"पापा जी, मम्मी जी, यह क्या तरीका है? आप दोनों हर समय मेरे कमरे में क्यों बैठे रहते हैं? इस घर में कोई प्राइवेसी ही नहीं है। जिसे देखो, जब देखो, मुँह उठाए चला आता है। आपके कमरे का एसी खराब है तो इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि जब मैं ना हूँ, तब आप मेरे कमरे में बैठेंगे। मैं आज ही केतन से बात करती हूँ, हमें कहीं अलग घर का इंतजाम कर लेना चाहिए।"
आयुषी जैसे ही किटी पार्टी से घर लौटी और देखा कि उसके सास-ससुर दोनों आराम से एसी चलाकर बैठे रामायण देख रहे हैं, तो यह देखते ही उसका पारा गरम हो गया और उसने उन्हें अपमानित कर दिया। बहू के मुँह से ऐसे अपमानजनक शब्द सुनकर विनोद जी और उनकी पत्नी उर्मिला जी की आँखों में आँसू आ गए। उर्मिला जी अपना अपमान तो बर्दाश्त कर लेती थीं, लेकिन पति विनोद जी का अपमान सहन न हुआ, इसलिए बोल पड़ीं, "बोलते समय सोच लिया करो, तुम्हें अपने ससुर जी से ऐसे तो नहीं बात करनी चाहिए। वो तो आज इनसे गर्मी बर्दाश्त नहीं हो रही थी, इसलिए यहाँ आ गए। तुम्हें उनसे इज्जत से बात करनी चाहिए, उनका सम्मान घर-बाहर सभी लोग आज तक करते हैं। डॉक्टर रह चुके हैं वो। आज उनके घर में उनकी बहू उनसे ऐसे अपमानजनक शब्दों में बात कर रही है। उन्होंने इतना कमाया है जीवन भर, एक एसी वगैरह बहुत बड़ी चीज नहीं है, आसानी से लगवा सकते थे। लेकिन तीनों बच्चों का भविष्य बनाने के लिए अपनी सुख-सुविधा कभी नहीं देखी। और यह आज अपने कमरे पर बड़ा अकड़ रही हो, यह भी तुम्हारे ससुर जी ने पाई-पाई जोड़कर ही बनाया है।"
"मम्मी जी, मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा है। एक में बैठकर रामायण देखने का इतना ही शौक है तो अपने कमरे में लगवा लीजिए। यह तो मेरे पति की कमाई का है, इसलिए इस पर सिर्फ मेरा हक है," आयुषी ने कहा।
"आयुषी बेटा, ये घर तुम्हारे पति से पहले मेरे पति का है, और जिस पति की कमाई पर इतना इतर रही हो, तुम शायद भूल गई हो, वह मेरा बेटा पहले है। वह तो हम लोग उसे तुम्हारी हरकतों से अवगत नहीं करते, वरना वह कभी अपने माता-पिता का अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा," इतना कहकर दोनों वृद्ध पति-पत्नी अपने कमरे में चले गए।
विनोद जी और उर्मिला जी के दो बेटे, केतन और कुणाल, और एक बेटी काव्या है। केतन सिविल इंजीनियर है, उसकी शादी हो चुकी है, उनके एक बेटा सृजन भी है। केतन का परिवार अपने माता-पिता के साथ उनके बनवाए हुए घर में ही रहता है। बेटी काव्या भी ससुराल चली गई है, वहाँ वह सुखी है, माता-पिता के पास भी बराबर आती-जाती रहती है। सबसे छोटा बेटा कुणाल बाहर रहकर अभी पढ़ाई कर रहा है।
विनोद जी अपने शहर के होम्योपैथी के जाने-माने डॉक्टर हैं, उनकी मेडिकल सुपरवाइजर की सरकारी नौकरी भी है और अपना क्लीनिक भी खोल रखा है, जहाँ वह अस्पताल से आने के बाद बैठते हैं। शहर में अच्छी-खासी हैसियत बनाई है उन्होंने। तीनों बच्चों की जिंदगी सँवारने में दोनों पति-पत्नी ने अपनी इच्छाओं को भूलकर दिन-रात एक कर दिया। आजकल उनकी तबीयत ठीक नहीं रहती है, तो घर पर ही आराम कर रहे हैं।
विनोद जी हमेशा अपनी पत्नी से कहते, "देखना, आज हम बच्चों के लिए कर रहे हैं, कल बुढ़ापे में यही बच्चे हमारे लिए करेंगे, तुम चिंता मत करो, हमारा बुढ़ापा बहुत बढ़िया गुजरेगा।" उर्मिला जी भी हँस कर कहती, "ये तो आने वाला समय बताएगा।"
बड़ा बेटा केतन भी अपने पिता के समान ही बहुत ईमानदार और भावुक है और अपने परिवार से बहुत प्यार करता है। उसकी यही कोशिश रहती कि उसके माता-पिता को किसी बात की कोई कमी न रहे। लेकिन उसकी पत्नी आयुषी को अपने सास-ससुर दोनों ही खटकते थे। वह आए दिन उनका अपमान करती रहती। वे दोनों भी घर की सुख-शांति के लिए बेटे से कुछ कहते नहीं थे। आयुषी बोलते समय यह भूल जाती कि उसकी ये सब हरकतें उसका बेटा सृजन देख रहा है। वह अपने दादी-बाबा से बहुत प्यार करता है। उसे मम्मी का दादी-बाबा से इस तरह बोलना पसंद नहीं आता था, लेकिन बच्चा है, तो कुछ कह नहीं सकता।
एक दिन उसने अपने पिता केतन से रात में पूछा, "पापा, आप अपनी मम्मी-पापा से प्यार नहीं करते?"
