"स्वामी, तुम्हारे पापा जी आम ले आए हैं, ज़रा इन्हें धोकर ले आओ," स्वामी की सास रेखा जी ने आवाज़ दी। आम का नाम सुनकर ही स्वामी सब काम छोड़कर भागती हुई आई और तुरंत धोकर डाइनिंग टेबल पर रखकर काटने लगी। तभी रेखा जी बोलीं, "बहू, काटने की ज़रूरत नहीं है। पहले सब अपनी-अपनी पसंद से आम ले लेंगे, फिर हम काट देंगे। तुम जाकर अपना काम करो।" अपनी सास की बात सुनकर स्वामी उठकर चली तो आई, पर मन वहीं आंखों में ही रह गया।
यह स्वामी की शादी के बाद ससुराल में सीज़न के ये पहले आम आए थे और आम उसे बेहद पसंद भी थे, इसलिए उसे इंतजार भी बहुत हो रहा था। पर मायके की तरह ससुराल में मर्यादा के कारण वह बिना सास के कहे आम नहीं उठा सकती थी। जैसे-तैसे वह चली गई। स्वामी की ससुराल में दो देवर, एक नंद और वे दोनों कुल मिलाकर सात लोगों का परिवार था। सब प्यार से मिलजुल कर रहते थे। सब कुछ बहुत अच्छा था, बस यहां सासु मां भी ससुर जी और बच्चों को खाना, फल वगैरह खिलाकर ही खुद खाती थीं, तो स्वामी भी तभी खा पाती थी। खाना तो ठीक है क्योंकि वह बनता ही इतना है कि कभी किसी को कम न पड़े, पर फल वगैरह तो इस महंगाई में दो किलो भी आ जाएं तो बहुत हैं। ऐसे में सभी लोग बड़े-बड़े और रसीले फल पहले उठा लेते हैं, बाद में छोटे-छोटे या थोड़े बहुत मुरझाए फल ही उन दोनों को मिल पाते हैं।
आज भी सबके खाने के बाद थाल में दो छोटे-छोटे आम पड़े थे। अगर स्वामी मायके में होती और उसे सबसे छोटा आम मिलता तो जमीन-आसमान एक कर देती, पर यहां तो जो मिला वही बहुत है। उसे बस इस बात की शांति थी कि कम से कम मिला तो, और फलों की तरह लोगों ने पूरे खत्म तो नहीं कर दिए।
अभी सास-बहू दोनों आम काटकर खाने ही जा रही थीं कि देवर-नंद फिर आ धमके यह कहते हुए, "मम्मी, भाभी, आपके यहां मीठे हैं? हमारा तो मजा ही खराब हो गया, मजा नहीं आया।" तो रेखा जी हंसते हुए बोलीं, "तुम लोग ज़्यादा के चक्कर में बड़े-बड़े आम ले लेते हो, तो वह तो कच्चे निकलेंगे ही। हमारा तो बहुत मीठा है, चखना, चखना!" में रेखा जी और स्वामी की प्लेट में सिर्फ आम की गुठली पड़ी रह गई, जिसे देख स्वामी की आंखों में आंसू आ गए।
स्वामी का मटका सा मुंह देख रेखा जी सब समझती हुई बोलीं, "कोई बात नहीं बहू, बच्चे हैं, अगर उन्होंने खा भी लिया तो कोई बात नहीं। हमारे बच्चों का पेट भरा रहे, इससे ज्यादा हम महिलाओं को और क्या चाहिए। तुम चिंता मत करो, अगली बार जब आम आएंगे, हम तब काट लेंगे।" उनकी बात सुनकर स्वामी कुछ ना बोली क्योंकि वह जानती थी कि अगली बार भी यही होगा। इस मामले में स्वामी को पति से भी कोई मदद मिलने की उम्मीद नहीं थी क्योंकि वे भी स्वामी से उम्र में बड़े देवर और बराबरी के देवर को बच्चे बोलकर उनका पक्ष लेते थे।
आखिर उसने मन ही मन एक फैसला लिया और अगली बार आम आने का इंतजार करने लगी। अगली बार जैसे ही फल खाने बैठे और सासु मां ने सबकी पसंद के आम काटने शुरू किए, स्वामी ने भी एक अलग चाकू लिया, बचे हुए छोटे आम काट लिए और सबके साथ ही सासु मां की प्लेट में दे दिए, अपने आम की प्लेट लेकर अपने कमरे में जाने लगी। पापा जी के साथ-साथ सब उसे अजीब सी नजरों से घूरने लगे, पर उसकी नंद तो कुछ ज्यादा ही आगे थी। उसने तुनकते हुए बोली, "भाभी, मम्मी, नीतू, कभी घर में जो भी आया, वह पापा जी और हम बच्चों से पहले नहीं खाया और आज आप उल्टी गंगा बहा रही हो! सबके साथ में मां को आम देकर खुद भी अपने कमरे में खाने चली गईं?"
