"कितनी ठंड है.सर्दियों में तो पानी में हाथ डालने का मन ही नही करता."रात को रसोई का काम निपटा कर आई छाया रजाई में घुसते हुए पति रजन से बोली.
"हाँ सच में.लगता है इस बार ठंड सारे पिछले रिकार्ड तोड़ देगी."
दोनों बातें कर ही रहे थे कि दरवाजे की घंटी बजी.
"लो आ गये सासूमाँ के रिश्तेदार. यार जब देखो कोई न कोई मुंह उठाये चला आता है.मैं पहले ही कह रही हूँ मैं बाहर जाने वाली नही."
छाया का ससुराल रेलवे स्टेशन के पास ही था.इसलिए आते जाते सासूमाँ के ससुराल वाले,मायकेवाले और जान पहचान वाले देर सवेर उनके घर आ धमकते थे.किसी की सुबह की ट्रेन होती तो किसी की देर रात की,किसी की ट्रेन देर से आती तो किसी की ट्रेन छूट जाती.छाया की सासूमाँ कमला जी का स्वभाव बहुत अच्छा था.जो भी आता उसे प्यार और अपनेपन से मिलती.चाहे कोई कितनी भी रात बेरात आता उसे खाना खिलाये बिना नही रहती. इसलिए उनके घर कोई भी जानपहचान वालें बेझिझक आ जाते.
"बहू रजत बाहर आओ."
छाया ने रजत को देखा और न चाहते हुए भी उसके साथ बाहर आना पड़ा.
"अंकल,आंटी आप.इतनी रात को इन दोनों नटखट(सविता,कविता) के साथ इस वक्त.छाया मेरा दिल्ली में ट्रांसफर होने से पहले हम मुम्बई में पड़ोसी थे."रजत ने छाया से कहा और उनके पैर छूने बढ़ा.पीछे पीछे छाया भी आ गई.
"माफ करना बेटी इतनी रात को परेशान किया.लेकिन क्या करते.दिसंबर की कड़ाके की ठंड ऊपर से घना कोहरा.कोहरे के कारण ट्रेन बहुत धीरे चल रही थी.स्टेशन पर पहुंच तो दस बज चुके थे.जहाँ जाना है उनका घर यहाँ से बहुत दूर है इतनी रात को कोई टैक्सी या ऑटो वाला वहाँ जाने के लिए तैयार ही नही हुआ.सोचा होटल में रूक जाते है पर साथ में दो जवान लड़कियां है ये सोच कर मन नही माना. फिर तुम्हारी सास का ख्याल आया.फोन की बैटरी भी चली गई थी नही तो फोन कर देते." छाया को देखकर झिझकते हुए शर्मा जी बोले.
"कैसी बातें कर रहे है आप भाईसाहब. ये आपका ही घर है .जब मन हो चले आईये और ऐसी परेशानी में अपने ही काम आते है.ठीक किया जो आप यहाँ चले आये. जवान बेटियों के साथ किसी अंजान होटल में रहना सही भी तो नही."
"अंकल आंटी आप सब हाथ मुंह धो लिजिए .जब तक आप चाय नाश्ता करेगें छाया खाना बना देगी."
"कमला खाना बनाने की जरूरत नही है वैसे भी भूख नही है. बस चाय से काम चल जायेगा."आंटी बोली.
"हम तुमको खाली पेट कैसे सोने दे सकते हूँ. बस पंद्रह मिनट में खाना बन जायेगा. खा कर आराम से सोना."
"मम्मी जी ये कोई आने का वक्त है.जो देखो मुंह उठाये चला आता है आपके भोलेपन का सब बहुत फायदा उठाते है और जब वो कह रहे है भूख नही है तो आप बेकार में जिद्द क्यों कर रही है."रसोई में छाया सासूमाँ से बोली.
"बेटा ऐसा नही कहते.वो अपना समझ कर ही इतनी रात को आये है.कोई बेवक्त किसी के घर यूं ही नही चला आता और घर आये मेहमान का यूं अनादर नही करना चाहिए. वो हमें परेशान नही करना चाहते इसलिए खाने के लिए मना कर रहे है.भला दिनभर से भूख नही लगेगीं क्या."
सास बहू ने जल्दी से खाना बना दिया.
सबको खाना खिलाने के बाद छाया बर्तन धोने लगी.
"भाभी बर्तन हम धो देंगे. आप थक गई होगी.जा कर आराम करिये." सविता कविता ने जबरदस्ती छाया को उसके कमरे में भेज दिया.
सुबह नाश्ता करके वो लोगा जाने लगे.जाने से पहले उन्हें छाया को ढेरों आशीर्वाद दे दिये.उनका प्यार देख कर छाया को अपने रात के बर्ताव में शर्मिंदगी होने लगी.
कुछ महीनों बाद.....
"बहू क्या बात है .इतनी परेशान क्यों हो ?"
"मम्मी जी पापा को एक हफ्ते के लिए ऑफिस के काम से मुम्बई जाना है.होटल तो ऑफिस वाले दे रहे है पर खाने की परेशानी है पापा को बेल्ड प्रेशर है.बाहर का तला भुना खायेगे तो उनका ब्लडप्रेशर बढ़ जायेगा.मम्मी पापा की तबीयत को लेकर बहुत परेशान है.लेकिन जाना भी जरूरी है समझ नही आ रहा क्या करें."
"अरे इसमें परेशानी की क्या बात है कुछ महीने पहले शर्मा भाईसाहब आये थे पापा के खाने की व्यवस्था वही कर देते है."
"लेकिन मम्मी जी एक हफ्ते किसी अंजान को कोई अपने घर में क्यों खिलायेगा."
"बहू हम पुराने लोग है रिश्ता निभाना जानते है.आजकल की पीढ़ी की तरह हर रिश्ते में नफा नुकसान नही देखते.फिर समधी जी अंजान कैसे हुए वो घर के सदस्य ही है. मैं अभी उनसे बात करती हूँ."
"भाई साहब मेरे समधी कुछ दिनों के लिए मुम्बई आ रहे है रहने की व्यवस्था तो हो गई पर उन्हें ब्लडप्रेशर है.बाहर का खाना उनकी सेहत के लिए नुकसानदायक है.यदि खाने का एक समय का इंतजाम आपके घर हो जायेगा तो मेहरबानी."
"आपने हमे ऐसा बोल कर पराया कर दिया.हम है तो उन्हें होटल में रहे की कोई जरूरत नही.उनसे बोलिए जब तक मुम्बई मे है हमारे घर ही रहेगें .उन्हें यहाँ कोई परेशानी नही होने देंगे.आप चिंता मत करिये.आने का दिन और ट्रेन का नम्बर बता दीजिएगा और उनको हमारा नम्बर दे दीजिए.अमित(बेटा )उन्हें स्टेशन से ले आयेगा."
"देखा बहू नेकी कभी व्यर्थ नही जाती. इसलिए जितना संभव हो दूसरों की मदद करनी चाहिए.मम्मी से कहना समधी जी की फ्रिक न करे.ऐसा समझे वो अपने रिश्तेदार के घर जा रहे है."
"जी मम्मी जी."छाया सोच रही थी ये सासूमाँ का अच्छे स्वभाव और नेकी का बैंक बैलेंस ही तो है जो उन्हें सूद समेत वापस मिल रहा है.अब उसने भी अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने का मन बना लिया था.
शशि ध्यानी
दिल्ली
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