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बेबसी

 रूपेश जी ने अपनी पत्नी से पूछा, "निर्मला जी, कितने बज गए हैं?"

निर्मला जी अलसाई हुई बोलीं, "अभी 5:00 बजे हैं। क्या बात है?"
रूपेश जी बोले, "आज बहुत भूख लग रही है, ऐसा करो चाय बना लाओ, तब तक मैं मंजन-कुल्ला कर लेता हूं।"
निर्मला जी बड़बड़ाते हुए बोलीं, "देखो, तुम्हें ही तो नींद नहीं आती है, लेकिन घर में बाकी सब लोग तो सो रहे हैं। अभी से जाकर किचन में लाइट जलाकर खटर-पटर करूंगी तो सबकी नींद खराब होगी, और फिर 7:00 बजे तक सब उठ जाएंगी, तब चाय बन जाएगी।"
रूपेश जी बोले, "अच्छा, ऐसा करना, अदरक मत कूटना, ऐसे ही चाय बना लेना, बिना अदरक की, ताकि कोई आवाज़ न हो।"
निर्मला जी बोलीं, "मैं अभी नहीं जा रही, चुपचाप आंखें बंद करके सो जाओ। आज इतवार है, बच्चों की भी छुट्टी है, मैं तो नहीं जा रही।" और निर्मला अपनी चादर तानकर सो गईं।

रूपेश जी 10 मिनट तक चुपचाप लेटे रहे, फिर धीरे से उठकर मंजन कर लिया। देखा तो निर्मला जी खर्राटे ले रही थीं। किचन में लाइट जलाई, चाय का पानी चढ़ाया ही था कि पता नहीं कैसे फ्राय पैन डिश बैलेंस हो कर लुढ़क गया और चाय फैल गई।
रूपेश जी के चेहरे पर पसीने की बूंदें छलक उठीं। वह कभी नीचे गिरे फ्राय पैन को देख रहे थे, कभी गैस पर फैली चाय को। बर्तन के गिरने की आवाज़ सुनकर निर्मला जी उठकर आ गईं। किचन को देखकर गुस्सा होते हुए बोलीं, "आपसे मैंने मना किया था, लेकिन जिद्दी इंसान हो, कैसे मान जाओगे, इतनी बेचैनी रहती है। अब कौन करेगा सफाई, मैं तो सुबह-सुबह अकड़न के मारे ज़मीन पर बैठ भी नहीं सकती।"
"ठीक है, तुम गुस्सा मत करो, मैं साफ कर दूंगा," रूपेश जी बोले। तब तक छोटी बहू कविता आ गई। फैली हुई चाय और गिरे हुए फ्राय पैन को देखकर उसका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। रूपेश जी बहू को देखकर अपने कमरे में चले आए।
कविता, निर्मला जी की तरफ देखते हुए बोली, "मम्मी जी, आप लोगों को नींद नहीं आती तो कम से कम हमें तो चैन से सो लेने दिया करो। हफ्ते में एक दिन मिलता है संडे का, आराम से उठने के लिए, उसमें भी आप लोग चैन हराम कर देते हैं! ऐसे ही पड़ा रहने दो, मैं थोड़ी देर में आकर साफ कर दूंगी।" और कविता इतना कहकर अपने कमरे में चली गई।
निर्मला जी की आंखों में आंसू आ गए, अपनी बेबसी और किस्मत पर। धीरे-धीरे किचन साफ किया, फिर अपने कमरे में आकर चुपचाप बैठ गईं।

रूपेश जी ने पूछा, "क्या हुआ निर्मला जी, छोटी बहू गुस्सा हो रही थी क्या? तुम कह देतीं, मेरी वजह से हुआ है यह सब। निर्मला, क्या बात है, कुछ तो बोलो!"
इतना सुनकर निर्मला जी की आंखों से आंसू बह निकले। वह बोलीं, "मैंने आपसे मना किया था, आज इतवार है, सब देर से सो कर उठेंगे, लेकिन आप नहीं माने।"
रूपेश जी बोले, "निर्मला, क्या करूं, राम जाने, बुढ़ापे में इतनी भूख लगती है। मैं बहुत देर से जाग रहा था, फिर सोकर आया था, यह पेट की आग नहीं मानती। निर्मला, मैंने दो गिलास पानी भी पिया था। मुझे क्या मालूम था हड़बड़ाहट में हाथ कांप जाएंगे और चाय फैल जाएगी। देखो, गलती मैंने की और सुनना तुम्हें पड़ा।"

निर्मला बोलीं, "नहीं जी, आप परेशान मत हो, कविता ने ऐसा कुछ नहीं कहा। लेकिन आप ही सोचो, सुबह-सुबह कोई उठकर आए और यह सब देखे, तो थोड़ी-बहुत नाराजगी तो होगी ही। बहू तो मना ही कर रही थी, लेकिन मैं सब साफ कर आई हूं।"
निर्मला जी बहू की बातों को अपने पति से नहीं बताती थीं, सुनकर भी अनसुना कर जाती थीं।
निर्मला जी ने कहा, "ऐसा करो, कल छोटू नमकीन-चिप्स दे गया था, वह बना लो और पानी पी लो।"
रूपेश जी बोले, "क्यों मजाक करती हो, बिना दांतों के कैसे खा लूंगा?"

