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सिल्क की साड़ी

 "तू मद्रासी बीबी तो ले आया है पर उसे अच्छे से समझा देना कि रीति रिवाज, पूजा पाठ, पहनावा सब उसे हमारे तरीको से ही करना पड़ेगा."

सुखदीप कौर ने पुत्र अंगद को पास बैठाते हुए कहा तो अंगद मां की बात पर मुस्कुराहट भरी हांमी देकर रह गया.

"तुम बेफिक्र रहो मम्मा मैं  बेला को सब समझा दूंगा"

अंगद एक  प्री वेडिंग शूट फोटोग्राफर था.कुछ ही सालो में उसने अपने प्रोफेशन में काफी नाम कर लिया था. बेला से उसकी मुलाकात करीब पन्द्रह महीने पहले नैनीताल में हुई थी. उस समय वो दिल्ली के एक जोड़े की प्री वेड शूट नैनीताल के जंगलों में कर रहा था.बेला होने वाली दुल्हन की खास सखी होने के नाते पूरी शूटिंग में साथ साथ थी.सप्ताह भर की शूटिंग के दौरान अंगद और बेला में अच्छी जान पहचान हो गयी थी.

अपने पेशे के प्रति अंगद का जुनून बेला को भा गया था.उधर अंगद भी बेला की सौम्यता से बेहद प्रभावित हुआ था.

शूट के बाद दोनों अक्सर फोन पर बाते करने लगे थे.धीरे धीरे दोस्ती की नैया प्रेम रूपी किनारे पर आ खड़ी हुई थी.पर सिख समुदाय के अंगद के लिए बेला का दक्षिण भारतीय होना एक बड़ी समस्या  थी.

"बेला मेरे घर वाले खासकर मेरी माँ काफी रूढ़िवादी है.जब मैं उनके सामने तुमसे विवाह का प्रस्ताव रखूंगा तो पता नही वो कैसे रियेक्ट करेगी."

"पर अंगद मैं तुम्हारे प्रेम में इतनी दूर आ चुकी हूं कि अब इस मोड़ से वापस होना मेरे लिए बेहद कठिन है."

अंगद जानता था कि उसके परिवार में मां की सहमति के बगैर कुछ भी नही हो सकता है दूसरी तरफ वो बेला के अलावा किसी और से विवाह की कल्पना भी नही कर पा रहा था.

एकदम शुद्ध पंजाबी परिवार की लड़की को बहु बनाकर लाने का सपना संजो कर बैठी सुखदीप को एक तमिल पुत्रवधु के लिए तैयार कर पाना लगभग नामुमकिन सा लग रहा था.

असमंजस में फंसे अंगद ने तब अपने सारे पत्ते चल दिये थे. भैया भाभी, दीदी जीजाजी से लेकर उसने पड़ोस के खन्ना अंकल और आंटी को मां को तैयार करने का जिम्मा सौंप दिया था.

अंततः किसी तरह सुखदीप आधे मन से ही सही तैयार हो गयी थी.

मां की शर्तों के अनुसार विवाह में खाने पीने के मेनू से लेकर साज सजावट सबकुछ बिल्कुल पंजाबी अंदाज में हुआ था. पर स्टेज में वरमाला की रस्म के बाद लड़की वालों ने डीजे में तमिल गाने लगवाकर खूब तमिल डांस किया था.तब से सुखदीप के मन मे और भी आशंका घर कर गई थी कि तमिल बहु कहि घर के पंजाबी रीति रिवाज को छिन्न भिन्न न कर दे.

विवाह के बाद से ही सुखदीप कौर की नजर बेला के पहनावे और किचन में बनने वाली डिशेश पर रहती थी.बेला ने जेठानी की मदद से पंजाबी परिधान खरीद भी लिए थे और उन्हें पहनना भी सीख लिया था.तमिल साहित्य में मास्टर कर चुकी बेला को पंजाबी रिवायतें सीखने में आनन्द आ रहा था.रसोई में भी ज्यादातर पंजाबी भोजन ही बनता और बेला जानबूझकर सासु मां के सामने चटकारे लेकर खाती थी.

ये सब देख सुखदीप को थोड़ी तसल्ली होने लगी थी.

सभी उत्तर भारतीय पर्व त्यौहारों को बेला पूरे उत्साह के साथ परिवार में घुलमिल कर सेलिब्रेट करने लगी थी.अंगद भी पत्नी बेला के सहयोग से खुश था पर कई बार उसे लगता था कि बेला तमिल माहौल में पली बढ़ी है.आखिर उसे भी तमिल त्योहारों को अपने तरीके से मनाने का अधिकार है.उसे भी तमिलनाडु के परम्परागत ड्रेसस पहनने का मन करता होगा.मन ही मन वो अपराधबोध से ग्रसित हो जाता था.