हां दीदी, जो कभी नहीं हुआ, वह अब होगा, क्योंकि फल तो सभी को स्वस्थ रहने के लिए ज़रूरी होते हैं। हम मिडिल क्लास के लोग रोज मेवा-मिष्ठान्न नहीं खा सकते, पर पौष्टिक और हेल्दी खाना तो खा ही सकते हैं, जिसमें फल बहुत अहम होते हैं। पर मैं जब से आई हूं, तब से यही देख रही हूं, पापा जी और आप सब लोग पहले ही एक बड़ा फल या फिर कभी-कभी दो-दो भी ले लेते हो, फिर भी जब मैं और मम्मी जी अपना फल खाने बैठते हैं, आप लोग उसमें से भी खाने आ जाते हो। मम्मी जी मां होने के नाते आप लोगों से कुछ कहती नहीं, पर उनका भी मन होता होगा कि वे पूरा आम खाएं, पर उन्हें मिलता क्या है, आम की गुठली या पूरी थाली में जो सबसे छोटा होता है, वो। आप लोग शायद हमेशा से उनके साथ यही करते आए हैं, तो आप लोगों को कुछ नहीं लगता, पर मेरे मायके में ऐसा कभी नहीं होता। वहां तो मेरे पापा, मेरी दादी, कोई भी चीज घर में आने पर सबसे पहले भाभी को देते हैं और मेरी मां भी सबके साथ ही खाती हैं।
इसलिए मुझे मम्मी जी के लिए और अपने लिए बहुत बुरा लगता है, इसलिए मैं आपसे कह रही हूं कि कोई भी फल घर में आने पर सबके साथ ही मम्मी जी को काटकर दूंगी और खुद भी खाऊंगी। और मुझे नहीं लगता कि इसमें कुछ गलत है। वैसे दीदी, आपको मेरे अपने कमरे में ले जाने से इतना बुरा क्यों लग रहा है? आपने तो पहले ही घर में सबसे होने का फायदा उठाते हुए सबसे बड़ा आम अपने सामने रख रखा है।"
स्वामी की बात सुनकर उसकी नंद के पास जवाब न होने की वजह से वह बगलें झांकने लगी, और अपनी बीवी और मां के बड़े में ना सोचने की बात यूं सबके सामने आ जाने से पापा जी, देवर और स्वामी के पति चुपचाप आंखें झुकाए बैठे थे। बस रेखा जी पहली बार इतनी खुश दिखाई दे रही थीं क्योंकि जो बात उनके बच्चों ने उनके लिए नहीं सोची, वह बात उनकी बहू ने उनके लिए सोची थी। तो स्वामी को प्लेट ले अपने कमरे में जाने का इशारा कर रेखा जी आज बड़ी गर्व से एक भाग अपने मुंह में डाल, सबके साथ रसीले आम का मजा लेने लगीं। आज किसी की भी हिम्मत नहीं हो रही थी कि मां की प्लेट से एक टुकड़ा भी उठा ले चखने के लिए।
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