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निवाला

 नेहा की शादी को महीना भर होने को आया था सबको खाना खिलाते खिलाते 2 बज गये आज कुछ ज्यादा ही देर हो गई, पेट और पीठ एक हो रहे थे वैसे तो नेहा को बचपन से ही नाश्ता करने की आदत नहीं थी लेकिन आज दोपहर मे पहला निवाला मुंह में जैसे ही डाला पर गले से नीचे ही नहीं उतर रहा था रोज की तरह सभी खाना खा कर आराम करने चले गए किसी ने उससे खाने के बारे में पूछा ही नहीं ...

ऐसे मे आज उसे मां बहुत याद आ रही जो पहली रोटी लगते ही उसे खाने के लिए आवाज देती और वह उनकी गरमागरम रोटियों से तृप्त हो जाती भाई कई बार मां से झगड़ता "तुम नेहा को हमेशा पहले रोटी देती हो मुझे बाद में ....मां -बेटा, तुझे तो जिन्दगी भर गर्म रोटी मिलेगी,पर इसे कुछ ही दिन, फिर तो यह दूसरों को गर्म रोटी खिलाएंगी।"

नेहा -उह...मैं खुद ही गर्म रोटी बनाकर खाऊंगी...और मां मुस्करा देती थी उसकी बात पर...

वैसे नेहा के ससुराल में खाने पर कोई रोक टोक नहीं थी पर मां के संस्कार थे सबको खिलाकर खाने के..

थाली एक ओर खिसकाकर मां को फोन लगाया।

"कैसी हो नेहा बिटिया..

"ठीक हूं मां...

"खाना खाया।"

ये सुनते ही आंखें भर आई रुलाई रोकते हुए," हां खा लिया।"

"मां हूं तेरी, आवाज पहचानती हूं,जा पहले खाना खा ले..

"खा लूंगी... पहले बात तो कर लूं...

"अभी न तू बात कर पाएंगी और ना मैं.. पहले खाना खा..मां को कैसे पता चला ..सोच रही थी नेहा ..फिर खयाल आया ...हर गृहस्थी मे हर परिवार की यही कहानी है एक पत्नी एक मां ....पहले सबको खिलाती है उन्हें खाते देख खुद तृप्त होती है जबकि उन्हें कब खाना खाना चाहिए अक्सर परिवार के लोग भूल जाते है ...शायद वर्षों से चले आ रहे संस्कार औरतें भूलना नही चाहती ओर वर्षों से औरतों को सिर्फ काम करनेवाली एक मशीन समझ अक्सर उनकी अनदेखी होती रहती है ....शायद ...नही सच मे ...

अब निवाला गले से फटाफट उतरने लगा...दोस्तों मेरी कहानी का सार सिर्फ इतना है अक्सर हम घरों मे रसोईघर मे काम करती मां ,पत्नी ,बहन ,को उस समय भूल जाते है जब वह हमें खाना खिला चुकी होती है उनहोने खाया या नही ..ठीक से खाया भी या नही देखना तो दूर सोचते भी नही ...दोस्तों ऐसी सभी गृह लक्षमियो के प्यार और आदर का सम्मान कीजिए और हो सके तो उनके साथ खाइए ...करके देखिए अच्छा लगेगा..


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