मां को छोड़ घर के बाकी सारे लोग भी चाहते थे कि वे सब बेला के संग तमिल त्योहारों का भी भरपूर आनन्द ले.पर सुखदीप कौर के सामने किसी की हिम्मत नही थी.

अप्रेल में तमिल त्योहार पृथान्दू आने को था.बेला का मन थोड़ा अधीर हो रहा था.इतने सालों से वो इस दिन कितनी तैयारियां करती थी घर मे.घर की साफ सफाई, हर दरवाजे पर रंग बिरंगे फूलो और चावल की रंगोली बनाना फिर तामिलनाडु की विश्व प्रशिद्ध सिल्क की साड़ी पहनकर दोस्तो और रिश्तेदारों के घर जाना.तरह तरह की डिशेस बनाना और खाना.

अंगद ने भैया भाभी के साथ तय किया था कि किसी बहाने माँ को सप्ताह भर के लिए मामाजी के घर भेज दिया जाय.ताकि बेला के साथ घर मे पृथान्दू सेलिब्रेट किया जा सके.

सारी योजना बन गयी थी .मांजी को मामाजी के पास गुरदासपुर जाने के लिए दोनो भाईयो ने मना लिया था.

अंगद बेला को खुशखबरी देने वाला था कि वो इस बार भी अपने प्रिय फेस्टिवल का आनन्द ले सकेगी.

"बेला कल मामाजी आ रहे है मम्मी को लेने.मैंने और भैया जी ने उन्हें सब समझा दिया है.सप्ताह भर माँ रहेगी वहाँ तब हमसब आराम से पृथान्दू मनाएंगे."

"पर अंगद कोई भी फेस्टिवल घर के बुजुर्गो के आशीर्वाद से शुरू होता है.मैं जानती हूं कि तुम्हे मेरी खुशियों का ख्याल है पर मांजी को झुठबोलकर मामाजी के पास छोड़कर हम यहां त्योहार कैसे मना सकते है.मम्मी जी के बिना न तुम खुश रहोगे और न मेरी आत्मा को चैन मिलेगा."

माँ को भेजने का प्रोग्राम अंततः बेला ने रद्द करवा दिया था.

पर उसने त्योहार की रस्मो के अनुसार तड़के उठकर पूरे घर की सफाई कर दी थी.मुख्य द्वार को फूलो की सुंदर सी रंगोली से सजा दिया था.

रोज की तरह सासु मां ने सुबह उठकर बिस्तर से ही चाय के लिए बहुओं को आवाज लगाई तो सिल्क की साड़ी और मोगरे के गजरे में दक्षिण भारतीय अंदाज में सजी बेला ने सुखदीप के पांव छुए तो सुखदीप कुछ समझ नही पाई.पर बहु का इतना खूबसूरत रूप देख सुखदीप दंग सी रह गयी थी.

तब तक अंगद भी माँ के पास आ गया था.

मां आज तमिल त्योहार पृथान्दू है....बिल्कुल दीपावली की तरह.

घर को बेला ने एकदम चमका दिया था.सुंदर सी रंगोली देखकर तो सुखदीप बेहद प्रसन्न हो गयी थी.किचन में बड़ी बहू पकवान बनाने में लगी थी.

सासु माँ को समझ आ गया था कि भाषा और खानपान की भिन्नता के बावजूद बेला के मायके के  त्योहारों में भी अन्य त्योहारों की तरह ही बड़ो का आशीर्वाद ,साफ सफाई, बढ़िया पकवान और बेहद सुंदर परिधान ही तो है.फिर कैसे बेला कुछ अलग थी उनसभी से.देश के उस हिस्से के लोगो की सोच और परम्परा को लेकर मन मे जम चुकी भरम की गन्दगी धुलने लगी थी.

सुखदीप छोटी बहु बेला को जी भरकर आशीर्वाद देने लगी तो बड़ी बहू -बेटे और अंगद ने भी अपने मन की पूरी कर ली थी. वे भी ट्रेडिशनल तमिल ड्रेस पहनकर मां के सामने आ खड़े हुए.पर उन्हें इस पहनावे में देख सुखदीप एकदम गम्भीर हो गयी थी.

"बहु अगली बार मेरे लिए भी मद्रासी टेस्ट की साड़ियां लाकर रखना घर पर"

अब सारे लोग खिलखिला उठे थे.

पूरा परिवार माँ के चरणों मे बैठ गया था.और सुखदीप समझ गयी थी कि असली संस्कार और रीति रिवाज घर की इन्ही खुशियों में है .


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