मां तुम पर बिंदिया बहुत जजती है ।
अपने नन्हे नन्हे हाथों से मृदुल मां के माथे पर बिंदिया लगाने लगा ।
राधिका ने गुस्से में उसे थप्पड़ जड़ दिए ,और फिर रोते हुए उसे अपने आलिंगन में भरकर उसके मासूम चेहरे को ।
देखते हुए अपने दर्द को ना समझा सकी एक औरत का अपना क्या ?
सचमुच कुछ नहीं है ॥ जन्म के साथ उसे हर कदम बढ़ती दिशा में एक-एक चीज को छोड़नी पड़ती है ।बेटी से बहू ,पत्नी ,मां ,सास सभी सफर को बड़ी ईमानदारी से निभाती हुई ।अपने माथे की एक बिंदी को भी पति के न रहने पर उसी के नाम समर्पित॥
चेहरे की सुंदरता मानो इसी लाल रंग की बिंदी से उसकी सारी आशाएं और अभिलाषाएं जुड़ी थी ।
उसके मिटते ही वह खुद को क्यों खत्म कर देना चाहती है ।ऐसे सवाल अंतर्मन में उठ रहे थे।
राधिका क्या हुआ !
तुझे खुद के लिए नहीं सजना सवरना चाहिए ,अपने मृदुल के लिए नहीं लाल बिंदी लगानी चाहिए ,नहीं नहीं लोग क्या कहेंगे ? समाज क्या कहेगा बिस्तर पर पड़ी 90 वर्ष की दादी मां जो बाल विधवा थी ।
उन्होंने अपना सब सुख बाल अवस्था में ही दादा जी के जाने के बाद समर्पित कर दिया था ।उन्हें कैसा लगेगा इन सब शब्दों के जाल को अपने मस्तिष्क में बुन रही थी ।
कि पीछे से आवाज आई राधिका क्या हुआ क्यों नहीं बच्चे की खुशी के लिए अपना सिंगार करती ।
तू तो वैसे कृष्ण की राधिका है ॥कहां राधा को कृष्णा ने साथ रहने का वचन दिया था ।बस प्रेम का ही तो श्रृंगार कराया था ।उसी श्रृंगार के सहारे राधा ने अपना जीवन समर्पित कर दिया ।
ये शब्द किसी और के नहीं उसी दादी मां के थे ,जो 90 वर्ष की अवस्था में ,अब बिस्तर पर पड़े हुए ,अपने जीवन के हर खुशियों को समर्पित कर आज अपने अस्तित्व का हिसाब ढूंढ रही हैं।
सचमुच हम कितने भी आधुनिक हो जाए और स्वतंत्रता की बात कर ले ।
पर पति के बिना एक स्त्री का श्रृंगार अधूरा ही रहता है॥
चाहे उसको जीते जी सम्मान दे या अपमान फिर भी
एक भारतीय नारी सुहाग और सिंगर को पति के बिना सहज स्वीकार नहीं कर पाती ।
यही स्थिति मेरी नायिका राधिका की थी ,जो अपने बेटे की खुशी के लिए दादी के कहने पर लाल बिंदी जड़ तो लेती है ।अपने मुखड़े पर, फिर भी जमाने की परवाह करती हैं ।जग की बातें और अंतर मन में झाझावत के साथ संघर्ष करती रहती है।
बिंदी भी तुम्हीं से
सिंदूर भी तुम्हीं से
पायल ,बिछिया, नाथ ,भी तेरी
लाल रंग की चोली, चुनरी ,
तेरे रहते ही जचती है ।
घर का हर कोना तेरे रहने से रौनक है ।
सुबह शाम की बातें तेरी ॥
मेरी शक्ति ताकत है ।
बच्चों का भविष्य तुम्हीं से
घर आंगन का किस्त तुम्ही से ॥
मेरा यह सिंगार तुम्ही से ।
जीवन भर का प्यार तुम्हीं से ॥
कैसे इसे अभिव्यक्त करूं ।
तुम बिन सुना सब कुछ मेरा ,
कैसे इसे व्यक्त करूं ।
लाख जमाना बदल गया है ।
पर पीड़ा तो मेरी है ।
कैसे कहूं किसको कहूं
तुम बिन सब कुछ सुना है।
स्वरचित
किरण मिश्रा
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