बहू सीमा की शादी को कुछ साल हुए थे। घर का माहौल एकदम सख्त था, हर बात पर नियम-कानून। सीमा इस माहौल से आई नहीं थी, उसके पिता के घर का माहौल एकदम अलग था। इसी कारण सीमा को हर बात पर नियम-कानून के ताने सुनने पड़ते थे। लेकिन सीमा भी कभी कोई बहस नहीं करती थी, सब सुनकर 'ठीक है' कहकर निकल जाती थी। उसने खुद को एकदम से उसी माहौल में ढाल लिया था।
कारण यह था कि शुरू में उसने अपने पति से इस बारे में बात करनी चाही थी, अपनी मर्जी बताई थी। उसके पति ने कहा, "इस घर में अब जैसा मां-बाबूजी चाहेंगे, वही होगा और आगे भी वही होता रहेगा। उनके नियम-कानून को तोड़ने की कोशिश मत करना, नहीं तो मायके भेज दिया जाएगा।" एक छोटी सी बात पर इतनी बड़ी बात कह दी थी सीमा के पति ने। फिर क्या था, सीमा की कभी हिम्मत ही नहीं हुई आगे कुछ बोलने की। सोचा था कि शादी के बाद आगे की पढ़ाई पूरी करेगी, नौकरी करेगी। एक बार उसने अपनी सास से भी बात की थी। सास ने कहा, "यह लोग घर संभालने के समय यह महारानी चली है पढ़ाई करने, और हम सब इस महारानी की आवभगत करेंगे! इस उम्र में यही करना था तो वह आपसे बोल देती कि हम कलेक्टर बनकर ही शादी करेंगे। चली आई है पढ़ाई करने! आज यह बात बोल दी, दोबारा न बोलना समझी?" यहां भी उसके सपनों को सास ने पैरों तले कुचल दिया। अब जो भी उम्मीद थी, वह भी टूट गई।
अब सीमा उनके ही मुताबिक ढल गई। सास तो ऐसी थी कि अपनी मर्जी के अलावा किसी की नहीं सुनती। घर में सब कांपते थे, इतना सख्त माहौल था कि किसी को घुटन होती थी। रिश्तेदार बार-बार आते थे, उन्हें रिश्तेदारों की आवभगत करने में बड़ा मन लगता था। तभी वह सबके सामने बहुत अच्छा बन जातीं और हर बात में कहतीं कि "मैं अपनी बहू को बेटी मानती हूं, कोई अंतर नहीं। सीमा और गुड्डी दोनों ही बेटियां हैं मेरी।" रिश्तेदार भी समझते कि कितना अच्छा परिवार है।
गुड्डी की कॉलेज जाने की जब बात आई तो तैयार हो गईं। क्यों न हो, आखिर बेटी जो थी! जहां पर इच्छा होती, वहां सास अपनी बेटी के साथ जाती। इसी समय फिर से सीमा के सपने बेचैन होने लगे। सीमा ने हिम्मत करके फिर बात करने की कोशिश की। अब उसने अपने ससुर जी से अपनी बात कही। ससुर जी पहले तो मना ही कर रहे थे, पर सीमा के आग्रह करने से उन्होंने कहा, "ठीक है, मैं बात करता हूं सरोजनी से।" सीमा के पास फिर उन्होंने सीमा की सास को बुलाया और बात छेड़ी। बहुत देर तक बहस चली, लगभग 1 घंटे बाद सीमा के ससुर जी ने सीमा को कमरे के अंदर बुलाया। कमरे में सीमा की सास घूरते हुए उसे देख रही थी।
ससुर जी बोले, "सीमा, तुम्हारी सास की एक शर्त है, तभी तुम कॉलेज जा सकती हो।"
सीमा ने कहा, "जी बाबूजी, मैं सब शर्त मानूंगी, बोलिए क्या है?"
