"पापा शाम तो हो गयी है ....चलो न दीपक जलाते है."
नन्ही गज़ल लैपटॉप पर ऑफिस का काम निपटा रहे पापा के हाथों पर कोमल कोमल हथेलियां रखते हुए बोल रही थी.
अपनी लाडली के गालों पर स्नेह भरा स्पर्श करते हुए नितिन ने लैपटॉप को शटडाउन में डाल दिया था.
"दीपक जलाने का समय तो हो गया है ...काम काम मे मुझे ध्यान ही नही रहा बेटे जी."
"मम्मी तैयार हो रही है पापा आप भी नए कपड़े पहन लो फिर हमसब दीपक जलाएंगे ."
थोड़ी देर बाद तीनों तैयार होकर सोसाइटी परिसर में आ चुके थे.
दस वर्षीय गजल की प्यारी बिल्ली पटाखों के आवाज से डर जाती थी इसलिए उसे पटाखे पसन्द नही थे.पर रोशनी उसे बहुत पसन्द थी.दीपक जलाना,चारो तरफ बिजली की जगमगाती लाइट्स देखने मे उसे बेहद आनन्द आता था.
सोसाइटी केम्पस के मुख्य द्वार पर वॉचमैन अपनी ड्यूटी मुस्तेदी से कर रहा था.नितिन ने पास जाकर उसे दीवाली गिफ्ट के रूप में पांच सौ का एक नोट दिया तो उसकी थकी आंखे एकदम से खिल उठी थी.उसके शरीर मे एक नई ऊर्जा आ गयी थी.गजल को भी बहुत अच्छा लगा.
तीनो अब टहलते टहलते सोसाइटी के बाहर आ गए थे.
बाहर सड़क पर एक बालक छोटे से टेबल पर मोमबत्तियां रखकर बेच रहा था.
"पापा क्या ये नए कपड़े नही पहनेगा.इसके मम्मी पापा कहाँ है मम्मी"
"आओ उससे पूछते है ."
पूजा और नितिन गजल का हाथ थामे उसे ले उस अबोध से बालक के पास ले गए थे.
पूजा ने उससे मोमबत्ती का एक पैकेट लिया और उसके पैसे देने के बाद उसे अपने थैले से मिठाईयों का एक पैकेट निकाल कर दे दिया.
थोड़ी सी हिचक के बाद उसने झट से पैकेट ले लिया था.
कुछ दूर आने के बाद गजल ने देखा कि वो मिठाई के पैकेट को खोलकर जल्दी जल्दी खा रहा था.गजल को बेहद खुशी हो रही थी.
नारियल पानी वाला महेश रोज की तरह फुटपाथ पर अपनी दुकान लगाए बैठा था.
महेश हर दिन एक नारियल घर पर पहुंचा देता था.मीठे पानी वाला नारियल.न जाने कब से वो यहां दुकान लगाता आ रहा था.नितिन ने गजल के हाथों से एक मिठाई का पैकेट और एक सो रुपये महेश को दिलवाए तो महेश की खुशियों का ठिकाना नही था.
अब तीनो वापस आ गए थे सोसाइटी में.
"पापा हम दीपक कब जलाएंगे."
मासूम गजल को नितिन ने गोद मे उठा लिया था.
"जला तो लिए हमने कितने सारे दीपक. बूढे वॉचमैन अंकल की आंखों की चमक.मोमबत्तियां बेचते उस बालक का मिठाई खाने का आनन्द.
"जीवन की इन रोशनियों से जो उजाला फैलता है उसे देखने का सुख और आनन्द अद्भुत होता है बेटे."
नितिन और पूजा गजल को बड़े प्यार भरे अंदाज से रोशनी का वास्तविक अर्थ समझा रहे थे.
पापा मम्मी की ये बातें गजल को बहुत ज्यादा तो समझ मे नहीं आयी थी पर वो अंदर से एक खुशी जरूर महसूस कर रही थी.
हंसती खेलती गजल अब घर के बाहर मम्मी पापा के संग दीपक जला रही थी. पर उसकी आँखों मे भी वो दीपक ज्यादा चमक रहे थे जो मम्मी पापा के साथ कुछ देर पहले इंसानी आंखों में वह प्रज्वलित कर कर आयी थी.
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