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घूंघट

 "राधा बहू, सब लोगों के लिए गर्म दूध बैठक में ही दे जाना," उर्मिला जी आवाज़ देने लगीं। तभी उर्मिला जी की छोटी बहू पारुल आई और बोली, "राधा भाभी तो सो गई हैं, उनकी तबीयत थोड़ी ढीली थी माई जी। मैंने दूध गर्म कर दिया है।"

उर्मिला जी बोलीं, "और मनचली बहू रेनू क्या कर रही है?"
पारुल ने जवाब दिया, "वो भी..."
उर्मिला जी गुस्से में बोलीं, "यहाँ घर के आदमी परेशान हैं और ये दोनों महारानियाँ सो रही हैं! जब दाने-दाने को मोहताज होंगी, तब देखूँगी पेट कैसे सोएंगी!" ताना मारते हुए बोलीं, "छोटी बहू, दूध में पीसी बादाम और गुड़ डालकर सारी गिलास बैठक में दे दो। न जाने कब ये समस्या खत्म होगी।" इतना कहकर उर्मिला जी बैठक के बाहर ही बैठ गईं।

रात के 11 बज चुके थे। पारुल ने 5 गिलास दूध के बनाए। पहला गिलास सास को यह कहकर दे दिया, "माई जी, आप भी तो कई दिनों से परेशान हैं।" बाकी चार गिलास अंदर कमरे में रखकर, बैठक की चौखट पर ही खड़ी हो गई।

थोड़ी देर बाद उर्मिला जी ने पारुल को चौखट पर खड़े देखा तो बोलीं, "पारुल बहू, तुम यहाँ क्या कर रही हो? घर के आदमी लोग गंभीर मामलों में बात कर रहे हैं। यहाँ औरतों का रहना उचित नहीं। तुम्हें कुछ समझ नहीं आएगा, तुम जाओ अपने छोटे बच्चे को संभाल लो।"

पारुल, जिसने शादी से पहले लॉ की पढ़ाई की थी लेकिन अपने परिवार वालों की किसी मजबूरी के कारण वकालत नहीं कर पाई, थोड़ी देर खड़ी रही। उसने अपनी सास उर्मिला जी से कहा, "माई जी, मुझे कुछ बात सुनने दीजिए। मैंने लॉ की पढ़ाई की हुई है, मैं पिताजी की मदद कर सकती हूँ।"
इस पर उर्मिला जी ने उसे शर्मिंदा करते हुए जो शब्द कहे, वे पारुल के लिए सहने लायक नहीं थे। लेकिन फिर भी पारुल परिवार के लिए वहीं खड़ी रही।

उर्मिला जी ने कहा, "बहू, ये पढ़ाई-लिखाई अपने मायके में जाकर सुनना। हमने पढ़ी-लिखी बहू इसलिए नहीं लाई कि वह हमारे घर के आदमियों पर रौब जमाए। तुम चुपचाप यहाँ से चली जाओ।"

पारुल ने अपनी सास उर्मिला जी को समझाते हुए कहा, "माई जी, मैं घर के आदमियों पर रौब नहीं जमा रही, मैं 5 साल से इस घर में हूँ, लेकिन मैंने आज तक किसी से ऊँची आवाज़ में बात तक नहीं की। लेकिन परिवार वही होता है जिसमें सभी लोग मुश्किल आने पर आपस में मिलकर सलाह-मशवरा करके उसका हल निकालें। मैं चाहती हूँ कि मैं पिताजी से कुछ बात करूँ, अगर आप आज्ञा दें तो।"

उर्मिला जी ने चिल्लाकर कहा, "चुप हो जाओ! हमारे घर की बहू आदमियों के मामलों में नहीं बोलती। तुमने देखा नहीं, मैं इस घर की सबसे बड़ी हूँ, लेकिन मैं भी बाहर बैठी हूँ। अरे, तुम्हें इतना ज्ञान नहीं है ये कानूनी गाँव कैसे होते हैं, तुम्हें पता भी है क्या?"

