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जब "ब" से बेवकूफ बहु "स " से समझदार हो गयी...

 हमारा देश विविधताओं का देश है. यहाँ कदम-कदम पर भाषा, पहनावा, खान-पान, जलवायु और भी बहुत सारी विभिन्नताओं के साथ -साथ हर प्रकार के रिश्ते निभाए जाते हैं. आज मैं उन्हीं में से एक बहुत ही विशेष रिश्ते को केंद्र में रखते हुए कुछ भावनाओं को साझा करना चाहती हूँ. वैसे तो हम सभी उसे निभाते हुए किये गए क्रियाकलापों और कहे गए अमृत वचनों से कहीं कम तो कहीं ज्यादा  प्रभावित होते हैं. तो ज्यादा रहस्य न रखते हुए मैं आप सभी का ध्यान "सास -बहु" के प्यारे से रिश्ते की और खींचना चाहूँगी. हो सकता है कि कुछ बहने "प्यारे" शब्द पर ऐतराज करे जो कि बहुत ही स्वाभाविक है. परन्तु मैं कहना चाहती हूँ सोचिये कि अगर ये दोनों प्राणी और ये रिश्ता न हो तो जिंदगी में फिर बचेगा ही क्या, हम कैसे निंदा रस का पान करेंगे. न एक के द्वारा की गयी क्रिया पर  दूसरे की कोई प्रतिक्रिया होगी, न कोई ताने-उलाहने होंगे, न कोई तू-तू मैं-मैं. कुल मिलकर ये" प्यारा" सा रिश्ता ही तो है जो जिंदगी में नमक बनाये हुए है, नहीं तो जिंदगी बड़ी ही बेस्वाद होती और हमारे साथ पतियों को ही सारा मोर्चा संभालना पड़ता. पर उसमें वो मजा कहा. आखिर टक्कर कड़ी होनी चाहिए.

ये कहानी है एक नयी नवेली बहु की, जो चौबीस साल मायके में पूरे शानोशौकत और नखरे दिखाते हुए रहकर आयी थी. आते ही सासु माँ ने बड़े प्यार से आरती की और गृह प्रवेश कराया और बातों ही बातों में बाहुबली की शिवदामिनी देवी की तरह जताया कि "मेरा वचन ही है शासन " मतलब  बहु उनकी सत्ता को चुनौती देने का दुःसाहस सपने में भी न करे. कुछ दिनों के बाद ही ससुराल के मुख्यालय यानी रसोई घर में सेवाएं प्रदान करने का अवसर मिला. बहु ने सुना था कि पति के दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है सो ख़ुशी- ख़ुशी उसने अपनी माँ से सीखी पाक कला से व्यंजन तैयार किये और शाही मेज पर सजा दिए. सासु माँ ने जिस तरह मेज के चारो ओर घूम -घूम कर बिना कुछ खाये पिये निरिक्षण किया उससे ऐसा लगा जैसे वो मोर्चे पर तैनात बड़ी ही सख्त प्रहरी हैं जो उसके बनाये हुए किसी भी व्यंजन को अपने परिवार खासतौर पर अपने बेटे के पेट और फिर दिल में नहीं जाने देंगी. बहु पहले तो बहुत डरी फिर सोचा की माँ की तरह ही बनाया है तो सब अच्छा  ही होगा.

फिर आया परिणाम का दौर जो उसकी सोच से कहीं ज्यादा ख़राब था . वो ग्रेस मार्क्स से किसी तरह पास हुई थी क्योकि ये उसका पहला प्रयास था. सासु माँ की एक्सपर्ट राय के अनुसार किसी में नमक कम, किसी में मीठा ज्यादा तो कही हल्दी का नामोनिशान नहीं था, कुल मिलकर उसे खाना बनाने की कोई समझ नहीं थी, उसकी स्वाद ग्रंथियां ख़राब थी क्योंकि असली स्वाद तो वह जानती ही नहीं थी.

बहु ने सोचा चलो आगे से ध्यान रखूंगी पर उस बेचारी को कहा पता था कि वो तो एक चक्रव्यूह में फँस चुकी है और वह कोई अभिमन्यु तो थी नहीं जिसने माँ के पेट में ही सास को खुश रखने के तरीके सीख लिए हो. उसे क्या पता ऐसा असंभव कार्य तो आज तक कोई भी नहीं कर पाया उसकी अपनी सास भी नहीं.

खैर जिंदगी आगे चलने लगी. बहु बेचारी लाख जतन करती पर कुछ न कुछ कमी निकल ही जाती. कभी जीरे के चार दाने ज्यादा हो जाते, कभी हल्दी 5 मिलीग्राम कम रह जाती, कभी मसाला ३० सेकंड ज्यादा भुन जाता, कभी दूध गैस पर रखकर भूल जाती तो दूध की नदियाँ बह जाती, कभी सब्जी के टुकड़े एकसमान न होते तो कभी रोटियों में वो नरमी न होती. रसोई के बाहर भी बड़ा बुरा हाल था.

कभी कपड़े 5  मिनट धूप में ज्यादा रह जाते, कभी चादर में दस सिलवटें ज्यादा होती, उसकी जान की दुश्मन मकड़िया भी छुप कर जाने कहाँ -कहाँ जाले बुनती जिससे उसके किये सारे प्रयास उधड़ जाते. बड़ी जबरदस्त घेरा बंदी थी. उसका बचना नामुमकिन था.

