Skip to main content

सहनशीलता

 मोनिका की शादी एक संयुक्त परिवार में हुई थी। रस्में पूरी करते-करते कब एक महीना निकल गया, पता ही नहीं चला। अब मोनिका और सचिन दोनों की छुट्टियाँ खत्म हो रही थीं। पाँच दिन बाद दोनों को ऑफिस जॉइन करना था। सरला जी ने दोनों को अपने कमरे में बुलाया।

"मोनिका, मैं तुम्हें नौकरी करने से मना नहीं कर रही, लेकिन ऑफिस जाने से पहले तुम्हें घर का सारा काम करके जाना होगा। अब इस उम्र में मुझसे काम की कोई उम्मीद मत रखना,"
"माँ, मैं पूरी कोशिश करूंगी कि आपकी उम्मीदों पर खरी उतरूं," मोनिका ने सासू मां से वादा किया, क्योंकि वह किसी भी कीमत पर नौकरी करना चाहती थी।

पहले ही दिन मोनिका सुबह 4 बजे उठ गई। उसने दोपहर के खाने की तैयारी की और नाश्ता बनाकर रख दिया। तब तक सबके उठने का समय हो गया। मोनिका ने सबके लिए चाय बनाई और उनके कमरों में देकर आई, फिर अपना और सचिन का टिफिन तैयार किया और तैयार होकर ऑफिस जाने के लिए सासू मां के पैर छूने आई।

"बहू, यह क्या पहनकर जा रही हो? अभी तो तुम्हारी शादी हुई है। साड़ी न सही, कम से कम सूट ही पहन लेती। ये जींस-वगैरह हमारे घर की बहू नहीं पहनती। जाओ, कपड़े बदलकर ऑफिस जाना,"
मोनिका को देर हो रही थी, उस पर सचिन भी बाहर से हार्न बजा रहा था। वह बोली, "मम्मीजी, कल से सूट पहनकर चली जाऊंगी। आज बहुत देर हो रही है।" इतना कहकर मोनिका चली गई। पीछे से सरला जी बहुत देर तक बड़बड़ाती रहीं।

शाम को भी आकर मोनिका ने सबके लिए चाय बनाई, फिर खाना बनाया। बिस्तर तक जाते-जाते उसे बारह बज गए। सुबह के लिए अलार्म लगाकर वह लेटी, तो लेटते ही नींद के आगोश में चली गई। अब तो उसका यही रूटीन हो गया था।

एक महीने बाद जब सैलरी का समय आया तो शर्मा जी ने उससे सैलरी मांग ली। मोनिका ने अपनी जरूरत के खर्च के पैसे रोककर बाकी सैलरी सरला जी के हाथ में रख दी। सरला जी को और क्या चाहिए था, काम भी नहीं करना पड़ता और हर महीने एक अच्छी रकम उनके हाथ में आ जाती थी।

कुछ महीने तक मोनिका ने सारा काम ठीक से संभाल लिया, लेकिन वह भी तो एक इंसान है। एक दिन थकान की वजह से उसे चक्कर आ गए। सचिन ने उसे बिस्तर पर लिटाया तो पता चला उसे बुखार है।

"मैं इतने दिन से कह रहा था कि इतना काम मत करो, लेकिन तुम्हें तो समझ में ही नहीं आता। अब हो गई ना बीमार, अब कैसे करोगी काम? माना सहनशीलता तुम्हारी ताकत है, लेकिन इस ताकत को अपने ऊपर हावी करने के बजाय उसे अपनी पहचान बनाओ," सचिन के गुस्से पर मोनिका को बहुत प्यार आ रहा था।

सरला जी को जब मोनिका की तबीयत का पता चला, तो काम करने के नाम पर उनका शरीर कांपने लगा। एक समय का खाना तो उन्होंने जैसे-तैसे बना लिया, लेकिन रात को उन्होंने मना कर दिया कि उनसे अब इतना काम नहीं होता। सरला जी ने अपनी और अपने पति की चार रोटियाँ सेकीं और अपने कमरे में आ गईं। मोनिका और सचिन के लिए उन्होंने कुछ नहीं बनाया।

यह देखकर मोनिका को बहुत दुख हुआ। जिस घर को उसने अपना माना, सास-ससुर को अपने मां-बाप से बढ़कर समझा, उन्होंने तो आज तक उसे पैसे कमाने वाली मशीन ही समझा। दो दिन किसी तरह सचिन ने दूध-ब्रेड मोनिका को खिलाया और खुद बाहर का खाया।

