पिताजी की तेरहवीं कल ही सम्पन्न हुई थी। आज आँगन में चारो भाई, बहन सुगंधा और तीनों बहुएं बैठी थीं। बड़े भैया अर्जुन ने अविवाहित छोटे भाई आनन्द से कह कर यहॉं पारिवारिक मन्त्रणा के लिए मोहन और शंकर सहित अन्य सभी सदस्यों को एकत्र किया था।
अर्जुन ने एकबार सभी के चेहरों पर दृष्टि डाली। सभी आतुरता से उसी की ओर देख रहे थे। अर्जुन ने कहना आरम्भ किया- "सभी लोग सुनो! पिता जी तो रहे नहीं। तो अब हमें संयुक्त रूप से कुछ निर्णय लेने हैं। पहला यह कि खेत, बाग, घर और घर के लिए प्रयुक्त होने वाले प्लाट का बंटवारा कर लिया जाय। दूसरा यह कि गाँव में कौन आ कर रहना चाहता है क्योंकि किसी एक को तो देखभाल के लिए रहना ही पड़ेगा। तीसरा अम्मा किसके पास रहेंगी।"
एक बार तो चुप्पी छा गयी वहाँ। सभी एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। कुछ पलों के बाद दूसरे नम्बर वाले भाई मोहन ने कहा - "भैया, दुनिया वालों के लिए पिताजी चले गए हैं किंतु हम तीनों भाइयों के लिए पिताजी अभी भी जीवित हैं। वो हो आप, भैया।"
मोहन रोने लगा था। तभी तीसरे नम्बर वाला भाई शंकर भी सुबकते हुए बोला - "भैया, पिताजी हम लोगों से हमेशा कहते थे कि हम चाहें तो पिता जी को भलाबुरा कह सकते हैं लेकिन आपको कभी भी नहीं। परिवार के प्रति आपके त्याग से वे बहुत प्रभावित थे और हम सभी ने उसे जिया ही है। इसलिए बंटवारे के विषय में तो मेरा यही कहना है कि जिसे आप जो कुछ देना चाहें, दे दीजिए। कोई उफ्फ नहीं करेगा। हम इसे पिताजी के द्वारा किया गया बंटवारा मानेंगे।"
एक स्वर में सभी कह उठे- "यह प्रस्ताव हमें स्वीकार्य है।"
तभी छोटा आनन्द बोल पड़ा-"लेकिन यह बंटवारा हो ही क्यों? क्या मुझे अकेला छोड़ने का विचार है? क्या अभी भी हम संयुक्त रूप से नहीं रह सकते?" उसकी आँखें डबडबा आयी थीं।
अर्जुन ने कहा -"बेटे, मैं रहता हूँ कानपुर में, मोहन लखनऊ में, शंकर बनारस में और तुम्हारी पोस्टिंग भी बदलती रहती है। अभी दिल्ली में हो। घर तो गाँव मे एक ही बना है। प्लॉट तीन हैं। मेरा विचार था कि यदि भाइयों की इच्छा न भी हुई हो कभी किन्तु यदि बहुओं की इच्छा हो तो भी बंटवारे का यह विकल्प खुला है। बाद में पारिवारिक चिकचिक नहीं होनी चाहिए।"
सभी बहुओं की तरफ देखने लगे। मंजुला का चेहरा दिख रहा था जबकि मोहन की पत्नी मधु और शंकर की पत्नी मोना घूँघट किये हुए थीं। मधु का स्वर उभरा- "मैंने कभी भी बंटवारे की इच्छा नहीं की। जैसा चल रहा है वही ठीक है।"
मोना ने सभी की नज़र अपनी तरफ उठी देख कर बोली- "भैया, बटवारे का तो मैंने जिक्र ही नहीं किया। सब बढ़िया से तो चल रहा है।"
चुप बैठी मंजुला को देख कर भैया बोले-"मंजुला! तुम्हें कुछ कहना है?"
"आपकी इच्छा के विरुद्ध कभी गई हू तो बताइए। जो आप करेंगे वह मुझे मान्य है।" मंजुला ने गम्भीर स्वर में कहा।
"तो ठीक है। बंटवारे के विषय में अभी बात स्थगित करता हूँ। और हाँ सुगंधा तुम्हें जब भी अपना हिस्सा चाहिए हो, बता देना। व्यवस्था कर दी जाएगी।" अर्जुन ने छोटी विवाहिता बहन की तरफ देख कर कहा जो चुपचाप बैठी सुबुक रही थी। मोना उसकी पीठ सहला रही थी।
"अब दूसरी बात कि गाँव में कौन रहेगा?" अर्जुन ने बात आगे बढ़ायी।
मोहन ने कहा - "यह काम मैं कर सकता हूँ। मेरा जॉब भी तनिक हिल रहा है। क्यों मधु?"
