" पूर्वी! लहंगे का देखा क्या? याद से लेकर आ जाना बुटीक से... ज्वेलरी भी खरीदनी होगी ना...और अपनी जयपुर वाली दोस्त को कार्ड भिजवा दिया...देवी बुआ एक महीने पहले आ जाएंगी...उनका कमरा भी तैयार करना है... "
गरिमा बड़बड़ाती हुई अपनी बेटी पूर्वी के इर्द-गिर्द परेशान घूम रही थी। पूर्वी को माँ की ये हालत देख कर हँसी आ गई।
"माँ! शादी मेरी है और नर्वस तुम हो रही हो...बहुत टाईम है अभी.. सब हो जाएगा "
पूर्वी ने कह तो दिया पर वह अपनी मां को जानती थी, हर काम में परफेक्शनिस्ट गरिमा भला बेटी की शादी में कोई कमी कैसे छोड़ देती। पूर्वी ने शुरू से ही देखा है मां को घर संभालते हुए, दौड़ते हुए हर एक चीज को समय से पहले निपटाने की धुन में लगी हुई और अगर कुछ भी गड़बड़ हो तो उसका सारा दोष अपने माथे मढ़ लेती थी। अपने पति बच्चे रिश्तेदार और सारे समाज को खुश करने की पूरी कोशिश में लगी हुई गरिमा के चेहरे पर पूर्वी मुस्कान तब ही देखती जब वह उसके पास बैठी रहती, फुर्सत के दो पल...वह दुनिया जहान की खूब सारी बातें करते थे...तब गरिमा पूर्वी की मां नहीं होती थी वह दोनों सहेली होती थी।
पूर्वी को धीरे-धीरे टेंशन होने लगी थी कि जब वह शादी करके चली जाएगी तो मां फिर से अकेली पड़ जाएंगी.. उनको कौन समझाएगा। 2 महीने बाद पूर्वी की शादी थी और गरिमा ने सारी जिम्मेदारी अपने सर पर ले रखी थी। ऐसा नहीं था कि कोई मदद करने वाला नहीं था पर परफेक्शन की चाहत ऐसी कि गरिमा को किसी पर भरोसा भी नहीं था। गरिमा ने पूर्वी को बताया था कि वह हमेशा से ऐसे ही नहीं थी। अल्हड़ सी गरिमा उम्र के 18 वे साल में ही शादी करके ससुराल आ गई थी और हर काम में समय की पाबंदी के साथ उसको गुणवत्ता के साथ खत्म करने की शिक्षा गरिमा की सास ने ही दी थी। शुरू शुरू में गलतियां होने पर घर में अम्मा जी के गुस्से का प्रतिभाग करने के लिए कोई भी गरिमा का साथ नहीं देता था और वह रोती थी। फिर खुद से सीख लेती, मजबूरी में अपनाई गई जीवन शैली धीरे-धीरे गरिमा के जीवन का हिस्सा बन गई। उसे लगने लगा शायद अम्मा जी सही ही होती थी.. हर काम को समय के पहले पूरा करने से काम में गलती होने की संभावना कम हो जाती है.. अम्मा जी के दुनिया से जाने के बाद घर वाले गरिमा की आदत से परेशान रहने लगे थे। जैसे अम्मा जी अपनी विरासत में गरिमा को अपनी आपाधापी देकर चली गई थी। कोई त्यौहार हो या बच्चों का पिकनिक हो या कहीं घूमने जाना हो घर में ऐसा लगता कि भूचाल आ गया है। जब तक एक एक काम ठीक से नहीं हो जाता तब तक गरिमा की साँस ऊपर नीचे अटकी रहती। उसे एंजाइटी के दौरे पड़ने लगते, कभी-कभी बेहोश भी हो जाती थी। फिर पूर्वी बड़ी हुई तो मां को काफी संभाल लिया था। फिर भी आदतें धीरे-धीरे कम तो हुई थी पर खत्म ना हुई थी।
अब पूर्वी को चिंता सता रही थी कि उसकी शादी के बाद मां का क्या होगा?
धीरे-धीरे शादी के डेट नजदीक आने लगी और तैयारियां लगभग पहले ही पूरी हो चुकी थी। मेहमान आने शुरू हो गए थे और साथ ही गरिमा को एंजायटी के दौरे भी...कहीं कोई कसर रह ना जाए, कहीं कोई नाराज ना हो जाए, सबको सब की पसंद का खाना मिल जाए, सबकी अच्छी सी विदाई हो जाए...फंक्शन की थीम से लेकर शादी के मेन्यू तक सब कुछ गरिमा ने अपने हाथ से तय किए थे।
हल्दी की शाम को पूर्वी ने छत पर गरिमा को बुलाया। बेचैन मां दौड़े-दौड़े गई क्या पता बिटिया को कोई कमी रह गई क्या? गरिमा ने देखा पूर्वी खाने की थाली हाथ में लेकर बैठी थी
"तुम ऐसे ही रहोगी ना मां...और मैं तुम्हारी चिंता में वहां बेचैन रहूंगी.. पता भी है तुमने सुबह से कुछ नहीं खाया है...दौड़ रही हो.. ऐसा करोगी और बीमार हो जाओगी तो क्या मैं खुश रहूंगी? मैं तो सोचती हूं शादी कैंसिल कर दूं...मेरे बिना तुम्हारा क्या होने वाला है? "
गरिमा ने पूर्वी के मुंह पर हाथ रख दिया।
" ऐसे शुभ अवसर पर ऐसे अशुभ बातें नहीं किया करते हैं...मैं ठीक हूं...हो जाता है कभी-कभी खाना देर..."