"मैं दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार अपने माता-पिता से ही करता हूँ, क्योंकि वे मेरे लिए भगवान से पहले आते हैं। उन्होंने खुद कष्ट सहकर हम भाई-बहन को सारी सुख-सुविधाएँ देकर इस काबिल बनाया है कि आज हम अपने पैरों पर खड़े हैं। लेकिन तुम्हारे साथ क्यों पूछ रहे हो?" केतन ने सृजन से पूछा।
"अगर आप अपने मम्मी-पापा को प्यार करते हैं, तो फिर मम्मा को क्यों नहीं डाँटते कि वे उनसे ऐसे बात न किया करें?"
"क्या किया आपकी मम्मा ने?" सृजन ने उस दिन वाला पूरा वृत्तांत अपने पिता से कहा-सुनाया।
केतन बेटे के मुँह से ये सब सुनकर दंग रह गया कि वह तो समझता था कि उसकी पत्नी उसके माता-पिता की इज्जत करती है, उनकी देखभाल करती है, लेकिन वह तो उनके साथ दुर्व्यवहार कर रही है। उसने तुरंत आयुषी को आवाज़ लगाई और पूछा, "सृजन क्या कह रहा है? उस दिन तुमने मम्मी-पापा को अपमानित करके अपने कमरे से बाहर निकाल दिया?"
इस पर आयुषी बोली, "उन लोगों ने भी सारी हदें पार कर दी हैं। वो मेरे कमरे में क्यों आकर बैठते हैं? और मैंने सिर्फ अपनी बात कही है," फिर रुक कर बोली, "ओहो, तो माता-पिता ने बेटे से बहू की चुगली कर दी!"
"जुबान संभाल कर बात करो, आयुषी! वो मेरे जन्मदाता हैं और ये घर उनका है। हम लोग उनके साथ रहते हैं, वो जहाँ चाहें, बैठ सकते हैं, उन्हें रोकने-टोकने वाली तुम कौन होती हो? अगर तुम्हें इतनी ही परेशानी है उनसे, तो तुम कहीं भी जा सकती हो। लेकिन मैं अपने माता-पिता को वृद्धावस्था में अकेला छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा। और एक बात हमेशा याद रखना, सृजन तुम्हारी हर बात नोट करता है। कल को कहीं ऐसा न हो कि वो भी तुम्हारे साथ वही करे, जो तुम आज मेरे बूढ़े माता-पिता के साथ कर रही हो। इंसान को उसके बुरे कर्म सुध समेत वापस मिलते हैं। मैंने तुमसे शादी इसलिए नहीं की थी कि तुम मुझे मेरे माता-पिता से दूर कर दो, बल्कि इसलिए की थी कि तुम मेरी तरह ही मेरे माता-पिता का ख्याल रखकर इस वैवाहिक साझेदारी को बखूबी निभाओगी, मुझे उनसे दूर नहीं करोगी, बल्कि अपने सेवा-भाव से और भी पास ले आओगी।"
"केतन, मुझे माफ कर दो, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। आगे से मैं कभी भी उनसे ऐसे बात नहीं करूँगी। और सृजन बेटा, प्लीज तुम भी अपनी मम्मा को माफ कर दो।"
केतन जब तक कुछ बोलता, तब तक उसके माता-पिता वहाँ आ गए और बोले, "केतन, सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते। आयुषी माफी माँग रही है, उसे माफ कर दो। हम लोग तो बस तुम्हारा सुखी संसार देखना चाहते हैं और कुछ नहीं।"
केतन और आयुषी उनके चरणों में झुक गए और उन्होंने उन्हें गले लगा लिया। जिस माता-पिता का केतन जैसा बेटा और सृजन जैसा पोता होगा, उनके साथ तो कभी कुछ गलत हो ही नहीं सकता। आज सृजन अपने दादू के पास उछलता हुआ उनके गले से चिपक गया और दोनों से प्यार करने लगा।
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