माँ अब आपका आराम करने का समय है.बहुत काम कर लिया.बहू आ गई. अब सारी जिम्मेदारी बहू (मृणाल) को सौंप कर आप घूमों फिरो.घर गृहस्थी के झंझटों में पड़ने की कोई जरूरत नही."
"हाँ बेटा,घूम भी लूंगी पहले बहू को घर गृहस्थी की जिम्मेदारी समझने में मदद तो कर दूं."
कल्पना जी के बेटे रजत की शादी मृणाल से कुछ हफ्तों पहले हुई थी.सारे काम काज अच्छे से निपट गये थे.मेहमान भी एक एक करके चले गये थे.बस उनकी बेटी काजल और उसके बच्चे यही थे.काजल भी आज जा रही थी.हर बेटी की तरह माँ की चिंता उसे भी थी.इसलिए वो कल्पना जी से ये सब कह रही थी.
"मम्मी आप मृणाल पर सब छोड़ देगी तो अपने आप सीख लेगी.कही ऐसा न हो कि वो आपकी मदद,भोलेपन का फायदा उठा कर सारी जिम्मेदारियां आप पर ही थोंप दे."
"ऐसा नही कहते बेटा.मैं तो इसलिए कह रही हूँ की पढ़ाई और नौकरी के कारण उसके पास समय कहाँ रहा होगा कि घर गृहस्थी के काम सीख पाये."
"तो क्या हुआ काम करना पड़ेगा तो सीख जायेगी.मुझे भी कुछ नही आता था.सीख गई न.सासूमाँ ने तो शादी के दूसरे ही दिन ऐलान कर दिया था कि उन्होंने बहुत काम कर लिया, अब वो कुछ नही करेगी.कभी कोई काम समझ नही आता या गलत हो जाता तो दस बातें सुना देती.वो तो आपको भी तानें देने से नही हिचकिचाती थी कि माँ ने ही कुछ नही सिखाया होगा तो बेटी भी क्यों सीखती."
"बस इसलिए मैं बहू के हर काम सीखने में मदद करना चाहती हूँ ताकि कल को उसके मन में तुम्हारी तरह अपनी सास के लिए मन में कोई मैल न हो.बेटा इंसान धीरे धीरे सब सीख जाता है पर उसने वो काम किन परिस्थितियों में सीखा है ये बात उसे हमेशा याद रह जाती है.फिर मैं ही उसे प्यार अपनापन नही दूंगी तो वो भी रिश्तों को दिल से नही निभा पायेगी."
"मम्मी ये बात आप बिल्कुल ठीक कह रही हो.आज में पूरे घर की जिम्मेदारी अच्छे से निभा रही हूँ पर सासूमाँ के लिए वो मान दिल में है ही नही."
"ऐसा नही कहते बेटा.सास है तुम्हारी. तुम्हारे अच्छे के लिए ही बोला तभी तो तुम बहुत जल्दी सब सीख गई."
"उम्मीद है आपकी बहू भी जल्दी ही सब सीख जायेगी."
"बिल्कुल सीख जायेगी.जब तू अगली बार आयेगी तो देख लेना."
"हाँ माँ जिसकी इतनी समझदार और प्यार करने वाली सासूमाँ हो वो कैसे नही सीखेगी."
...और काजल मन में जल्द ही मायके आने की उम्मीद और सकारात्मक सोच लिए अपने ससुराल चली गई.
शशि ध्यानी
दिल्ली
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