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गलती

 सरसों के तेल की खुशबू जैसे ही मनोरमा जी तक पहुँची, वह नींद से जाग उठीं। "अचार बन रहा है..." सोचकर उनके चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई। उन्होंने बिस्तर से उठने की कोशिश की, पर हाथ-पैरों ने साथ नहीं दिया। जैसे-तैसे उठकर उन्होंने वॉकर का सहारा लिया और रसोई की ओर बढ़ चलीं।

"लो, आ गईं बुढ़िया! बहुत तेज नाक है , इनकी... अभी तेल गर्म होना शुरू भी नहीं हुआ कि खबर लग गई! हाथ-पैर तो काम नहीं करते, पर जुबान इतनी चटोरी है कि पूछो मत..." उनके वॉकर की खटखट सुनकर रसोई में बहू बड़बड़ाने लगी। उसकी आवाज़ सुनकर वे ठिठक गईं, पैर ऐसे भारी हो गए जैसे किसी ने भारी पत्थर बाँध दिए हों। उनकी आँखें भर आईं और वे उल्टे पाँव लौटने लगीं।

तभी दस वर्षीय पोती मिनी की आवाज़ आई, "मम्मी, कैसे बोल रही हो? दादी के लिए! उन्होंने सुन लिया तो?"
"वैसे भी वह अपनी तबीयत के कारण कितनी परेशान रहती हैं, सुन लेने दो... हम भी कोई कम परेशान नहीं रहते। उल्टा-सीधा वह खाएँ और तकलीफ हम झेलें..." बहू का स्वर तेज हो गया।
"आपसे तो बात करनी ही फिजूल है..." कहते हुए मिनी जैसे ही बाहर आई, दादी को देखकर उसने शर्म से सिर झुका लिया, "सॉरी दादी, वह मम्मी के कहने का वह मतलब नहीं था..." उसने सफाई दी।

"हाँ बेटा, तला-भुना और अचार खाने से मेरा दर्द बढ़ जाता है न... और तेरी मम्मी को मेरी तबीयत की चिंता रहती है, इसीलिए बोल दिया..." जैसे-तैसे उनके मुँह से शब्द निकले। मनोरमा जी धीरे-धीरे अपने कमरे की ओर बढ़ चलीं। मिनी ने उन्हें सहारा दिया और पलंग पर लिटा दिया।

लेटते ही उन्हें खयालों ने घेर लिया... जून का महीना है और अचारों का मौसम। मनोरमा जी पाक कला में बहुत निपुण थीं। सभी रिश्तेदारों और मोहल्ले में उनके बनाए खाने के चर्चे हुआ करते थे और सभी को इंतज़ार रहता था जून के महीने का, जब मनोरमा जी तरह-तरह के अचार बनाया करती थीं। बाजार से खुद कैरी चुनकर लाना, उसे धोना-पोंछना और फिर एक समान टुकड़े करना... इन सब कामों के लिए वह बच्चों की छुट्टियों का भी भरपूर उपयोग करती थीं। उनकी तीनों ननदें भी साल भर से इसी समय का बेसब्री से इंतज़ार करती थीं।
"भाभी, हम कितनी भी कोशिश कर लें, आपके हाथ के अचार जैसा स्वाद नहीं आता," ननदें कहतीं।
"हाँ मामी, मुझे तो आपके हाथ का लसौड़े और कैरी का अचार पसंद है, आप मम्मी को भी सिखा दो न..." जब ननिहाल से रवि बोलता तो जैसे उनकी सारी थकान उतर जाती थी। सारे मसाले खुद ही धोकर, दो तरह कूटकर तैयार करती थीं। हर मौसम में अलग-अलग तरह के अचार बनाती थीं—कैरी, लसौड़ा, करौंदा, आंवला, कटहल, गोभी, गाजर, मटर, सेम... बस नाम लो और अचार तैयार!
जून के महीने में उनके घर में मानो उत्सव का माहौल रहता था। मोहल्ले की सभी महिलाएँ उनकी मदद के लिए आ जाती थीं, घर पर भी चहल-पहल रहती और सबका साझा अचार बन जाता। सब लोग तैयारियाँ मिलकर करते, कोई कैरी धोता, कोई काटता, कोई मसाले कूटता, तो कोई तेल गरम करता। पर मसाले मिलाने, तेल की गर्माहट और स्वाद का काम सिर्फ मनोरमा जी ही करती थीं। शायद इसी लिए उनके हाथ जैसा स्वाद किसी और के बनाए अचार में नहीं आता था।

जब से मनोरमा जी को गठिए की शिकायत हुई, उनका अचार बनाना छूट गया। बहू को यह सब काम झंझट के लगने लगे, तो उसने बाजार के तैयार मसालों का उपयोग करना शुरू कर दिया। वैसे भी आजकल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में न किसी के पास समय है, न धैर्य, और न ही दूसरों के लिए कुछ करने की इच्छा।
उन्हें अचार बनाने के साथ-साथ खाने का भी बहुत शौक था, बारहों महीने थाली में अचार होना चाहिए। पर जब से गठिया हुआ, अचार खाने को तरस गईं। अचार की तेज खुशबू से मनोरमा जी वर्तमान में लौट आईं। देखा, तो उनकी पोती मिनी खाने की थाली में ले आई थी, जिसमें ताजा बना हुआ अचार भी था। उनके मुँह में पानी आ गया।
"लो दादी, खाना खा लो। मम्मी ने पूछा है कि अचार कैसा बना, ज़रूर बताना..." कहते हुए उसने परांठे का टुकड़ा अचार लगाकर उनकी ओर बढ़ाया।
"पर बेटा, मेरा गठिया..."
"कोई बात नहीं मम्मी जी, इतना सा खा लेने से कुछ नहीं होगा। अगर ज्यादा दर्द भी हुआ तो मैं मालिश कर दूँगी। आप तो चखकर बताइए, कैसा बना है..." बहू ने नज़रें झुकाए कहा। शायद उसे अपनी गलती का एहसास हो चुका था।

मनोरमा जी के झुर्रियों भरे चेहरे पर मुस्कान आ गई और उन्होंने झट से कैरी के एक फांक पर नींबू निचोड़ लिया...

आशा करती हूँ दोस्तों, आपको हमारी कहानी ज़रूर अच्छी लगी होगी। धन्यवाद!


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