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बर्ताव

 प्रीति रसोई से पसीना पोंछते हुए निकली ही थी कि उसे बगल वाले कमरे से पुलिस आने की आवाज आई। प्रीति ने कमरे में झांका तो देखा कि साधना जी अपनी बेटी से धीमी आवाज में फोन पर बात कर रही थीं।

"बेटा रेनू, हमारा क्या है, आज नहीं तो कल चले जाएंगे, मगर तेरी भाभी को इतनी समझ तो होनी चाहिए कि अपनी सास को अच्छा-अच्छा खाना खिलाए। जब देखो रोटी, सब्जी, दाल, चावल यही बनाती रहती है। क्या रोज-रोज यह खाना भाता है? तेरी भाभी सुबह सात बजे उठती है, घर की लक्ष्मी को तो सूरज निकलने से पहले उठ जाना चाहिए, मगर उसे कौन समझाए! कपड़े धोने के लिए मशीन लगाती है, झाड़ू-पोछा, बर्तन—सभी के लिए बाई लगा रखी है। ठाठ-बाट तो देखो महारानी के! हम तो हमेशा अपने कपड़े हाथ से ही धोते थे। और कामवाली बाइयों के काम भला किसे पसंद आते हैं!"

प्रीति ने सब कुछ सुना और अपने कमरे में आकर बैठ गई। उसकी आंखों में आंसू थे और वह अतीत में खो गई, जब शादी करके इस घर में आई थी। साधना जी और रेणु ने उसे कभी बहू वाला मान-सम्मान नहीं दिया और न ही किसी को देने दिया। पति आलोक भी हमेशा प्रीति को ही सुनाते। प्रीति को इस बात का ज्यादा अफसोस होता था कि पति भी साथ नहीं देते, उल्टा मां और बहन के बहकावे में आकर प्रीति पर ही गुस्सा निकालते हैं। एक दिन तो साधना जी का पारा ऐसा चढ़ा कि उन्होंने प्रीति के माता-पिता तक को भला-बुरा कह दिया था, मगर आलोक या तो चुपचाप सुनते या फिर अपनी मां का ही साथ देते।

अब तो प्रीति की आदत हो गई थी कहानी और उलाहनों की। ऐसा नहीं है कि प्रीति को गुस्सा नहीं आता था, मगर पलटकर जवाब देना उसके संस्कारों में नहीं था। वह मन ही मन कुढ़ती, मायके में भी नहीं बता सकती थी; उसके माता-पिता की भी उम्र हो चली थी, इसलिए वह उन्हें कोई टेंशन नहीं देना चाहती थी।

पति आलोक का तबादला दूसरे शहर में हो गया, जिस वजह से दोनों वहां जाकर बस गए। दूसरे शहर जाकर छह महीने ही हुए थे कि सासू मां साधना जी को हार्ट अटैक आ गया और ऑपरेशन करवाकर सास और ससुर जी को आलोक वहीं ले आए। बेटी रेणु की शादी हो गई थी, तो अब साधना जी फोन पर बेटी को सारी राम कहानी सुनाती थीं।

"मम्मा, मम्मा!" कहते हुए चार साल की नव्या जब कमरे में आई तो प्रीति की तंद्रा टूटी। उसने नव्या को गोद में भर लिया और उसके साथ खेलने लगी।

साधना जी बोलीं, "प्रीति, खाना बन गया हो तो लगा लो।"
प्रीति रसोई से दाल, चावल, सब्जी, रोटी ले आई। उतने में आलोक भी आकर डाइनिंग टेबल पर बैठ गया। आलोक को देखते ही साधना जी बोलीं, "मुझे तो आजकल खाने में कोई स्वाद ही नहीं लगता, यह बीमारों वाला खाना रोज-रोज खाया नहीं जाता।"
आलोक बोला, "मां, आपको तला हुआ और चटपटा खाना खाने के लिए डॉक्टर ने मना किया हुआ है, इसलिए प्रीति रोज यह खाना बनाती है। पकोड़े, वड़ा, समोसे—यह सब हम भी नहीं खा रहे हैं। बल्कि आपको तो यह सोचना चाहिए कि आपकी वजह से घर में तला हुआ खाना बन ही नहीं रहा है और कोई नहीं खा रहा है। पिछले साल आपकी सर्जरी हो चुकी है, आपके हार्ट की समस्या की वजह से घर में तेल-घी का इस्तेमाल काफी कम हो गया है, हम भी नहीं खाते।"

साधना जी बेटे का जवाब सुनकर चुप बैठ गईं।

दूसरे दिन सुबह जब प्रीति कपड़े धोने की मशीन चला रही थी, साधना जी बोलीं, "बहू, हर रोज मशीन लगाती हो, जानती हो बिल कितना होता है?"
आलोक ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था, वह सुनकर बाहर आया और बोला, "हां, मां, हम जानते हैं बिल कितना आता है और वह बिल मैं भरता हूं, इसलिए आपको चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। और अगर प्रीति दिनभर कपड़े, बर्तन यही करेगी तो दूसरे काम कब करेगी?"
साधना जी फिर चुप बैठ गईं।

प्रीति के लिए यहां पर जिंदगी के खुशनुमा पल थे जब पति आलोक उसका साथ देता था। आज आलोक पहली बार प्रीति के लिए गजरा लेकर आया था और अपने हाथों से उसे प्रीति के बालों में लगाते हुए बोला, "प्रीति, हो सके तो मुझे माफ कर देना।"
प्रीति बोली, "क्यों?"
आलोक बोला, "एक रोज मैं अपने कमरे में ऑफिस का काम कर रहा था, मुझे बगल वाले कमरे से मां की आवाज सुनाई दी। वह रेणु को तुम्हारे खिलाफ बातें बता रही थीं और जब मैं कमरे से बाहर आया तो मैंने तुम्हें यह सब सुनते देखा। तुम अपने कमरे में आकर रो रही थी। तब मुझे पहली बार यह समझ आया था कि अब तक मैंने जाने-अनजाने में कितनी बार तुम्हारा दिल दुखाया होगा।"
प्रीति बोली, "आप सब समझ गए और आपने मेरा साथ दिया, यही मेरी जिंदगी के सबसे खुशनुमा पल हैं। मैं इन्हें कभी नहीं भूलूंगी।"

आशा करती हूं दोस्तों, आपको हमारी कहानी जरूर अच्छी लगी होगी। धन्यवाद।


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