थोड़ी देर बाद बड़ी बहू मधुरा किचन में आ गई थी। निर्मला जी ने आवाज लगाते हुए कहा, "बड़ी बहू, अपने पिताजी के लिए चाय बना देना।"
किचन से आवाज़ देती हुई मधुरा ने कहा, "माताजी, आपकी भी चाहिए तो साथ में बना लेती हूं, दोनों लोग पी लो।"
बड़ी बहू तो थोड़ी-बहुत कम कर देती है, न तो जवाब देती है, और कम भी कर देती है। उसके बच्चे भी बड़े प्यार से दादा-दादी का काम कर देते हैं।

निर्मला जी चाय लेने गईं, तो छोटी बहू धीरे-धीरे कह रही थी, "अरे जीजी, क्या बताऊं, आज तो सुबह से ही मूड खराब हो गया था, किचन की खूबसूरत तस्वीर देखकर। लोग तो कहते हैं, बुढ़ापे में भूख और नींद दोनों कम हो जाते हैं, लेकिन अपने घर में तो उल्टा हो गया है, इन दोनों की भूख तो उम्र के साथ-साथ बढ़ती जा रही है, हर दो-तीन घंटे में आवाज़ आ जाती है खाने के लिए।"

निर्मला जी इससे कुछ नहीं सुन सकती थीं और वो कुछ सुनना भी नहीं चाहती थीं। उन्होंने जोर से आवाज लगाई, "बड़ी बहू, हमारी चाय दे दो।"
आज उनके सब्र का बांध टूट रहा था। जिनके लिए आज तक मरते-खपते रही, वही जली-कटी सुना रही हैं। पता नहीं, निर्मला जी में कहां से इतनी हिम्मत आ गई। उन्होंने कहा, "मैं और तुम्हारे ससुर बूढ़े हो गए हैं, लेकिन मोहताज नहीं हैं। कल से जिसका मन नहीं है, वह मेरा कोई काम न करे। अरे, मेरे पति की अभी इतनी पेंशन तो आ ही रही है कि हम दोनों की गुजर-बसर आराम से हो जाएगी। और बेटा, बुढ़ापा सब पर आता है, तुम पर भी सदा जवानी नहीं रहेगी। तुम्हारे मां-बाप भी तो हैं, तुम्हारे भाई-भाभी क्या उनके साथ ऐसा ही व्यवहार करती हैं? ऐसे मत कहो, जो दिल को घायल कर जाए। ठीक है, इनको बहुत भूख लगती है, तो क्या करें, मैं अपना सारा सामान मंगवाया करूंगी, हाथ-पैर नहीं चलेंगे तो टिफिन लगवा लूंगी। और हां, एक बात याद रखना, अगर तुम्हारे बाबूजी ने मकान मेरे नाम ही लिख रखा है, तो यह कभी मत सोचना कि हम कहीं और चले जाएंगे।"

दोनों बहुएं अपनी सास का यह रूप देखकर डर गईं। उनकी नजरों में सास-ससुर तो 75-80 साल के हैं, इंसान हैं, निर्मला जी इतना कहकर अपने कमरे में आ गईं।
रूपेश जी के पास बैठकर बोलीं, "अभी हमारी उम्र इतनी भी नहीं हो गई कि छोटी-छोटी चीजों के लिए दूसरों पर आश्रित रहें। आज से आपको दुखी या परेशान होने की जरूरत नहीं, आपको जो भी खाने का मन हो, मैं राधा से कहकर बनवा लिया करूंगी। जब बहू को हमारी इज्जत नहीं करनी है, तो हम क्यों उनके लिए इतनी चिंता करें?"

रूपेश जी बोले, "शांत हो जाओ निर्मला, इतना गुस्सा अच्छा नहीं होता। ठीक है, कविता बहू में इतनी परिपक्वता नहीं है, लेकिन तुम तो बड़ी हो, अपनी उम्र का लिहाज करो। थोड़ी देर पहले तुम हमको समझा रही थी, अब क्या हो गया?"

निर्मला जी बोलीं, "बस, ये सोच लो, सब्र का बांध टूट गया, अब और नहीं। आप भी कुछ नहीं कहेंगे, ठीक है, जैसा आपका मन हो, वही करो।"

रूपेश जी बोले,


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