"यह क्या भाभी, फिर खुले मुंह घूम रही हो? घर में बड़े-बूढ़े हैं, कुछ तो लिहाज करो!"
देवर रंजीत की तेज आवाज़ सुनकर रूबी सिमट सी गई। "जी भैया," उसने जल्दी ही अपने सिर पर पल्लू ले लिया और बोली, "भैया, आदत नहीं है ना, इसलिए पल्लू बार-बार फिसल जाता है। बाल भी सिल्की हैं, इसलिए नहीं टिकता।"
"अगर पल्ला नहीं टिकता है तो अपने सिर पर कल ठोक लो!" रंजीत ने गुस्से और व्यंग्य से कहा।
रूबी चुपचाप खड़ी रह गई। वह एक आधुनिक एवं स्वतंत्र विचारधारा वाले परिवार में पली-बढ़ी थी। उसने कभी अपने घर में ऐसा देखा ही नहीं था, पर नई-नई शादी होने के कारण वह सब रीति-रिवाज निभाए जा रही थी।
रूबी की शादी को कुछ ही दिन हुए थे। वह अभी घर में सभी को समझने की कोशिश कर रही थी। अमोल से पहली मुलाकात में ही उसे प्यार हो गया था और उसने शादी करने का निश्चय कर लिया था। सास-ससुर, दादी-दादा, ननद और देवर—पूरा उसका ससुराल था। उसका देवर रंजीत उच्च शिक्षा प्राप्त था, वैसे तो अपने आप को आधुनिक कहता था, पर भीतर से पूरी तरह रूढ़िवादी था। हर बात पर रूबी को टोकता था—कभी कपड़ों पर ठीक से पल्लू न लेने पर, तो कभी रोटी गोल न बनाने पर, कभी सब्जी में मसाले की शिकायत, तो कभी कुछ और। हर बात में मीन-मेख निकालने में जैसे उसे मज़ा आता था। यहां तक कि रिश्तेदारों से हँसकर बात करने पर भी उसका मुंह चढ़ जाता था। घर में उसी की चलती थी और सास-ससुर का प्रत्यक्ष समर्थन उसे प्राप्त था, इसलिए कोई कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं कर पाता था।
जब भी किसी बात पर उसका चेहरा उतर जाता तो अमोल उसे देवर-भाभी के हंसी-मज़ाक में हँसकर टालने को कह देते और कहते, "रंजीत भले ही थोड़े गुस्से वाला है, पर दिल का बहुत अच्छा है।"
दादा-दादी रूबी से बहुत प्यार करते थे, पर वो भी अपने इस बिगड़ैल पोते से दुखी रहते थे और चाहकर भी रूबी का पक्ष नहीं ले पाते थे।
पर आज तो रंजीत के इस वाक्य ने सारी हदें ही पार कर दी थीं। अगर यही बात उसने हँसकर कही होती तो शायद रूबी को इतना बुरा नहीं लगता। उसने कुछ ही दिनों में यह समझ लिया था कि घर में केवल रंजीत को ही उससे समस्या है, पर क्यों है—यह कारण अभी तक उसकी समझ से बाहर था। रूबी की घुटन बढ़ती ही जा रही थी, पर अब उसे लगा कि अगर अभी उसने सही जवाब नहीं दिया तो फिर कभी नहीं दे पाएगी।
उसने धीरे-धीरे रंजीत को नज़रअंदाज करना शुरू कर दिया। पहले वह खुद दौड़कर उसके काम कर दिया करती थी, पर अब उसके कहने पर भी वह उसे अनसुना करने लगी। इससे रंजीत की चिढ़ और बढ़ गई।
"भाभी, ज़रा मेरी शर्ट प्रेस कर दो, मुझे अभी बाहर जाना है। और ये क्या, फिर से सिर पर पल्लू नहीं लिया? ज़रा थोड़ी तो शर्म लिहाज करो!"
रंजीत ने उसकी ओर सख्ती से कहा।
रूबी खाना बना रही थी, उसने रंजीत की बात अनसुनी कर दी और अपना काम जारी रखा। अपना पल्लू भी साइड से हटाकर कमर में खोंस लिया।
"क्यों भाभी, सुनाई नहीं दे रहा क्या? हाथ धो, पल्लू ले और पहले मेरी शर्ट प्रेस कर दो!"—इतनी तेज़ आवाज़ में कहा।
रूबी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और अपने काम में लगी रही। इतने में सासू माँ भी किचन में आ गईं।
"बाहरी हो गई क्या? काम से कह रहा हूं, सुनाई नहीं दे रहा तुम्हें?"
रंजीत गुस्से से चिल्लाया।
"यह क्या हो रहा है रंजीत? किस बात पर चिल्ला रहे हो और किस पर?"
घर में घुसते हुए अमोल ने सुन लिया और रंजीत को डांटा, "अब मुझे क्या बोल रहे हो, भाभी को बोलो। मैं कब से एक शर्ट प्रेस करने को बोल रहा हूं, पर वह ध्यान ही नहीं दे रही है, जवाब भी नहीं दिया।"
रंजीत अभी भी गुस्से में था।
"क्यों, तुम अपनी शर्ट खुद नहीं प्रेस कर सकते? वह भी काम कर ही रही है ना? और तुम्हें कम से कम जवाब तो देना चाहिए," अमोल बोले।
"जब उन्होंने मुझे 'बाहरी' कह ही दिया है, तो फिर मुझे भी उनकी कोई बात नहीं सुनाई देती। अगर वह मुझसे तमीज से बात नहीं कर सकते हैं, तो मैं क्यों सुनूं? बड़ों की इज्जत व्यवहार और संस्कार से होती है, पल्लू से नहीं। उनकी ये दादागिरी अब मुझ पर नहीं चलेगी। मैं उनकी पत्नी हूं, उनकी नौकरानी नहीं," रूबी ने ठहराव से जवाब दिया।
"तो ऐसा कौन सा पहाड़ टूट पड़ा? बच्चा ही तो है, ऐसे ही मज़ाक में कह दिया। इसमें इतना बुरा मानने की कौन सी बात हो गई?"
सासू माँ ने रंजीत का पक्ष लेते हुए कहा।
"नहीं मम्मी, ये अब कोई बच्चा नहीं रहा और देखा जाए तो उम्र में रूबी से बड़ा ही है। मैं भी अभी तक इसके व्यवहार को देवर-भाभी के हंसी-मज़ाक के रूप में लेता रहा, पर दिन पर दिन इसका व्यवहार खराब होता ही जा रहा है। रंजीत, चलो माफी मांगो रूबी से और आइंदा तमीज से बात करना, बड़ी भाभी है तुम्हारी,"
अमोल ने सख्ती से कहा।
रंजीत का सिर झुक गया और उसने रूबी से माफी मांग ली। रूबी को अमोल पर गर्व हुआ कि आज उन्होंने अपनी पत्नी के सम्मान की रक्षा की। उसे लगा आज उसे सच में आज़ादी मिली है—बेवजह के बंधनों और पुराने ख्यालों से।
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