Skip to main content

घर रूपी पेड़

 "जिस पेड़ पर बैठे हों, उस पेड़ को काटा नहीं करते।वही पेड़ आपकी जीवन दायनी शक्ति होता है।" सासु माँ के समझाये ये शब्द आज छोटी बहू को याद आ रहे थे।

आज उसकी जिठानी यानी बड़ी बहू के मायके वाले आए थे।उन्होंने कहा:"हमारी बेटी सबसे ज्यादा तारीफ अपनी देवरानी की करती है. हमेशा कहती हैं:मेरी देवरानी तो मेरी बहन से बढ़ कर है. मुझे इतना मान देती है की उसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते।"

 जब वे छोटी बहू की तारीफ कर रहे थे तब सासु माँ छोटी बहू को देख रही थी। उस समय छोटी बहू को वो दिन याद आ गया, जब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ था और उसने घर रूपी वृक्ष को सदा सींचने का प्रण लिया था। उस दिन की स्मृति छोटी के समक्ष साकार हो उठी...

" माँ,अपना  जड़ाउ हार दीजिएगा, शादी में वही पहन कर जाउंगी।" बड़ी बहू ने  सासू  माँ से फरमाइश की थी।

" बहु,मैं अभी निकालती हूँ।"

" ओह,बहु देखो इसका तो धागा टूटा हुआ है।”

"हाँ, माँ,कोई बात नहीं मैं कोई और पहन लूंगी।”

"छोटी बहू के पास भी तो ऐसा ही जड़ाऊ हार है। जाओ उससे ले लो।"

" जी,माँ।"

" अरे,तुम पुराना हार पहन कर जा रही हो? छोटी से हार न लिया क्या?"

बहु का गला जड़ाऊ हार से वंचित देख सास की त्यौरी  चढ़ गयी।

" माँ, छोटी ने कहा: हार तो लॉकर में है।"

" चलो होगा,मेरे ही दिमाग से उतर गया होगा। अच्छा तुम निकलो देर हो रही है।"

मन में उठी उथल-पुथल को संभालते हुए सास ने पर्दा डाल दिया।

" माँ,ये देखो,शांति कितने गन्दे बर्तन धोती है! सारा गिलास बाहर से चमका दिया पर अंदर से कितना गन्दा है।"

छोटी बहू की शिकायत पर सास ने गिलास देखा था।

" बहु,कल उसे समझाऊंगी। हाँ,एक ओर बात-जैसे बर्तन की उपयोगिता तभी है,जब वो अंदर से बिल्कुल साफ हो! वैसे ही इंसान की कद्र भी तभी होती है,जब वो अंदर से साफ दिल हो! उसके मन में कोई मैल न हो। घर रूपी पेड़ हम सभी की शक्ति है, उसे मत काटो।"

सास का इशारा जान छोटी  बहु की नजरें झुक गयीं थीं। उसे अपनी संकीर्ण सोच पर शर्म आयी। स्वयं को बदलने का निर्णय कर उसने निश्चय किया की उसे घर जोड़ना है तोडना नहीं। छोटी बहू स्मृति से बाहर आयी। सासु माँ उसे आशीर्वाद दे रही थी। उसने पेड़ को कटने से बचा लिया था।


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...