"सुधा भाईयादूज के दिन कब तक पहुंचेगी?"
"भाईया दोपहर तक ही आ पाऊंगी."
"ठीक है.मैं इंतजार कर रहा हूँ.तेरी भाभी भी तब तक आ जायेगी."
बड़े भाई रोहन से बात करके सुधा ने फोन रखा.एक राखी और भाईयादूज ही दो त्यौहार है जब वो मायके जा पाती थी नही तो उसे मायके गये महीनों हो जाते थे.उसे अपनी मम्मी के कहे शब्द कानों में गूंजने लगे.
"इस बहाने मायके तो आयेगी"
सुधा आठ साल पहले दुल्हन बन कर ससुराल आई थी. उसका ससुराल मायके से चार पांच घंटे की दूरी पर था. कहते है न कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी.सुधा के ससुराल की तरफ कई ऐसे त्यौहार थे जो वहाँ मनाये जाते थे पर उसके मायके में नही.ऐसा ही एक त्यौहार था भाईयादूज.शादी के बाद सुधा के ससुराल में पहला भाईयादूज था.
"बहू भाईयादूज पर मायके जाना है.तुमनें जाने की तैयारी कर ली." सास सरोज जी बोली.
"लेकिन मम्मी जी हम भाईयादूज नही मनाते."
"बहू ये हमारा खास त्यौहार है.तुम भी अब से मनाना शुरू कर दो."
सुधा कशमकश में थी.जिस त्यौहार को पहले कभी नही मनाया .उसे अब कैसे शुरू कर दे.पति राज से पूछा तो वो बोले "तुम्हारी मर्जी"
नई नई शादी थी इसलिए उसे समझ में नही आ रहा था कि क्या करूँ.कही उसके इनकार से सासूमाँ नाराज न हो जाये. इसलिए उसने अपनी मम्मी से बात करना उचित समझा.
"मम्मी ,मम्मी जी कह रही है कि मैं भी भाईयादूज बनाऊं.क्या करूँ.अभी तक जिस त्यौहार को नही मनाया फिर अब कैसे मनाऊँ.
"समधन जी कह रही है तो मना लो.कम से कम इस बहाने मिलने तो आयेगी."
"क्मा मम्मी अपने घर आने के लिए मुझे बहाने ढूंढने पड़ेगे."
"तू अभी नही समझेगी." उसकी मम्मी ने बोला था.
समय बीता सुधा दो बच्चों की माँ बन गई. उसके बाद तो घर गृहस्थी में ऐसी फंसी की मायके जाना लगभग छूट ही गया.कभी बहुत जरूरी होता तभी जा पाती.नही तो घर,बच्चे उनकी पढ़ाई, पतिदेव के ऑफिस, सास ससुर की खराब तबीयत में ही उलझी रहती. लेकिन भाईयादूज पर जरूर जाती और ये सिलसिला आज भी जारी है.
सच में तब वो इन शब्दों का मतलब कहाँ समझ पाई थी. लेकिन अब इन शब्दों के पीछे का अर्थ उसे भलिभांति समझ आ गया था.त्यौहार के बहाने ही सही उसे कम से कम मायके जाने को तो मिलता.
शशि ध्यानी
दिल्ली
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