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माफी

 राजीव जी एक बिजनेस टूर के सिलसिले में यहां इस शहर में आए थे। काम खत्म हुआ, तो उस शॉपिंग-लिस्ट का ध्यान आया....जो श्रीमती जी ने घर से निकलते समय दी थी। शहर के उस जाने-माने स्टोर में वे अभी घुसे ही थे, कि एक जानी-पहचानी सी आवाज सुनाई दी.........

"अथर्व! प्लीज़ बेटा जिद छोड़ दो। अभी रहने देते हैं। अच्छा पक्का प्रोमिस, अगले महीने पक्का आपको ये इलेक्ट्रॉनिक कार लेकर दूंगी मैं, अभी मान जाओ मेरा राजा बेटा....!"

"प्रोमिस! अगले महीने पक्का लेकर दोगे न...."

"हां! पक्का ले कर दूंगी। चलो अभी आइसक्रीम खाते हैं।"

वे दोनों आइसक्रीम कॉर्नर की तरफ जाने के लिए मुड़े ही थे, कि राजीव जी की नजर पड़ी......यह तो उनकी बेटी वंदना थी।

"तुम......!!!"

"मुझे उम्मीद नहीं थी, 7 साल बाद ऐसा कुछ होगा और तुम मुझे यहां दिखाई दोगी" राजीव जी ने कहा।

वंदना से कुछ कहते न बना। उसने चुपचाप अपनी नजरें नीचे झुका लीं। वह कहती भी क्या, उसका गुनाह ही ऐसा था जिसके लिए उसके पास कोई हिसाब नहीं था। 7 साल पहले जब वेद से शादी करने के लिए वह उसके साथ घर छोड़कर यहां इतनी दूर चली आई थी, तब उसने खुद भी नहीं सोचा था कि एक दिन इस तरह से पापा से मुलाकात होगी।

उसने पास ही खड़े अथर्व को उंगली के इशारे से पार्क में लगा झूला दिखाते हुए कहा- "अथर्व! बेटा आप थोड़ी देर झूला झूलो, मम्मा अभी आपके पास आती हैं।"

"ओके मम्मा!" कहकर अथर्व भागता हुआ झूले पर चला गया।

"पापा मैं यह तो नहीं जानती कि मैंने जो किया वह सही था या गलत, लेकिन इतना जरूर जान गई हूं कि हमारी वजह से आपका और वेद की फैमिली का बहुत दिल दुखा है और शायद आप लोगों के दिल से निकली आह ही है जिसकी वजह से आज मैं इस स्थिति में हूं।" वंदना ने गर्दन नीचे झुकाए हुए कहा।

"स्थिति..... कैसी स्थिति.....?? साफ-साफ कहो वंदना क्या बात है.... क्या वेद ने तुम्हारे साथ कुछ गलत किया? अगर ऐसा है तो बताओ मुझे.... तुम्हारी सौगंध है छोडूंगा नहीं मैं उसे।"

पापा की बात सुनकर वंदना की आंखों से बहने वाली अश्रुधारा और भी तेजी से बहने लगी।

"पापा.............."

"हां बेटा....बोलो क्या बात है....."

"पापा....... वो वेद....."

"हां! हां! क्या किया वेद ने?"

"पापा वेद अब इस दुनिया में नहीं है, मैं विधवा हो चुकी हूं..." कहते-कहते वंदना ने कसकर अपनी आंखें बंद कर ली।

उधर वंदना की बात सुनते ही राजीव जी की सांसे भी मानो रुक-सी गईं।

"क्या....यह क्या कह रहा है मेरा बच्चा!! कब हुआ यह सब.... कैसे....?"

वंदना का रोना जारी था। किसी तरह उसने खुद को संभालकर सुबकते हुए बोलना शुरू किया- "पापा! हमारी शादी को तीन साल हुए थे। तब तक अथर्व भी एक साल का हो चुका था। अथर्व का जन्मदिन आने वाला था। मैं और वेद कितने चाव से उसके जन्मदिन की तैयारियां कर रहे थे, लेकिन किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था। अथर्व के जन्मदिन से सप्ताह भर पहले की बात है जब एक रोड-एक्सीडेंट में वेद मुझे और अपने अथर्व को छोड़कर चला गया....." इस बार वंदना खुद को नहीं संभाल पाई और फूट-फूट कर रोने लगी।

राजीव जी अपनी बेटी को इस तरह रोता देखकर अजीब-सी बेबसी महसूस कर रहे थे। जिस बेटी की एक मुस्कान के लिए वे अपनी जान तक लुटाने को तैयार रहते थे आज वही उनके सामने इस तरह फफक फफक कर रो रही थी।

"बस कर..... बस कर मेरी बच्ची..... बस कर....." कहते हुए राजीव जी ने वंदना को अपने सीने से लगा लिया।

"इतना सब कुछ हो गया और तूने हमें बताना भी जरूरी नहीं समझा!"

"किस मुंह से बताती पापा! जो मैंने किया उसके लिए शायद भगवान ने ही मेरी किस्मत में यह दुख लिखा है।"

"नहीं बेटा! ऐसा नहीं कहते। हां यह सच है कि जब बच्चे कोई गलत कदम उठाते हैं तब मां-बाप का दिल बहुत दुखता है। सीना छलनी हो जाता है उनका समाज के ताने उलाहने सुन-सुनकर, लेकिन फिर भी वे कभी यह नहीं चाहते कि उनके बच्चों के साथ कुछ भी गलत हो। बेटी चाहे कितना भी गलत करे, लेकिन उसे विधवा के रूप में देखकर हर बाप का कलेजा फट ही जाता है" इस बार राजीव जी के सब्र का बांध टूट गया और आखिरकार उनका दुख उनकी आंखों से बह निकला।

तभी जैसे कुछ याद आया......"लेकिन वेद के घर वाले.....उन्हें भी नहीं बताया तूने?"

"बताया था पापा! आए थे वे लोग। मगर उन्होंने मुझे और अथर्व को अपनाने से इंकार कर दिया।"

राजीव जी के पास बोलने को कुछ नहीं बचा था।

'अब क्या सोचा है...?"

"सोचना क्या है पापा! अथर्व वेद की निशानी है, मेरे जीने का एकमात्र सहारा। बस इसी के सहारे जीवन काट लूंगी।"

"और तेरे मां-बाप तेरे लिए कुछ नहीं रहे अब!" पापा की बात सुनकर वंदना निरुत्तर हो गई।

"अभी तेरे मां-बाप जिंदा है। तुझे और मेरे नवासे को ऐसे अनाथों की तरह नहीं जीने दूंगा मैं।"

"पापा! आपने मुझे माफ कर दिया।"

"हां मेरी बेटी! मैं तुझ से नाराज रह सकता हूं भला! चल अथर्व को ले। हम अभी चलते हैं यहां से।"

वंदना अपने पापा से नज़रें नहीं मिला पा रही थी। पापा ने ही उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा, उसके आंसू पोंछे और बोले- "जा! लेकर आ अथर्व को....."


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