"बड़ी बहू, जरा ये सब्जी ठीक कर लाओ, छोटी बहू को तो सब्जी बनानी आती ही नहीं। कैसी पीली-पीली सी सब्जी बनी है, जरा भी रंग नहीं। सब्जी में देखने में ऐसी है तो खाने में कैसी होगी?"
महेश बाबू ने सुलेखा से कहा। ससुर जी की बात सुनकर बड़ी बहू अपनी देवरानी अंजलि की तरफ व्यंग्यात्मक हंसी हँसते हुए बोली,
"ठीक है पापा जी,"
और सुलेखा रसोई में चली गई।
ससुर की बात सुनकर और जेठानी की हँसी देखकर अंजलि को बहुत दुख हुआ। वह चुपचाप सुलेखा के पीछे रसोई में चली गई कि देखे आखिर जेठानी ऐसा क्या डालती हैं सब्जी में।
अंजलि को देखकर सुलेखा बोली,
"वो क्या है न कि सबको मेरे हाथ के खाने की आदत हो गई है, अब क्या कर सकते हैं।"
अंजलि चुपचाप खड़ी थी। उसने देखा कि जेठानी ने थोड़ी सी मिर्ची और बाजार के रेडीमेड मसाले भूनकर सब्जी में डाल दिए हैं, कुछ अलग नहीं किया।
सबको आदत हो गई है उसकी सब्जी में कमी निकालने की। जब से शादी हुई है, उसके बनाए खाने पर हमेशा ससुर जी जेठानी से कहते कि "पहले सब्जी ठीक कर लाओ।"
अंजलि ने बहुत कोशिश की कि उन लोगों की पसंद की सब्जी बनाए, खूब मिर्च मसाले की। इसलिए वह पहले अपनी सब्जी निकाल लेती थी और फिर सबकी सब्जी में मिर्च मसाले डालकर भून देती थी। फिर भी उन्हें उसकी सब्जी में रंग नहीं दिखता था।
रात को उसने अपने पति आदित्य से पूछा,
"आज सब्जी कैसी बनी थी?"
आदित्य बोला,
"अंजलि, सब्जी तो तुम्हारी बीमारी जैसी बनती है, उसमें रंग नहीं आता, तो देखने में भी अच्छी नहीं लगती। तुम समझ रही हो न मैं क्या कहना चाह रहा हूँ, कि थोड़ा प्रेजेंटेशन की कमी है।"
"नहीं आदित्य, तुम गलत कह रहे हो। अगर सब्जी ज्यादा मिर्च-मसालों की बनेगी तो अच्छे से अच्छा आदमी भी बीमार पड़ जाएगा। और ये जो तुम और तुम्हारे घर वाले सब्जी का रंग चिल्लाते हो न, तो सुनो, जेठानी जी सब्जी में खूब मिर्ची भून कर डालती हैं, जो सेहत के लिए हानिकारक है।"
"मुझे नहीं पता कि भाभी क्या करती हैं, हमें तो सब्जी देखने में अच्छी लगती है तो हमारी भूख बढ़ जाती है।"
आदित्य की बात सुनकर अंजलि चुप हो गई, लेकिन उसका मूड खराब हो गया था।
अगले दिन शाम को फिर ससुर जी ने जेठानी सुलेखा से सब्जी ठीक करने को कहा तो अंजलि बोली,
"पापा जी, कल से भाभी ही दोनों समय सब्जी बना लेंगी, मैं केवल अपने समय पर बाकी काम कर लूंगी, क्योंकि दो बार सब्जी बनने में भी बहुत खराब होता है और आपको भी मनपसंद सब्जी खाने को नहीं मिल पाती।"
ससुर जी ने अंजलि की बात को स्वीकृति दे दी।
अंजलि की बात सुनकर सुलेखा के होश उड़ गए। रोज़ अंजलि पर हँसने वाली सुलेखा को अब अपना बढ़ा हुआ काम दिखने लगा।
सुलेखा बोली,
"अंजलि, तुम काम से बचने की कोशिश कर रही हो। मैं नहीं करूंगी तुम्हारे हिस्से का काम!"
"भाभी, मैं कोई काम से जी नहीं चुराती, आप अच्छी सब्जी बनाती हो तो ठीक है, कल से सब्जी आप ही बना देना, मैं रोटियां बना लूंगी। सबको आपके बने सब्जी की आदत हो गई, तो अब क्या कर सकते हैं।"
अंजलि की बात सुनकर सुलेखा को अपने ऊपर ही गुस्सा आ रहा था। "क्या जरूरत थी अपनी ज्यादा तारीफ करवाने की! अब झेलो खुद एक्स्ट्रा काम। अब कहीं जा भी नहीं सकते क्योंकि दोनों समय की सब्जी उसे ही बनानी होगी।"
अंजलि भी समझ गई थी कि वह चाहे कुछ भी कर ले, लेकिन उसकी बनाई सब्जी में कमी जरूर निकालनी थी, इसलिए जिसके हाथ का सबको पसंद है, उसी को करने दिया जाए, क्यों ज्यादा सोच कर अपना दिमाग खराब करना?
हाँ, एक ख्वाहिश मन में जरूर अधूरी रह गई कि अपने पति और उसके परिवार को अपने हाथ से नई-नई डिश बनाकर खिलाए।
जाने कब ये अधूरी ख्वाहिश पूरी होगी, जब तक जेठानी जी का जादू सबके सिर पर चढ़ा है, तब तक तो यह संभव नहीं।
इसलिए खुद में खुश रहो।
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