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प्रेशर कुकर

 शिखा सब्जी फल लेने मार्केट गयी थी,  ख़रीददारी कर  स्कूटी पर थैली टांग ही रही थी, तभी एक मोटर सायकिल वाले ने स्कूटी में टक्कर मार दी । स्कूटी सहित वह गिर पड़ी, पैर में जमकर चोट आई ।

दो तीन महिलाओं ने सहारा देकर उसे पास की एक दुकान में बिठा दिया। उसनें पति नीरज को कॉल कर बताया तो उसे लेने आया। हॉस्पिटल जाने पर पता चला उसके पैर में फ्रैक्चर आया है, उसे प्लास्टर चढ़ा दिया गया।

घर पहुँचने पर, उसे सहारा देकर बेड पर लिटाते हुए नीरज बोला, आज बहुत जरूरी मीटिंग थी, पर हॉस्पिटल में अच्छा खाँसा वक्त निकल गया। क्या जरूरत थी सब्जी लेने जानें की। रोज तो सब्जी का रेड़ी घूमता है मोहल्ले में। शिखा ने कोई जवाब ना दिया।

रात में सासू माँ ने कमरें में प्रवेश कर कहा, बहू आज तो मैंने खिचड़ी चढ़ा ली, पर कल सुबह की चाय नाश्ता, बच्चों का टिफिन, दिन और रात का खाना, मुझसे इतना कुछ तो ना हो पायेगा। तुम किसी मेड की व्यवस्था करो। जी माँ जी ,कहकर,उसनें पड़ोसन रीमा को कॉल किया। जैसे तैसे उसकी मेड सुबह आने को राजी हुई, शाम को आने से तो साफ इंकार कर दिया।

अगले दिन ही, घर की जैसे व्यवस्था ही लड़खड़ा गयी। मेड लेट आयी, बच्चों का समय पर टिफिन रेडी ना हो सका तो नीरज ने ब्रेड बटर रख दिया। सासू माँ पूजा करनें बैठी ,दूध उफ़न गया। बिना बोर्नविटा दूध पिये ही बच्चों को स्कूल जाना पड़ा। नीरज ऑफ़िस जाने में लेट हो गया । मेड ने खाना बनाया व शिखा को परोसा, सब्जी में मिर्च तेज थी , उसनें तो जैसे तैसे खा लिया। सासू माँ ने दूध रोटी खाई। बच्चों को सब्जी पसन्द नहीं आयी, दादी से मैगी बनवाकर खाई।

रात को सासू माँ ने फिर खिचड़ी बनाई। नीरज ने तो खा ली पर बच्चों ने हंगामा कर दिया, दादी रोज रोज खिचड़ी नहीं खा सकतें। "पापा आप होटल से मंगवा दो कुछ"

नीरज ने सख्ती से कहा , "जो बना है चुपचाप खाओ" तो बच्चों ने चुपचाप खिचड़ी खा ली।

अगले दिन मेड को शिखा ने समझाया, मिर्च मसाले हिसाब से डालना ,तो उसनें एकदम फ़ीकी सब्जी बना दी। किसी को पसंद नहीं आयी । पर मजबूरी में सब चुप रहे। बच्चों की यूनिफॉर्म प्रेस नहीं हुई, बेटे आरव को टाई नहीं मिली, सासू माँ को कुछ सामान मिलता तो कुछ ना मिलता, वे अपनीं बी पी की दवा खाना भूल गई।

बेटा आरव शिखा से झुँझलाते हुए कहनें लगा, "मम्मी आप स्कूटी से मार्केट क्यों गयीं,ऑटो से चली जातीं "

"हाँ न मम्मी, देखो कितना परेशान हो रहे हम" बिटिया ने कहा। तभी नीरज बोल पड़ा, ताजी सब्जियों व फल का तुम्हारी मम्मी को शौक जो ठहरा , जबकि मोहल्ले में रोज ठेले घूमते रहते है...

शिखा की डबडबाई आँख से आँसू बहने लगे....खीझती हुई बोली, ताजी सब्जियाँ ,फल क्या सिर्फ मैं खाती हूँ ?

स्कूटी से तो अक्सर ही जाती हूँ, किसी ने टक्कर मार दी, तो उसमें मेर क्या कसूर ??

तुम फुटबॉल खेलतें हुये गिरे, तब तो मैने तो कुछ ना कहा, उल्टा तुम्हारी ख़िदमत में जुटी रही।

रोज मशीन की तरह सुबह से शाम तक खटती रहतीं हूँ ,चाहे बीमार रहूँ कभी उफ्फ ना किया और अब दो तीन दिन में ही मानों भूचाल आ गया...?

किसी ने एक बार भी पास आकर पूछा, तबियत कैसी है?  तकलीफ़ तो नहीं हो रही? कुछ मदद चाहिए?? इतनें मतलबी कैसे हो सकतें हैं आप लोग??

प्रेशर कुकर में अब पूरी तरह उबाल आ चुका था... 

शिखा जैसे मन का सारा गुबार निकाल देना चाहती थी....

बच्चों की आँखे छलकनें लगीं, सॉरी मम्मी कहकर वे सुबकनें लगें....नीरज भी चुपचाप ज़मीन को ताँकता रहा.... सासू माँ तो कमरें से कब नदारत हुई पता ही ना चला....


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