"पिता जी से कह दो , अंदर वाले कमरे में चले जायें । कुछ लोग मिलने आने वाले हैं।"
नौकर से कामिनी ने कहा। नौकर कामिनी की ओर निहार रहा था । पिता जी से वह कुछ कह पाता तब तक कॉल बेल बज उठी । नौकर ने गेट खोला तो रंजन के बचपन के दोस्त बाहर खड़े थे।
उनका अंदर प्रवेश हुआ तो वे पिता जी को देखते ही उनके चरणों की ओर लपके।
"अरे ..पिता जी आप ...". ये कहते हुए विशाल ने उनके चरण स्पर्श कर लिए।
पिता जी एक टक विशाल की ओर देख रहे थे। चश्मा उतार कर उन्होंने उसे फिर निहारा ।
"क्यों पिता जी पहचाना नहीं क्या ... , मैं रंजन का दोस्त हूँ। आपके यहाँ अक्सर आता रहा हूँ।"
"अरे हैं ... तू तो विशाल है , भरोषी का लड़का है । अब पहचान गया । कहाँ हैं भरोषी ..?"
" मेरे पिता जी भी मेरे पास हैं , आपको उनसे मिलाने के लिए ले चलूँगा ।"
"अब मैं तो आज जा रहा हूँ ,बेटा । "
पिता जी विशाल का वार्तालाप चल रहा था की कामिनी अंदर से आकर कहने लगी "पिता जी आप अंदर चले जाओ आपका सामान सब लगा दिया है ,देख लो कुछ रह न जाये।"
पिता जी बहू का हुक्म मानकर अंदर चले गए।
"पिता जी को कुछ सुनाई नहीं देता है अब वे बुढापे में कुछ भी बकते रहते हैं। आज इन्हें गाँव भेज रहे हैं।' कामिनी ने अन्दर से आकर ये बात कही।
"अरे भाभी जी ,बुढापा तो सबका आता है ,इन्हें अपने पास ही रखें, गाँव में परेशान होंगे । आपके ससुर साहब की बदौलत ही मैं आज यहां हूँ । न वे मेरे पिता जी को समझाते न मैं आगे पढ़ता।"
रंजन भी अब कमरे में आ चुका था ।" हाँ यार मैं भी यही चाहता हूँ ,पिता जी यहीं रहें , लेंकिन कामिनी की एक मिनट नहीं पटती है उनसे ।"
"एक काम करते हैं ,इन्हें मैं अपने घर ले जाता हूँ । मेरे पिता जी और ये साथ बने रहेंगे । मुझे भी आनन्द मिलेगा । मुझे याद है ,कई बार तेरे साथ मेरी भी फीस भर आते थे वे। उनका कर्ज तो मैं कभी उतार नहीं सकता।"
कामिनी रंजन एक दूसरे की ओर निहार रहे थे।विशाल अपने पुराने दिनों में खो गया था।
विमलभारतीय 'शुक्ल'
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