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साथ

 सासु मैन: "यह क्या, इतनी रोटियां क्यों बना दीं? आपको तो कुछ समझ में ही नहीं आता, अब ये सारी बर्बाद होंगी। कुछ तो सोचा होता, इस भीड़-भाड़ में कौन खाएगा ये रोटियां?"

एक साथ में बोल गई निशि। सुनकर हाथ रोख खड़ी हो गई निर्मला जी। आंखों में पानी आ गया। खुद को संयत कर बोलीं,
"अरे बेटा, कई दिनों से दोनों दामाद बाबू और विमलेश भी रोटी के लिए पूछ रहे थे। वह जो रसोइया आया है, रोटी नहीं बनाता, पूरियां तल देता है। मैंने सोचा, खुद ही थोड़ी बना देती हूं।"
इसी पर निर्मला जी बोलीं तो निशि फिर बोल पड़ी,
"मैन, बस करिए, कल पोते का उपनयन संस्कार है। पूजा की तैयारी नहीं देख रही, बस पेट पूजा ही देखिए।"
बहू की कड़वी बात सुनकर निर्मला जी की आंख अब सावन सी बरसने लगी। आंचल से झटपट आंखों को पोंछते हुए कमरे में चली गईं कि कोई रिश्तेदार देख न ले। अपने कमरे में पहुंचीं, हाथ में पता लगा ही हुआ था जैसे कोई सुधीर। हाथों को उलट-पलट के देखने लगीं और देखते-देखते कब अतीत की गहराई में डूब गईं, पता ही नहीं चला।

"यह वही हाथ हैं ना... और यह वही आटा... जिसके लिए सिलाई करते-करते टेढ़ी हो जाती थीं उंगलियां, कपड़ों की तुरपाई करते-करते उंगलियों में छाले पड़ जाते थे। पति की रोड दुर्घटना में मृत्यु के बाद कैसे तीन बच्चों को लेकर अनाथ सी हो गई थी। ससुराल में दोनों बेटियां थीं, जो ब्याह के बाद ससुराल चली गईं। सास-ससुर पहले ही ईश्वर को प्यारे हो गए थे। बहुत पढ़ी-लिखी भी नहीं थी, हाथ में सिलाई का हुनर था। बस बच्चों के मुरझाए चेहरे देख विधाता के प्रहार को भूलकर लग गईं अपनी तकदीर के खोले फटे सिलने। शुरू-शुरू में मोहल्ले के लोगों के कपड़े सिलने शुरू किए, धीरे-धीरे काम अच्छा चलने लगा लेकिन हाथ घायल हो गए।
उसे गांव ने इतना दर्द नहीं दिया कभी जितना कि बहू ने दिया।
इसी सिलाई के दम पर बच्चों को पाला, सिलाई करने के बाद जब लोगों के लिए रोटियां बनाती तो आटा तक नहीं घुट पाता। बेटी से गुथवाती, फिर जब रोटियां बनतीं तो तीनों बच्चे बड़े मजे से खाते, खासकर विमलेश कहता, "मैन, तुम्हारे हाथों की रोटियां कितनी मीठी होती हैं, मन करता है यूं ही खाता रहूं।"

अपने इन्हीं हाथों से बच्चों को पाला, सिलाई तब तक करती रहीं जब तक विमलेश को अच्छी सरकारी नौकरी नहीं मिल गई। विमलेश ने मेरे दूध का कर्ज तो बहनों को योग्य घरों में ब्याह कर चुका दिया। भगवान उसके जैसा बेटा सबको दे।
इसीलिए तो बहू की कड़वी बातें खुद ही सहन लेती हूं, कि बेटे को कोई तकलीफ न हो। अपने पिता की जिम्मेदारी निभाना, उसमें भी एक शिकायत तक न आई कभी उसकी जुबान पर। उल्टा सभी के साथ ऐसे रहता जैसे छोटा बच्चा।
लेकिन जाने क्यों आज बहू की बातें दिल को इतना दर्द दे गईं... शायद रोटी की बात थी, शायद मैन और बच्चे की भूख के रिश्ते की बात थी, शायद उन मजबूरी की याद दिला गईं जब बिना एक कप सिले, रोटी का एक निवाला अपने बच्चों को बिना भूखे नहीं डाल पाती थी।
"मैन, कहां हो आप?"
विमलेश की पुकार से निर्मला जी अतीत की गहराई से निकल आईं।
"हां बेटा, यहां हूं," कहती हुई झटपट अपने आंसू पोंछ लिए।
"मैन, आज रोटी आपने बनाई थी न? बहुत मीठी थी।"
"हां मैन, सच में बहुत मीठी थी," उनके दोनों दामाद भी कमरे में घुसते हुए बोल पड़े।
निर्मला जी मुस्कुराने लगीं और बोलीं,
"विमलेश, तुम्हें कैसे पता चला कि रोटियां मैंने बनाई थीं?"
"मां, रोटियों की मिठास से! उतनी मीठी रोटियां मेरी मैन ही बना सकती हैं।"

