“जीजी, मम्मी ने गांव से राशन और खूब सारी सब्जियां भेजी हैं, कहां रखवा दूं?” देवरानी शिप्रा ने अपनी जेठानी काव्या से पूछा।
“तुम और तुम्हारे गंवार घरवाले, यहां क्या सब नहीं मिलता जो तुम्हारे माता-पिता इतनी दूर से ट्रक में लादकर सामान यहां भेज देते हैं? पूरी सोसाइटी में बेइज्जती हो जाती है! कभी मॉल से सामान लाने का सोचो, उससे पहले ही सबकुछ आ जाता है।”
“भाभी, इसमें बुराई ही क्या है? शहर में रहते हुए भी हमें शुद्ध और देसी चीजें घर बैठे ही खाने को मिल रही हैं। जहां लोग शुद्ध चीजों के लिए तरसते हैं, वहां बिना मेहनत किए ही सब हाजिर है।”
“तुमसे यही उम्मीद थी देवर जी! एक तो पहले ही आप इस गंवार से शादी कर लाए और अब ऊपर से इसके लिए अपनी भाभी पर ही चिल्ला रहे हैं! भूल गए क्या, मम्मी-पापा के जाने के बाद मैंने ही आपको पाल-पोसकर बड़ा किया है। अगर मेरी छोटी बहन से शादी की होती तो आपका स्टैंडर्ड कुछ और ही होता। खैर, मुझे क्या, अपने कमरे में ही सब रखवा लेना, पूरा घर गंदा करने की जरूरत नहीं है।”
पर भाभी, इससे पहले शरद कुछ कहता, शिप्रा ने उसका हाथ पकड़ उसे रोक लिया—
“भाभी, ऐसे कैसे कर सकती हैं? यह घर पर आपका भी उतना ही हक है जितना भाभी का। नहीं, आगे से मैं अब किसी को तुम्हारा और तुम्हारे मायके वालों का मजाक नहीं बनाने दूंगा। भाभी दिल की बुरी नहीं हैं, आजकल उन पर ऑफिस का वर्कलोड शायद कुछ ज्यादा ही है, और फिर टी और निखिल के पेपर का भी प्रेशर है। आप चिंता मत कीजिए, मैं सब संभाल लूंगी।”
बात आई-गई हो गई थी, पर अक्सर ही काव्या, शिप्रा को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी। जबकि वह भी अच्छे से जानती थी कि उसके ऑफिस जाने से लेकर घर वापस आने तक शिप्रा ही थी जिसने घर, बच्चों, सभी कुछ बहुत अच्छे से संभाल रखा था।
कुछ दिन पहले की ही बात थी, जब काव्या ने अपनी सहेलियों को घर पर बुलाया था, तब उसने शिप्रा को कमरे से बाहर ही नहीं आने दिया था क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि उसकी सहेलियां को पता चले कि उसकी देवर ने एक गांव की परिवेश में पली लड़की से शादी की है।
काव्या शुरू से ऐसी नहीं थी, पर जब से उसके देवर शरद ने उसकी चचेरी बहन निशा से शादी न करके अपनी मनपसंद लड़की शिप्रा से शादी की है, तभी से वह उन दोनों से बहुत नाराज थी।
शरद को तो तब भी उसने माफ कर दिया था, पर कोई गलती न होते हुए भी वह शिप्रा से कभी खुश नहीं हो पाई।
समय अपनी गति से चलता जा रहा था कि एक दिन काव्या को अपने ऑफिस के काम से शहर के बाहर जाना पड़ा। बच्चों की और पति की पूरी जिम्मेदारी शिप्रा पर छोड़ वह अपने काम से निकल गई।
दो ही घंटे बीते थे कि खबर आई कि काव्या की गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया है। किसी भले व्यक्ति की वजह से उसे अस्पताल पहुंचा दिया गया है।
सब लोग तुरंत ही अस्पताल पहुंच गए। डॉक्टर बताते हैं कि सीट बेल्ट लगी होने की वजह से जान बच गई, वरना कुछ भी हो सकता था। फिलहाल मरीज अभी भी होश में है, बाकी रिपोर्ट चेक करने पर पता चलेगा। मामूली सा फ्रैक्चर है, कुछ अंदरुनी चोटें हैं, चेहरे पर चोट के निशान समय के साथ चले जाएंगे। महीने-डेढ़ महीने में बिल्कुल सही हो जाएगी, तब तक आप इनका अच्छे से ख्याल रखिएगा।” डॉक्टर हिदायत देकर काव्या को अस्पताल से छुट्टी दे देता है।