"मुझे कोई आपत्ति नहीं।" मधु का स्वर उभरा।
"यदि मोहन और मधु गाँव मे रहते हैं तो उनकी बिटिया की पढ़ाई की जिम्मेदारी मेरी होगी। वे इससे निश्चिंत हो सकते हैं।" अर्जुन ने घोषणा की
शंकर ने कहा - "यदि मोहन भैया गांव में रहते हैं और यहाँ रह कर कोई धन्धा व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं लाख पचास हजार की राशि मैं उपलब्ध करा दूँगा।"
"मैं एक बोलेरो खरीद कर मोहन भैया को दे दूँगा ताकि उन्हें गाँव मे रहते हुए कहीं आने जाने में असुविधा न हो और जरूरत पड़ने पर कुछ आमदनी भी कर सकते हैं।" एयफोर्स में तैनात छोटा आनन्द बोला।
मोहन ने बड़ी विनम्रता के साथ कहा - "मैं शीघ्र ही अपना हिसाब किताब कर के गाँव आ जाता हूँ। अन्य सभी बात बाद में जरूरत पड़ने पर कही सुनी जायेंगी।"
अर्जुन आगे बोला -"चलो, इसका भी समाधान हो गया। अब अंतिम बात पर भी चर्चा हो जाय कि अम्मा किसके साथ रहेंगी। इस विषय पर यही कहना चाहता हूँ कि आप सभी मुझे यह अवसर दें कि अम्मा मेरे पास ही रहें।"
शंकर बोला -"सारी जिंदगी आपने अम्मा पिताजी की सेवा की है। भैया, अब थोड़ा सा पुण्य मुझे भी कमाने दीजिये। भोले की नगरी में रहते हुए और विवाह के सात वर्ष बीतने के बाद भी हम अभी तक माँ बाप नहीं बन सके हैं। शायद अम्मा की सेवा से ही हमारे आँगन में किलकारी गूँजने लगे।" शंकर की आवाज़ भर्रा गयी थी।
मोहन ने कहा - "जब मैं गाँव मे रहने आ ही रहा हूँ तो अम्मा की जिम्मेदारी मेरी ही होगी न। अम्मा को इधर उधर जाने की आवश्यकता ही क्या है अब! क्यों भैया?"
अर्जुन कुछ बोलता इसके पहले आनन्द का स्वर सुनाई दिया - "इस विषय पर मेरे अधिकार को ईश्वर ने छीना हुआ है। मैं अविवाहित अम्मा को रखने के विषय में कुछ कह पाने में सर्वथा असमर्थ हूँ।" कह कर वह सुबकने लगा। मंजुला उसकी पीठ पर हाथ फेर कर सांत्वना देने लगी।
"मेरे विषय में निर्णय लेने से पहले मेरी राय भी ले लेते बबुआ।"
स्वर सुनकर चौंक कर सभी ने देखा तो कमरे की चौखट पकड़े अम्मा खड़ी थीं। मोना और मधु शीघ्रता से उठ कर उनके पास गयीं और उन्हें पकड़ कर अर्जुन और मंजुला के बीच में बैठा दिया।
"मैं सभी की बातें सुन रही थी अंदर लेटे लेटे। मुझे बेहद खुशी हो रही थी सब सुन कर। बेटे तो बेटे हैं ही बहुएं भी एक से बढ़ कर एक हैं। खुशी के मारे मेरे आँसू रुक ही नहीं रहे थे। देखो अर्जुन! अभी एक साल तो मुझे पीपल के नीचे प्रतिदिन दीपक जलाना है इसलिए मैं कहीं नहीं जाऊँगी। बीमारी अज़ारी की बात अलग है नहीं तो अब मैं गाँव मे ही रहना चाहती हूँ। यहाँ के जैसा खुलापन और ऐसा अपनापन मुझे कहीं नहीं दिखता। हाँ कानपुर में अधिक समय बिताने के कारण मुझे वहाँ अच्छा लगने लगा है। और ऐ शंकर! तू क्या कह रहा था कि शादी के इतने साल बाद ही तू बाप नहीं बना है.. तो क्या तूने मोना से पिछले पन्द्रह दिनों में ढंग से बातचीत की?"
सब मोना की तरफ देखने लगे तो वह उठकर कमरे के अंदर चली गयी।
"ठीक है। एक दुर्घटना हुई और तुम्हारे पिताजी नहीं रहे। दुःख तो है ही। लेकिन अर्जुन तेरे रहते मुझे कभी चिंता नहीं हुई कि 'अब क्या होगा'। जिस तरह से आप सब में एकता है वह कहने से भी नहीं कही जा सकती है। अब आनन्द के विवाह के विषय में सोचो क्योकि इसकी शादी के बाद जब यह पहली बार अपनी बहू को ले जाएगा तब मैं भी जाऊँगी साथ में।"अम्मा ने माहौल को हल्काफुलका बनाते हुए बात समाप्त की।
अर्जुन ने अम्मा से धीरे से पूछा - तो क्या मोना.."
मुस्कुरास्ते हुए अम्मा बोली-"हाँ वह गर्भ से है।"
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दो वर्ष बाद
अम्मा आनन्द और उसकी नवोढ़ा पत्नी सीमा के साथ बंगलोर जाने की तैयारी कर रही हैं। आनन्द ने अभी सीमा को ले जाने से मना किया था। लेकिन विवाह के बाद ड्यूटी पर वापसी करते समय अम्मा ने साफ साफ कह दिया था कि अगले छह माह के अंदर वहाँ रहने की व्यवस्था करके सीमा को ले जाए। इस समय कानपुर से अर्जुन, मंजुला, बेटे रितिक और मोहन की बिटिया श्यामा के साथ और बनारस से शंकर मोना और नन्हे मंगल के साथ गाँव में आ चुके हैं।
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