सोने पर सुहागा ये कि जब भी कोई रिश्तेदार या पड़ोसी आता तो उसके सामने यही दिखाया जाता कि इसे (बहु) तो कुछ आता ही नहीं, अगर मैं (सासु माँ) ना होऊं तो जाने इस घर का क्या हो? और  बहु की तारीफों (कमियों) के इतने पुल बांधे जाते कि वो बेचारी शर्म से बस मर ही जाती और एक जाबाज़ योद्धा की तरह फिर से एक नयी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हो जाती. पर न तो चुनौतियां कम हुई, न ही उसकी बेवकूफियां (सासु माँ के अनुसार).

कभी -कभी मुझे लगता है कि ये लाइनें "इनसे कुछ होता ही नहीं, इन्हें  कुछ आता ही नहीं ..." जरूर किसी सास ने ही सुझाई होंगी. वैसे यहाँ बहु के पति का जिक्र करना बेमानी होगी क्योंकि वह तो सैंडविच के आलू की तरह हो गया था जिसे बहुत सारे लोग खाने से पहले ही बाहर निकल देते है.

एक दिन घर में पूजा होनी थी, घर एकदम हाई अलर्ट पर था, धारा 144  लगी थी. बहु और पति साथ बैठकर किसी भी कोने में बातें नहीं कर सकते थे. सामान की सूची बनाई जा चुकी थी. खाने  का मेन्यू बन चुका था और समय की मांग पर (असल में सासु माँ की ) बहु को सुबह सवेरे चार बजे उठकर सब तैयार करना था. बहु ने स्थिति  की गंभीरता को देखते हुए रात में जल्दी ही सोने का निश्चय किया. पर बड़ी रंगीली सुबह उसका इंतजार कर रही थी. अब उसके जीवन में बड़ा बदलाव आने वाला था.

सुबह की टेंशन में बहु सारी रात सो ही न पायी और सुबह करीब तीन बजे के आस -पास उसकी जो आंख लगी तो कोई अलार्म भी उसे न उठा सका. बस इसी मौके का इंतजार तो सासु माँ कर रही थी कि वो समय से न उठ पाए और सासु माँ अपनी न सिर्फ पाक कला बल्कि समय प्रबंधन की सीख उसे सारे मौहल्ले के सामने पढ़ा सके और अपने ताज में एक और नगीना जड़ सके. फिर क्या था उन्होंने सारा काम जल्दी-जल्दी इस तरह खत्म किया कि शोर शराबे से बहु की नींद न खुल जाये.

उधर बहु की नींद आठ बजे खुली तो मानों भूचाल आ गया. जल्दी से नहा धोकर रसोई में गयी तो सासु माँ की बड़ी सी रहस्यमयी मुस्कान के मतलब को समझने का असफल प्रयास करते हुए पाया कि सब कुछ तैयार था और सासु माँ भी कुछ नहीं कह रही थी. किसी अपराधी की तरह वह गलती स्वीकार करते हुए प्रायश्चित में जो कुछ भी कर सकती थी किया. पूजा का आसन तैयार किया, सामान रखा, चादरे बिछाई,  आने वाले मेहमानो के पैर छुए और पूजा मैं बैठ गयी. पूजा ख़त्म  होने के बाद उसकी काम करने की काबिलियत और तरीकों  का जो गुणगान हुआ तो वह उसके आंसुओं की श्रद्धांजलि पर ही रुका. वह बहुत उदास थी आज तो हद ही हो गयी, पूजा में भी नहीं बख्शा .

सोचते सोचते वह सो गयी और सपना देखने लगी. उसकी अंतरात्मा कह रही थी  "तू भी मुर्ख है इतने दिनों से समझाने की कोशिश कर रही हूँ पर तू है कि समझती ही नहीं. सासु माँ को खुश करना सूर्य के पश्चिम में उगने के बराबर है. तू चाहे जो कर ले रहेगी तो हमेशा ही बेवकूफ. तो बेवकूफ ही रह न, अगर वो कहती है कि उन जैसा काम कोई नहीं कर सकता तो कोई नहीं कर सकता इसलिए उन्हें ही करने दो ना, क्योंकि आखिरकार वो तो बेस्ट हैं "

सुबह का सूरज अंगड़ाइयां ले रहा था, बहु के देर से उठने के कारण सासु माँ नाश्ते की तैयारी कर चुकी थी और उधर बहु भी जिंदगी जीने के लिए तैयार थी . उसे समझ आ गया था कि उसे हर काम में  ऐसे ही बेवकूफ बने रहना है फिर जल्दी से रसोई में जाकर उसने सबके लिए नाश्ता बनाया. सासु माँ के व्यंग्य भरे बाणों से बचते हुए  उसने उनकी तैयारी और रेसेपी की तारीफ की. बस सासु माँ  चाह कर भी और तीर ना  चला पायी क्योंकि बहु ने उन्हें "स " से समझदार और खुद को "ब"  से बेवकूफ स्वीकार लिया था.

नोट :यह रचना सिर्फ हंसी-मजाक के तौर पर लिखी गयी है. मेरा किसी की भावनाओ को आहत करने का कोई इरादा नहीं है .त्रुटियों के लिए क्षमा करे.

Copyright@अभिलाषा 


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