घर वापस आते ही शिप्रा, काव्या की पूरी जी-जान से सेवा करने लगती है। जल्दी उसकी चोट भर सके, इसलिए रोज सुबह-शाम जबरदस्ती दूध में हल्दी घोलकर देती, बाथरूम में खुद ही पकड़कर ले जाती, अपने घरेलू नुस्खों से दिल के तेल से हल्के हाथों से पूरे बदन की मालिश करती।
हफ्ते भर में ही काव्या को आराम मिलना शुरू हो गया था।
एक सुबह—
“शिप्रा, मुझे माफ कर देना। मैंने तुम्हें हर समय इतना बुरा-भला कहा, हमेशा तुम्हारे पहनावे और बोली का मजाक उड़ाया, उसके बावजूद भी तुम सब कुछ भूल दिन-रात मेरी सेवा करने के लिए समर्पित रहीं। इतना तो कोई अपना खास भी नहीं करता। अगर मैं अपने पैरों पर फिर से इतनी जल्दी सही-सलामत खड़ी हो पाई हूं, तो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे घरेलू नुस्खों की वजह से। हमेशा तुम्हें अशिक्षित और गंवार समझा, पर असल में शिक्षित होते हुए भी मैंने तुम्हारे साथ अशिक्षित जैसा व्यवहार किया। मुझे माफ कर दो, आगे से मैं कभी भी तुम्हें शिकायत का मौका नहीं दूंगी।”
“भाभी, आप मेरी बड़ी बहन समान हैं, आपको मुझे डांटना-फटकारना पूरा हक है। माफी मांगकर मुझे यूं शर्मिंदा न करें।” कहते हुए शिप्रा ने झुककर अपनी जेठानी काव्या के पैर छुए।
“देवर जी, क्या आप अभी अपनी भाभी से नाराज हैं?” काव्या ने अपने कान पकड़ते हुए शरद से पूछा।
“भाभी, मां से भी कोई नाराज होता है क्या? मैंने तो अपनी मां को बहुत पहले ही खो दिया था, आज मैं जो कुछ भी हूं, आप और भैया की वजह से हूं। पर भाभी, अब जब आप पूरी तरह से ठीक हो चुकी हैं, तब मैं आपको कुछ बताना चाहता हूं। मैंने यहीं पास में एक फ्लैट ले लिया है, अब इसमें मैं और शिप्रा वहीं रहेंगे। भैया तो सब जानते हैं, यह बात हम आपको बताने ही वाले थे, तब तक आपके साथ यह हादसा हो गया।”
“पर यह सब क्यों, कब, कैसे? एक साथ ही बहुत सारे प्रश्न काव्या ने पूछ डाले। अब तो सब कुछ सही भी हो गया है और आपने भी मुझे बताना जरूरी नहीं समझा?” काव्या पति सोमेश से गुस्से में बोली।
“भाभी, इसमें भैया की कोई गलती नहीं है, मैंने ही मना किया था। आप बड़ी हैं, मां समान हैं, आपका कुछ भी कहा सिर-आंखों पर। मैंने भी शिप्रा से शादी करते वक्त कुछ वादे किए थे, उन्हें पूरा करना न केवल मेरी जिम्मेदारी है बल्कि मेरा धर्म भी है। मैं रोज-रोज अपनी पत्नी के आत्मसम्मान को चोट खाते हुए नहीं देख सकता।
भाभी, जरूरी नहीं हर बार रिश्तों को सच की कसौटी पर कसने के लिए किसी अवसर की जरूरत पड़े। अगर आपके साथ यह हादसा नहीं हुआ होता, तो आप अभी भी शिप्रा के साथ वैसे ही व्यवहार करतीं। वैसे भी बच्चे बड़े हो रहे हैं, ये घर हमारे लिए छोटा भी पड़ रहा था, इसलिए मेरा और शिप्रा का यहां से जाना ही बेहतर है। पास रहकर दिलों में दूरी रहे, उससे बेहतर है दूर रहकर आपस में प्यार और मिलन रहे, वह ज्यादा अच्छा रहेगा।”
“पर इतनी जल्दी यह सब फैसला? कुछ समय तो मुझे अपनी छोटी बहन शिप्रा के साथ बिताने दिया होता।”
“भाभी, कुछ फैसले अचानक ही लिए जाएं तभी सही रहते हैं।”
शिप्रा और शरद दोनों ने अपना सामान लिया और अपने नए घर के लिए निकल गए।
Comments
Post a Comment