आज भी खाने में वही खिचड़ी। बहू मोनिका पर आज फिर से सासू मंजू जी बरस पड़ीं।
"आज सुबह से ही सिर बहुत दुख रहा है, काम नहीं कर पा रही थी, तो सोचा सबके लिए खिचड़ी ही बना देती हूँ," मोनिका ने बहुत ही धीमे स्वर में अपनी सास मंजू जी से कहा।
"हाँ-हाँ, मुझे सब पता है तेरे नाटक, ये सब तेरे काम से बचने के तरीके हैं," मंजू जी ने फिर मोनिका को ताना मारा।
मोनिका को तो अब आदत-सी पड़ गई थी रोज़ के ताने सुनने की। उसको शुरू से ही जवाब देना और फालतू की बहस करना अच्छा नहीं लगता था।
मोनिका और शरद का विवाह कुछ चार साल पहले ही हुआ था। परिवार में तीन लोग और उनका एक बेटा सोनू था, जो दो साल का था। शरद के पिता बचपन में ही गुजर गए थे।
शरद भी अपनी माँ के ताने मारने की आदत से अच्छी तरह वाकिफ था, पर वह हमेशा मोनिका को ही चुप रहने को बोलता था। जब भी मोनिका मंजू जी के बारे में कुछ भी बोलती, तो शरद बोलता, "माँ की बातों को नजरअंदाज करो।"
मोनिका भी सोचती, "ठीक ही है, शरद तो हमेशा ही सहयोग करते हैं।"
"अरे मोनिका, तुम कोई नौकरी क्यों नहीं कर लेती? अब तो सोनू को भी माँ देख लिया करेगी," एक दिन शरद ने मोनिका से पूछा, क्योंकि मोनिका को पढ़ना और पढ़ाना बहुत अच्छा लगता था।
सोनू के जन्म के बाद से वह खुद को समय नहीं दे पा रही थी।
"यह बुढ़ापे में अब बच्चा नहीं संभलता मुझसे," मंजू जी ने तुरंत कहा।
मोनिका सिर्फ 5 घंटे वाली ही नौकरी देख रही थी, सोनू को दिन में ही तो देखना है।
मोनिका उसे तैयार करके 10 बजे निकल जाती थी और शाम को रोज़ 3 बजे तक घर भी आ जाती थी।
शुरू में तो सब कुछ अच्छा चलता रहा, पर अब मंजू जी को मोनिका पर और गुस्सा आने लगा, क्योंकि मंजू जी का दिन में सोनू के कारण अपनी सहेलियों से मिलना जो बंद हो गया था।
पहले रोज़ दोपहर में सहेलियों के साथ खूब गपशप चलती रहती थी। अब तो मोनिका को हर बात में ताने सुनने पड़ते थे।
साथ में घर आकर सोनू की देखभाल, रात का खाना बनाना, स्कूल की ढेर सारी कॉपियाँ चेक करना, और भी घर के काम—मोनिका ज़्यादा थक जाया करती थी।
एक दिन स्कूल में ज़्यादा काम होने के कारण मोनिका को आने में थोड़ी देर हो गई। जैसे ही मोनिका घर आई, तो देखकर हैरान रह गई—मंजू जी तो फोन पर अपनी सहेलियों से बातें कर रही थीं और एक तरफ सोनू बहुत तेज़ रो रहा था।
"माँजी, सोनू क्यों रो रहा है?" मोनिका ने बहुत ही धीमे स्वर में मंजू जी से पूछा।
"तुम तो 3 बजे आ जाती हो ना, आज क्यों देर हो गई? मेरी भी बच्चा संभालने की ड्यूटी सिर्फ 10 से 3 ही होती है, उसके बाद मेरा भी कुछ समय है," मंजू जी ने मोनिका को फटकारते हुए उत्तर दिया।
आज तो मोनिका को भी बहुत गुस्सा आ रहा था।
आता भी क्यों न, इतने सालों से मंजू जी के ताने जो सुन रही थी।
मोनिका भी फटाफट रसोई में गई और गुस्से में कुकर में खिचड़ी चढ़ा दी।
यह तो वही खिचड़ी थी, जिसे मंजू जी को सख्त नफरत थी। हर बार तो खिचड़ी उसी दिन बनती थी जब मोनिका की तबीयत ठीक नहीं लगती थी।
पर आज तो जान-बूझकर मोनिका ने मंजू जी को सबक सिखाने के लिए खिचड़ी बनाई थी।
जैसे ही रात में सब साथ में—शरद, मंजू जी और मोनिका—खाना खाने बैठे, मंजू जी बोलीं,
"यह क्या, आज फिर खिचड़ी बनी है?"
आज तो मोनिका कोई मौका नहीं छोड़ने वाली थी।
मोनिका बोली, "माँजी, आपको अपने पोते को संभालना छोटा लगता है, जैसे आपको अपनी सहेलियों से बहू की बुराई करने में मज़ा आता है। रोज़ उनसे बातें करके आप सभी सासें अपनी बहू के लिए महीने भर खिचड़ी पकाती हैं, वैसे ही मैं भी घर में कभी-कभी खिचड़ी बना ही लेती हूँ।"
मोनिका का उत्तर सुनकर मंजू जी का चेहरा तो देखने लायक था ही, साथ ही शरद को मन ही मन बहुत हँसी आ रही थी।
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