से दूर रहने की जो बैचेनी मैंनें महसूस की है मेरी बहू भी करें." कहते हुए कोयल जी की आंखें नम हो गई."बेटा बीते कल से सबक ले कर हम अपना आज और आने वाला कल संवार सकते है.तुझे भी पराये घर जाना है तब शायद तू मायके का मोह समझ पाये. आज हम है कल नही रहेगें तब तेरी भाभी ही हमारी जगह लेगी. भाभी के साथ प्यार से रहेगी तो कभी मायके के लिए नही तरसेगी."
"सॉरी मम्मी अब कभी भाभी के मायके जाने पर नाराज नही होगी.मम्मी मैं अभी आई."
भाभी.. भाभी.. आप तैयार हो जाईये. खाना मैं बन लूंगी." रसोई की ओर जाती हुई रमा बोली.कोयल जी खुश थी कि उनकी बेटी को समय रहते उनकी बात समझ में आ गई .
शशि ध्यानी
दिल्ली
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