जब मोनिका ठीक हो गई तो उसने कुछ समय के लिए वर्क फ्रॉम होम ले लिया, क्योंकि डॉक्टर ने कुछ समय के लिए आराम करने को कहा था। अब वर्क फ्रॉम होम में मोनिका को इंटरनेशनल एयरलाइंस का प्रोजेक्ट दे दिया गया। अब उसे देर रात तक काम करना पड़ता था, सुबह जल्दी उठना मुमकिन नहीं था। अगले दिन मोनिका सुबह 10 बजे सोकर उठी।

"उठ गई महारानी, तुम्हारी तबीयत अब तक ठीक नहीं हुई क्या?"
"मम्मीजी, अब मैं सुबह जल्दी नहीं उठ सकती। रात तीन बजे तक मेरी मीटिंग्स होती हैं। मैंने रागिनी से बात कर ली है, आज से वह काम पर आएगी, जो आपको खाना हो, उससे बनवा लेना।"
"अब इस उम्र में हम कामवाली के हाथों का खाना खाएँगे, वह भी बहू के होते हुए?" ससुर जी बोले।

मोनिका कुछ नहीं बोली और अपने कमरे में चली गई। उसे पता था कि बहस करने का कोई फायदा नहीं है। सचिन भी अपने मम्मी-पापा का ऐसा व्यवहार देखकर बहुत दुखी था। उसने सोचा, शाम को आकर मम्मी से बात करता हूं, यह सोचकर वह ऑफिस के लिए निकल गया।

शाम को सरला जी ने मोनिका के मम्मी-पापा को घर पर बुला लिया।
"देखिए बहनजी, आपकी बेटी बिल्कुल काम नहीं करना चाहती, यही हमारी किस्मत रह गई है कि हमें बुढ़ापे में चाय भी नसीब ना हो। मैं भी सुबह 4 बजे उठकर सारे काम करती थी। आप ही समझाइए।"

मोनिका की मम्मी बोलीं, "आज सुबह मोनिका से मेरी बात हुई थी, उसने बताया वर्क फ्रॉम होम की वजह से देर रात तक उसकी मीटिंग चल रही है, इसलिए सुबह जल्दी नहीं उठ सकती। मैंने ही उसे कहा था कि अपनी सेहत खराब करने की जरूरत नहीं है, तुम नौकरी छोड़ दो। घर खर्च की जिम्मेदारी सचिन और तुम्हारे ससुर जी की है, तुम आराम करो और सबको समय से चाय बना कर दो। रात भर जागकर काम भी करोगी, फिर भी सब खुश नहीं, तो क्या फायदा ऐसी नौकरी का?"

यह सुनकर सरला जी हड़बड़ा गईं। उनकी आँखों के सामने मोनिका की सैलरी घूम रही थी, जो अब उन्हें अपने हाथों से जाती दिख रही थी। उस पर घर खर्च में भी अपने पति की पेंशन खर्च होती दिखने लगी।

"बहनजी, कुछ दिनों के लिए हम मोनिका को घर ले जा रहे हैं। अभी वह बीमारी से ठीक हुई है, उसे आराम करने की जरूरत है। तब तक वह ऑफिस के काम खत्म करके नौकरी से इस्तीफा भी दे देगी, फिर वापस आकर उसके हाथ की बनी चाय पीना," कहकर मोनिका के मम्मी-पापा खड़े हो गए।

"अरे बहनजी, मैं तो मजाक कर रही थी, बहू को नौकरी छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है। अभी तो मेरे शरीर में इतना दम है कि मैं रसोई संभाल सकती हूं, और फिर दिन में तो मोनिका मेरी पूरी सहायता करती है। आप बैठिए, अपनी बेटी से बात करिए, मैं आपके लिए चाय बना कर लाती हूं।"

"नहीं बहनजी, अब हम चलेंगे। उम्मीद करते हैं कि आगे से आप हमारी बेटी को इंसान समझेंगी।"
आज एक माता-पिता ने बेटी के सम्मान की रक्षा करने की नई शुरुआत की थी। सरला जी ने सिर झुकाकर सहमति दी और मोनिका के मम्मी-पापा वापस चले गए।

मोनिका यही सोच रही थी कि पता नहीं घी सीधी उंगली से क्यों नहीं निकलता।


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...