सोने के कंगन जब से गीता को मिले थे उनको ही निहारे जा रही थी।
जब से शादी करके आई थी उसके हाथों मे हमेशा कांच ही चूड़ियाँ खनकती थी।अपने साथ वाली नयी बहुओ के हाथों मे चमकते सोने के कंगन देखकर मन ही मन कुड़ जाती थी।पर किसे से कुछ नहीं कह पाती थी।
मजदूर बाप की बेटी थी बचपन से गरीबी का चोली दामन का साथ रहा था।दो जून की रोटी और तन ढकने को कपड़े मिल जाते वह ही बहुत था।
जब बड़ी हुई तो नाक नक्श की अच्छी होने के कारण सरकारी विभाग में चपरासी की नौकरी करने वाले सोहन को पसंद आ गयी और बिना किसी मांग के शादी करके सोहन के घर आ गयी।
सोहन इतना कमा लेता था कि परिवार में मां बाप और बीबी का गुजारा आराम से हो जाता। इसके अलावा नवविवाहित वाले कोइ लाड चाव और शौक पूरे नहीं होते।धीरे धीरे गीता ने भी अपनी किस्मत से समझौता कर लिया और गृहस्थी में खुद को डूबो लिया।पर जब कभी किसी को गहने पहने देखती मन मचल उठता लेकिन हालातों को देखकर मन की इच्छा मन ही दबा लेती।
सोहन गीता के मनोभावों को अच्छे से समझता था लेकिन बढ़ती महंगाई के बोझ और परिवार के खर्चों ने कभी कुछ और सोचने नहीं दिया।
समय के चक्र का पहिया घूमे जा रहा था। गीता और सोहन घर परिवार की जिम्मेदारी निभाते निभा ते उम्र के आखिरी पड़ाव पर आ गये थे तो नौकरी से भी रिटायर्ड होने का समय भी आ गया।पूरी उम्र एक.पाई नहीं बचा पाये थे पर आज रिटायर्मेंट के समय सरकार की तरफ से इतने सालो का पुरस्कार के रूप में सोहन को जो धन राशि मिली उससे उसने गीता के लिए सोने के कंगन खरीद कर तोहफे में दिया।
इस उम्र में अपने लिए सोने के कंगन पाकर गीता को विश्वास नहीं हो रहा था कि यह उसके है।पूरी जिंदगी की भर जिन कंगनों के सपने देखा करती थी आज वह सोने के कंगन उसके हाथों में चमक रहे थे,और उसकी खुशी गीता की आँँखों में साफ झलक रही थी।
गीता कंगनों को बार बार निहारती पौंछती खनकाती हुई नवयुवती की भांति आज चहक रही थी।
सच है ख्वाब छोटे बड़े नहीं होते बस ख्वाब होते है,उनके का पूरे होने की खुशी छिपाये नहीं छिपती
धन्यवाद
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