इतना कहकर उर्मिला जी की आँखों से आँसू बहने लगे और उन्होंने पारुल से चीखते हुए कहा, "हमारी जो खेत की ज़मीन है, उस पर ज़मींदारों ने कब्जा कर लिया है। किस तरह से हमारी पुश्तैनी ज़मीन होने के बावजूद भी हमारी ज़मीन पर से कब्जा नहीं हटा रहे, और ये लड़के तो निकम्मे हैं, जैसे इनका तो दिमाग चलता ही नहीं। अब इस बुढ़ापे में तेरे पिताजी क्या कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाएँगे?"

इतना सुनते ही पारुल ने अपनी चुन्नी को थोड़ा सा आगे घूँघट के रूप में लिया और झुकी नजरों के साथ बैठक के दरवाजे पर जाकर खड़ी हो गई और बोली, "पिताजी, मैं आप लोगों से कुछ बात करना चाहती हूँ। आपके पास जितने भी पुराने कागज़ हैं, वह मुझे दिखा दीजिए। मैंने इलाक़े की पढ़ाई की है, मुझे कानूनी बातों का आपके जितना तो ज्ञान नहीं है, लेकिन थोड़ा बहुत ज्ञान है। ऐसी पढ़ाई किस काम की जो मुश्किल समय में अपने परिवार के ही काम न आए?"

पारुल की बात सुनते ही उसका पति राकेश बहुत गुस्सा हुआ और उसने पारुल को दरवाजे से बाहर की तरफ धक्का देकर वहाँ से जाने के लिए बोला, जिसकी तेज आवाज़ सुनकर ससुर महेश प्रसाद बोले, "रुक जाओ राकेश, बहू कुछ कहना चाहती है तो उसे कहने दो।"
इस पर महेश प्रसाद ने बहू को बोला, "हाँ बहू, बोलो क्या बात है?"

पारुल बोली, "पिताजी, मुझे वह सारे पेपर देखने हैं जिनसे ज़मीन के अंदर हमारा पुश्तैनी हक़ है।"
इतना कहते ही महेश प्रसाद ने एक फाइल बहू के हाथ में देते हुए कहा, "बहू, यह फाइल ले लो और जो पेपर चाहिए, तुम मुझसे ही आकर बात करो। कल तुम भी हमारे साथ कोर्ट चलना। गंभीर मामलों में मैं औरत-आदमी या छोटा-बड़ा नहीं देखता, मेरे लिए बस इंसान की समझदारी काफी है।"

पारुल ने अपने ससुर महेश प्रसाद के पैर छुए और वह फाइल लेकर अपने कमरे में चली गई। रात भर उसने उन पन्नों को उलट-पलट कर देखा और कुछ नोट्स बनाने लगी। अगले दिन सुबह 8 बजे वह भी अपने ससुर, दोनों जेठों और अपने पति के साथ गाड़ी में बैठकर कोर्ट की तरफ बढ़ गई।

9 बजे की सुनवाई थी, जिसमें जो-जो बातें पारुल ने कही, उन सबके आधार पर विपक्षी दल के वकील को अपने घुटने टेकने पड़े तथा कुछ दिनों की तारीखों के बाद ही पारुल के ससुर महेश प्रसाद को उनकी ज़मीन वापस मिल गई। उन्होंने इस सबका श्रेय अपनी छोटी बहू पारुल को ही दिया और पारुल से कहा, "बहू, अगर तुम आगे भी पढ़ना चाहती हो तो पढ़ सकती हो, क्योंकि पढ़ाई करने में कोई बुराई नहीं है।"

उर्मिला जी को भी उसी दिन अपने व्यवहार के लिए बहुत बुरा लगा और उन्होंने अपनी छोटी बहू से माफी माँगते हुए बोलीं, "बहू, मुझे माफ़ करना, जिस पढ़ाई को लेकर मैं तुम्हें शर्मिंदा कर रही थी, उसी पढ़ाई की वजह से आज हमारे घर में खुशियाँ वापस आई हैं।"

पारुल ने अपनी सास के पैर छूकर कहा, "माई जी, आप माफी मत माँगिए। मैंने तो इस घर का सदस्य होने के नाते अपना कर्तव्य निभाया है।"

अपने सास-ससुर के आशीर्वाद से पारुल ने आगे की पढ़ाई भी प्रारंभ की और थोड़े ही दिनों बाद उसे गाँव में ही एक महिला वकील के रूप में कार्य करने का अवसर मिल गया।


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