निर्मला जी का जैसे सारा दर्द गायब हो गया। लगा, जिसने मेरी तपस्या देखी है, कम से कम उसे तो उसका एहसास है, फिर क्यों दुखी होना!
विमलेश के माथे को सहलाते हुए बोलीं,
"तुम सब खुश रहो, बस यही चाहती हूं।"
और सभी खिलखिलाकर हंस पड़े।
अभी घर में रस्म-रिवाज का सिलसिला शुरू हुआ ही था कि निशि की मैन और भाभी आईं। निशि मैन को कमरे में ले गई। कमरे में निशि की मैन, उर्मिला जी ने बक्से से गोंद के लड्डू निकालकर बेटी के हाथ में दिए। लड्डू देखकर बेटी उछल पड़ी, लेकिन देखा, मैन की आंखों में आंसू थे।
जिद करके मैन से कारण पूछा तो उर्मिला जी बोल पड़ीं,
"बेटा, कल तुम्हारे भाई से कहकर लड्डू के लिए सामान मंगवाया तो तुम्हारी भाभी ने कितना सुनाया, कहने लगी, आपको जब देखो खाने- बनाने का ही शौक लगा रहता है, अब राम का नाम लिया करो मैन जी, कितना कुछ धोखे ले जाओगी बेटी के लिए।"
इतना कहते-कहते बेटी के सामने टपक कर रो पड़ीं। निशि धड़ाम से बिस्तर पर बैठ गई, लगा जैसे किसी ने खींच के तमाचा मार दिया हो। अभी सुबह ही तो उसने अपनी सासु मैन से यही सब बोला था। उसे काटो तो खून नहीं।
तभी निर्मला जी समधन से मिलने आईं। दोनों बड़े प्यार से मिलीं, निशि देख रही थी, सुबह की बात की एक रेखा भी नहीं थी सासु मैन के चेहरे पर।
अचानक वह सासु मैन के पैरों पर गिर पड़ी और सुबह की बात के लिए माफी मांगी, और यह माफी क्यों मांग रही है, ईमानदारी से वह भी बता दिया।
निर्मला जी ने उसे उठाकर गले लगा लिया और बोलीं,
"बेटा, हम बुजुर्ग हो गए हैं, लेकिन अभी भी बच्चों का भला ही सोचते हैं। आज हम थक चुके हैं, शरीर साथ नहीं दे रहा है, लेकिन अभी भी दिल में तुम्हारी पसंद का बनाने और प्यार से परोसने को जी मचल जाता है।"
"हां मैन, मुझे माफ कर दीजिए, अब मुझे एहसास हो गया जब मेरी मैन के साथ वही सब हुआ।"
निर्मला जी और उर्मिला जी ने निशि के सिर पर हाथ फेरा।
तभी विमलेश आ गए और बोल पड़े,
"अरे अब सब चलो भाई, पंडित जी बुला रहे हैं, हल्दी वाली रस्म का समय हो रहा है।"
सभी मुस्कुराते हुए उठे। विमलेश ने मैन को देखा, उनकी आंखों में एक प्यारी सी चमक थी, जो पहले नहीं देखी थी।

आशा करती हूं दोस्तों, आपको हमारी कहानी जरूर अच्छी लगी होगी। धन्यवाद।


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