"मम्मी क्या शादी के बाद हर लड़की की तरह मेरे लिए भी मायका पराया हो जायेगा ?" रूँआसी होती हुई सुनिधि बोली.
"बेटा नये जीवन का स्वागत खुले दिल और दिमाग से करना.मुझे भरोसा है कि तुम अपनी समझदारी, विवेक से सब अच्छे से संभाल लोगी,पर कुछ भी हो ये मत भूलना कि हम हमेशा की तरह तुम्हारे साथ है.ये घर हमेशा वैसा ही तुम्हारा रहेगा जैसे पहले था."
ये उम्र का तकाजा ही तो था कि कल तक अपनी माँ की पुरानी सीख पर चलने वाली ममता जी अपनी बेटी को नई सीख दे रही थी.
एक दिन बाद ममता जी की बेटी सुनिधि की विदाई थी. सुनिधि ममता जी की गोद में सिर टिकाये बैठी थी.न जाने ऐसा दिन फिर कब आये.जब माँ बेटी एक दूसरे के साथ ऐसी बैठी हो.दोनों की आंखे नम थी. ममता जी उसके सिर को सहला रही थी. ये दिन इतनी जल्दी आ जायेगा कहाँ जान पाई थी वो.मानो कल की ही बात हो जब उसकी छोटी सी सुनिधि की खिलखिलाहट से पूरा घर गूँज उठता था. उसकी पायल की झमझम मधुर संगीत का आभास कराती थी.
सुनिधि मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती थी और अपने साथ काम करने वाले अंश से उसका प्रेम विवाह था फिर भी ममता जी का दिल घबरा रहा था.ममता जी को अपनी माँ की सीख याद आ गई जो उन्होंने उसे विदाई के समय दी थी."मायके से डोली निकले,ससुराल से अर्थी. तभी तुम्हारा जीवन सार्थक होगा."
ममता जी ने अपनी माँ की सीख को गाँठ बांध लिया था.तभी तो अपने पति के दिये जख्म,दुख दर्द को पूरी जिंदगी चुपचाप सहती रही.लेकिन आज अपनी माँ की जगह पर वो खड़ी थी और उनकी जगह उनकी बेटी.आज अपनी बेटी को सीख देने की बारी उनकी थी.हर माँ की तरह ममता जी ने सुनिधि को सीख दी.लेकिन उस सीख में बेबसी, लाचारी, बेचारगी नही, आत्मविश्वास,आत्मनिर्भर,आत्मसम्मान था.
सुनिधि ध्यान से अपनी मम्मी की बातों को सुन रही थी ममता जी के कहे एक एक शब्द उसे भरोसा दे रहे थे कि पुराना कुछ नही बदला बस नये को अपनाना है.
दोस्तों, ऐसी सीख बदलनी ही चाहिए जो बेटियों को दुख के सिवाय कुछ न दे. उनके सपने,ख्वाहिशें को भूलाने पर विवश कर दे.हर माता पिता को अपनी बेटियों को विश्वास दिलाना चाहिए कि चाहे जैसी परिस्थिति हो वो हमेशा उसके साथ है.
शशि ध्यानी
दिल्ली
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