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मां की पेंशन पर किसका हक?

 नीला जी के दो बेटे कमल और विमल और एक प्यारी सी बेटी प्रिया थी। पति आलोक जी सरकारी अफसर थे। दोनों बेटे जुड़वां थे और बेटी सबसे छोटी थी। जब दोनों बेटे नौकरी में आ गए तो उनकी शादी के लिए आलोक जी और नीला जी ने लड़कियां देखनी शुरू कर दी। आलोक जी की बहन-बहनोई ने भी कुछ रिश्ते बताए थे।

नीला जी और आलोक जी अपने बेटे और बेटी के साथ लड़की देखने गए। लड़की वालों ने सबका खूब स्वागत किया। जब नेहा कमरे में आई तो उसकी मासी की बेटी रानी भी साथ में थी, जो कि नेहा की हमउम्र लग रही थी। नेहा और रानी दोनों ही देखने में सुंदर और पढ़ी-लिखी थीं। नेहा के साथ रानी को भी विमल के लिए नीला जी और आलोक जी ने पसंद कर लिया। लड़की वालों को भी कोई आपत्ति नहीं थी। जब कमल और विमल ने भी हां कर दी तो उसी शुभ घड़ी में शगुन के कंगन नीला जी ने अपनी होने वाली दोनों बहुओं के हाथों में पहना दिए। खुशी-खुशी शादी हो गई।

अपने दोनों बहुओं को देख नीला जी बहुत खुश थीं, सब प्रेम से रहते थे। जल्दी ही प्रिया की शादी भी हो गई और आलोक जी भी रिटायर हो गए। सब कुछ ठीक चल रहा था, तभी एक दिन अचानक हार्ट अटैक आया और आलोक जी नहीं रहे। प्रिया और दामाद अतुल जी को खबर मिलते ही वे तुरंत आ गए। इस उम्र में आलोक जी का साथ छूटना नीला जी को एक सदमे की तरह लगा और वे बीमार रहने लगीं।

सारे पेपरवर्क के बाद आलोक जी की पेंशन नीला जी को आने लगी। आलोक जी काफी ऊँचे पोस्ट से रिटायर हुए थे, तो पेंशन की रकम भी अच्छी थी। पैसा इंसान की नियत बदलते देर नहीं लगाता, वही हुआ नीला जी के घर में भी। पेंशन को लेकर तकरार शुरू हो गई। पहले बहुओं में, फिर बेटों में भी मनमुटाव होने लगा। दोनों ही चाहते थे कि पूरी पेंशन उन्हीं को मिले। नीला जी अपने परिवार को बिखरते देख बहुत दुखी होती थीं। बहुओं को समझाना बेकार था, तो वे अपनी दिल की बात प्रिया को कहकर हल्का कर लेती थीं।

जब बात ज्यादा बढ़ गई, तब नीला जी ने एक फैसला किया। सबको बुलाकर कहा—"आज से एक महीने की पेंशन कमल लेगा, और दूसरे महीने विमल। और दोनों भाई प्रेम से रहो, बस यही मेरी इच्छा है।" बेटे-बहू सब खुश हो गए, जबकि भोली नीला जी ने खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली थी। इसका उन्हें अंदाजा भी नहीं था।

जब तक सास के हाथ में पैसे आते थे, दोनों बहुएं—नेहा और रानी—लालच में आकर उनकी सेवा करती थीं। अब सास के हाथ खाली होते ही वे नजरें फेरने लगीं। नाती-पोतों के जन्मदिन पर उपहार तक खरीदने के लिए उन्हें बहुओं से पैसे मांगने पड़ते। दोनों बहुएं कुछ न कुछ सुनाने से बाज नहीं आती थीं। नीला जी बहुत दुखी होती थीं और अपने फैसले पर पछताती थीं, लेकिन अब कुछ कर भी नहीं सकती थीं। एक समय था जब पर्स पैसों से भरा रहता था और आज एक पैसे के लिए भी मोहताज हो गई थीं, जबकि खुद के पति की पेंशन थी।

एक रोज नीला जी की दवा खत्म होने को थी तो उन्होंने बड़ी बहू को बुलाकर कहा, "यह पर्ची जरा कमल को फोन करके दे दो, मेरी दवाई लेते आए। पिछली बार वह लाया था तो पर्ची उसी के पास होगी।" इतना सुनते ही नेहा ने कहा, "पर्ची शाम को देवर जी को दे दूंगी, माजी। इस बार वही लाएंगे, पिछली पेंशन हमने ली थी तो कमल जी दवा लाए थे। इस बार देवर जी लेंगे तो वही लाएंगे।" इतना कहकर वह चली गई, लेकिन नीला जी स्तब्ध खड़ी रह गईं। "मेरे ही पति की कमाई से मेरी दवा लाने में भी इन्होंने बंटवारा कर लिया? क्या अपनी मां को अपनी कमाई से दवा भी नहीं खिला सकते?"

"मेरी पेंशन पर सबको हक चाहिए, सबको मेरे पति की कमाई लेनी है, लेकिन मेरी परेशानियों से किसी को कोई मतलब नहीं। क्या इतने स्वार्थी हो गए हैं मेरे खुद के बच्चे?"

अगले दिन सुबह-सुबह प्रिया को और दामाद अतुल को देखकर सब चौंक गए। देखा तो अपने छोटे से बैग के साथ नीला जी भी तैयार बैठी थीं।

"यह क्या है मां, आप कहां जा रही हैं और हमें बताया भी नहीं?" कमल ने पूछा।

"मां मेरे साथ जा रही हैं भैया," गुस्से से प्रिया ने जवाब दिया।

"लेकिन क्यों?" प्रिया, आश्चर्य से सबने एक साथ पूछा।

"कोई सिर्फ मेरी मां की पेंशन चाहता है, लेकिन किसी को मेरी मां की इच्छा, उनका हाल पूछने की फुर्सत नहीं! पैसों के लिए सबने मेरी मां को इस उम्र में मोहताज कर दिया। आप सबने मेरी मां को अपने काम खुद करने दो, दो रोटी भी अपने पति की पेंशन के पैसों से खाएं, यहां तक कि डॉक्टर और दवाओं के खर्च भी पापा की पेंशन से हों, तो दो बेटों के होने का क्या फायदा? सिर्फ पापा की पेंशन पर हक जताने के लिए?"

"पति की पेंशन सिर्फ उसकी पत्नी का हक होता है ताकि वह उसके जाने के बाद भी आर्थिक रूप से मजबूत रह सके। फिर आप सबका कैसा हक उस पेंशन पर? बताइए मुझे। मां हमारे साथ रहेंगी और हां भैया, मां की पेंशन मां खुद खर्च करेंगी।"

प्रिया ने इतना कहकर अपने भाइयों से मुंह फेर लिया। "बेटे होकर भी बेटे का फर्ज नहीं निभा सके, लेकिन मैं दामाद का फर्ज नहीं भूलूंगा। मां को खाने और उनके पैसे के लिए नहीं देना पड़ेगा, अपने इस बेटे के घर," अतुल ने कहा।

तो सबके सिर शर्म से झुक गए। अतुल ने मां का हाथ पकड़ा और घर से निकल गए।

  • लेखिका : एकता ऋषभ

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