" हाँ पर आपको मालूम है ना, आपकी तबीयत बिगड़ जाती है...खाली पेट रहने से!"
" सब हो जाएगा पूर्वी! बस ये शादी अच्छे से हो जाए"
" नहीं मां आप इंजॉय क्यों नहीं कर रहे हो? आपको हर चीज निपटाना ही क्यों होता है? भले ही आपको बुरा लगे पर मैं आपसे साफ-साफ कहना चाहती हूं आपकी इस आदत से सब परेशान होते है, साथ-साथ खुद भी परेशान होती हो...कभी अपना चेहरा देखना आईने में इस हालत में जब आप ही खुश नहीं रह पाते हो तो...फिर बाकी कैसे खुश रहेंगे? "
" देखा शादी होने लगी और बड़ी-बड़ी बातें करने लगी...मैं कोशिश कर रही हूं पर तेरी शादी में तो कोई कमी नहीं छोड़ सकती "
" अच्छा ठीक है चलिए अभी खाना खा लीजिए "
पूर्वी ने प्यार से मां को अपने हाथों से खाना खिला दिया। दो दिन बाद शादी हो गई और सब अच्छे अच्छे से निपट गया। पूर्वी की विदाई के बाद कहां गरिमा ने सोचा था कि शायद सुकून मिलेगा सब काम निपट जाने की वजह से, पर एक अलग सी बेचैनी मन में घर कर गई थी। जैसे लग रहा था कि इतने साल की भाग दौड़ में निकाल दिया... सब कुछ धीरे-धीरे होता तो कितना अच्छा होता। अब ऐसा लग रहा था जैसे उसके पास करने के लिए कुछ भी नहीं है। खाली समय काटने के लिए गरिमा पूर्वी के कमरे को ठीक करने लगी, तभी गरिमा के मोबाइल पर एक मैसेज आया
" मां! मेरी अलमारी को चेक करना"
गरिमा को लगा शायद पूर्वी का कोई जरूरी सामान छूट गया होगा। गरिमा ने पूर्वी का अलमारी खोला और उसके दराज में उसे एक नीला लिफाफा मिला। उस पर लिखा था
" मेरी हेलीकॉप्टर माँ के लिए"
अंदर पूर्वी ने गरिमा के लिए एक कविता लिखी थी।
कल करना है वो आज कर लें
आज करना है वो अभी इस पल कर जाते हैं
इस बात का पीछा करते हुए
हम चैन कभी नहीं पाते है
सब कुछ आज मे निपटाने की इच्छा
इस चाहत में, हर पल खुद को तड़पाते है
याद रहे ,
इच्छाओं और जिम्मेदारियों का कमल तो
हर पल मन में खिलता है
खुद को परेशान करने का अवार्ड भला कहां मिलता है
सुनो! कुछ काम कल पर टाल देना भी चलता है
मैं माँ हूं मुझे ये करना है
मैं पत्नी हू मुझे ये करना है
एक बहू हूं, पड़ोसी हूं किसी ऑफिस की कर्मचारी हूं
हाँ सामाजिक प्राणी हूं मैं, सबकी खुशियों की व्यापारी हूं
पर इन सब के बीच में एक इंसां को भूल गई मैं
हाँ भाग दौड़ में भूल गई, मैं अपनी भी जिम्मेदारी हूं
याद रहे
ये सब कोरे बहाने है कि वक्त कहाँ मुझे मिलता है
हाँ बर्फ हो चुका मन तुम्हारा, सही आंच पर धीमे धीमे पिघलता है
सुनो! कुछ काम कल पर टाल देना भी चलता है
शेल्फ पर किताबे घूर रही
पन्नों की धूल पर हाथ अपना फ़ेर दो
दीवार से टीका गिटार कह रहा
आज धुन नई कोई छेड़ दो
आज बाँध लो घुँघरू पांव में
थिरकने दो तन किसी तान पर
उठा लो कूची रंग दो कैनवास
तरस खाओ अपनी जान पर
याद रहे
वो सूरज भी जो प्रातः आता
शाम में जाकर ढलता है
समय से जो रेस करेगा
पछतावे में हाथ वो फिर मलता है
सुनो! कुछ काम कल पर टाल देना भी चलता है
तिनका तिनका कर कितना जोड़ा
रोज हिसाब हम लगाते हैं
चल खुली हवा में घूम लें थोड़ा
कुछ पल अपने लिए भी चुराते हैं
बिन मतलब भी संवर लें थोड़ा
आईने में खुद को देख शर्माते हैं
चल आज पॉप कॉर्न लेकर, टीवी के सामने,
सब छोड़ छाड़ पसर जाते हैं
याद रहे
बिखरने से वही बचता है जो टूटने से पहले सम्हलता है
इस गफलत में मत रहना
कि तुम्हारे बिना काम किसी का नहीं चलता है
इसलिए
सुनो! कुछ काम कल पर टाल देना भी चलता है
कविता पढ़ते-पढ़ते गरिमा की आंखों से आंसू आ गए। बिटिया सच बड़ी हो गई थी और ठीक ही तो कहती थी अम्मा की दी हुई इस फटाफट निपटाने की आदत में उसने खुद को कई बार कितनी तकलीफ थी। अगर बिटिया कह रही है तो बदलाव की कोशिश की जा सकती है।
©सुषमा तिवारी
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