सीमा के ससुर जी ने कहा, "इनका कहना है कि तुम्हें हर काम को खत्म करके ही जाना पड़ेगा। अभी जितने भी घर के काम हैं, अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करके ही तुम बाहर जा सकती हो। तुम्हें बाहरी दुनिया से कोई मतलब नहीं होना चाहिए, किसी से दोस्ती-यारी नहीं, किसी के घर आना-जाना यह सब कुछ भी नहीं। न ही होटल बाजी, घूमना-फिरना, यह सब हमारे घर के सख्त खिलाफ है, सपने में भी नहीं सोचना है। घूंघट डालकर आओगी-जाओगी, यही शर्त है इनकी।"
सीमा ने कहा, "मुझे सब मंजूर है।"
अब सीमा बहुत खुश थी, उसे तो अपने पढ़ाई से ही मतलब था। सीमा का एडमिशन हुआ, वह भी उसके पिताजी ने करवाया क्योंकि ससुराल वालों ने सिर्फ मंजूरी दी थी, बाकी कोई मदद नहीं की। सीमा घर के सारे काम निपटा कर जाती थी और फिर कॉलेज जाती थी। वह अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गई। इधर गुड्डी भी कॉलेज जाने लगी। दोनों के कॉलेज एक ही थे, पर क्लास और टाइमिंग अलग-अलग थी। गुड्डी के लिए कोई शर्त नहीं थी, क्योंकि वह बेटी थी। गुड्डी लाड़-प्यार के कारण जिद्दी भी थी। सास की शक्ति बेटी के लिए ही थी, उसके लिए हमेशा नए कपड़े, ज्वेलरी लाया करती थी, मतलब कि हमेशा गुड्डी को खुश रखती थी।
गुड्डी नई सोच रखने वाली लड़की थी, पर उसे पता था कि अपनी मां को कैसे खुश करना है। यूं कहा जाए कि गुड्डी परिवार को पढ़ाई के नाम पर बेवकूफ बना रही थी। वह कॉलेज सिर्फ टाइमपास, दोस्तों से मिलने और घूमने जाती थी, पढ़ाई के नाम पर जीरो। एग्जाम के समय दोस्तों की मदद से पास हो जाती थी।
इधर सीमा अपनी पढ़ाई पूरी लगन से करती थी, कोई कमी नहीं छोड़ती थी। पढ़ाई में थक तो जाती थी, पर कर लेती थी। सास परेशान करना नहीं छोड़ती, दिन में जैसे ही सीमा कमरे में जाती, सास को कुछ ना कुछ काम याद आ जाता, दिन में पढ़ने ही नहीं देती। वहीं गुड्डी से एक काम नहीं करवाती थी, क्योंकि बिटिया पढ़ाई करती है, थक जाती है।
सास को क्या पता था कि बिटिया आंखों में धूल झोंक रही है! कॉलेज का आखिरी दिन था और रिजल्ट निकलने वाला था। सीमा बेसब्री से अपने रिजल्ट का इंतजार कर रही थी, तभी वह खुशी से चिल्ला उठी, "अरे, मैं पास हो गई!" उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। उसने अपने ससुर जी को फोन किया और बताया। ससुर जी खुश होकर आशीर्वाद देने लगे।
पीछे से आवाज आई, "अरे, गुड्डी का भी रिजल्ट आया होगा, पूछिए तो सीमा से, वह भी बेचारी इंतजार कर रही है, उससे बात करवाइए।" सीमा ने सास की बात सुनी, "जी बाबूजी, मैं गुड्डी से बात करवाती हूं।" सीमा गुड्डी की क्लास में गई, पर गुड्डी नहीं मिली। कुछ लड़कियों से पता चला कि गुड्डी आज कॉलेज आई ही नहीं। सीमा हैरान हो गई, क्योंकि गुड्डी तो सुबह ही कॉलेज गई थी, फिर गई कहां?
सीमा घर आई और सभी बातें बताईं। उस समय सीमा को ही उल्टा-सीधा बोला गया कि तुमने ठीक से देखा नहीं होगा, तुम तो मेरी बेटी से जलती हो। वह देखना, मेरी बेटी पूरे कॉलेज में अव्वल आएगी। फिर सब गुड्डी का इंतजार करने लगे। शाम हो गई, तभी गुड्डी का फोन आया— "मां, मैंने शादी कर ली है। मैं घर नहीं आऊंगी और आप लोग मुझे ढूंढना भी मत।" इतना कहकर गुड्डी ने फोन रख दिया।
सास के पैरों तले जमीन खिसक गई, वह बेहोश हो गईं। होश आने के बाद बस रोए जा रही थीं। सीमा अपनी सास को संभाल रही थी और समझा रही थी। सीमा की सास को एहसास हो गया कि उनकी बेटी ने कहीं का नहीं छोड़ा, सारी अकड़ निकल गई। एक बहू जिसने उनका सम्मान रखा और एक बेटी जिसने नाम खराब कर दिया। वह सोच में पड़ गईं कि ऐसी शक्ति अगर बेटी पर लगाई होती तो आज उन्हें यह दिन न देखना पड़ता। उन्होंने अपनी बहू से माफी भी मांगी। दुख तो यह था कि बेटी हाथ से निकल गई। उन्होंने कसम खाई कि अब गुड्डी को इस घर में आने नहीं देंगी।
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