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चौथा पड़ाव

 मैं सुबह अलसाए मन से सोकर उठी, क्योंकि आज मेरे रिटायरमेंट का पहला दिन था और मुझे पढ़ाने के लिए स्कूल जाने की जल्दी नहीं थी, इसलिए मेरा मन भी बहुत प्रफुल्लित था. अन्य दिनों के विपरीत जल्दी-जल्दी चाय बनाने की अपेक्षा मैं अपनी बालकनी में जाकर खड़ी हो गई. रातभर बरसात होने के कारण अमलतास और रात की रानी के पेड़ों से पानी टपक रहा था और उनके फूल ज़मीन पर बिखरे हुए थे. दूर-दूर तक सड़कें नहाई हुई लग रही थीं. बौछार के साथ ठंडी-ठंडी हवा और चिड़ियों की चहचहाहट मन को पुलकित कर रही थी. इस दृश्य की अनुभूति मुझे बिल्कुल नई लग रही थी, क्योंकि दस साल पहले इस मकान में आने के बाद जितनी फुर्सत से आज इसका अवलोकन कर रही हूं, इससे पहले कभी नहीं कर सकी.

स्कूल की नौकरी और बेटे समर के पालन-पोषण में घड़ी की सुइयों के अनुसार जीवन बीत रहा था. दृश्य देखने में इतनी खो गई थी कि मेरे पति सुनील के पुकारने की आवाज़ भी मेरे कानों से टकराकर लौट गई थी. हमेशा की तरह वे मुझे ढूंढ़ते हुए बालकनी में आ पहुंचे और बोले, “क्यों भई, आज चाय नहीं मिलेगी क्या? कल तक तो सुबह की चाय मैं ही तुम्हें बनाकर देता था. आज तो तुम भी मेरी तरह रिटायर हो, आज तुम चाय बनाओगी… ठीक है.”

“सच में तुमने यदि सहयोग नहीं दिया होता, तो मेरे लिए नौकरी करना बहुत कठिन था. अब सुबह की चाय मैं ही बनाऊंगी, लेकिन सुबह पांच बजे नहीं, सात बजे, नो रूटीन. कभी थोड़ा जल्दी… कभी थोड़ा लेट, चलेगा? मैं रूटीन से थक गई हूं.”

“हां, ठीक है. रिटायरमेंट का समय मिलता ही है अपने जीवन को अपने अनुसार जीने के लिए. नो वर्क प्रेशर.” इतना कहकर उन्होंने अपनी हथेली फैला दी और मैंने भी उस पर अपनी हथेली ज़ोर से रखते हुए ‘डन’ कहा और हम दोनों खिलखिलाकर हंस दिए.

मैं दो प्याली चाय बनाकर बालकनी में लाई और सुनील को, जो डायनिंग टेबल पर मेरा इंतज़ार कर रहे थे, आवाज़ देकर बुलाया और बोली, “अब हम सुबह की चाय बालकनी में ही लेंगे.” वे मुस्कुराते हुए बैठ गए. मैं जल्दी से उठकर अख़बार उठा लाई और सोचने लगी कि इस बालकनी में, जिसमें अभी तक बेतरतीबी से घर का फालतू सामान रखा था, उसे हटाकर बैठने के लिए दो कुर्सियां और एक मेज़ रखूंगी और यहीं बैठकर चाय पीया करेंगे. नौकरी की आपाधापी में कभी यह ख़्याल आया ही नहीं था. मुझे याद आया कि स्कूल के लिए जाते समय मैं चाय पीती नहीं थी, बल्कि घुटकती थी. वह भी कभी बैठकर और कभी-कभी खड़े-खड़े ही. छुट्टीवाले दिन भी घर के अन्य कार्यों में इतनी व्यस्त हो जाती थी कि आराम से चाय पीने का मौक़ा ही नहीं मिलता था.

मैंने महसूस किया कि बालकनी में चाय पीने का मज़ा ही अलग था. अब चाय घुटकने के स्थान पर उसको चुस्कियों के साथ पीते हुए बाहरी दृश्यों का आनंद लेना अख़बार की ख़बरों को पढ़ते हुए उस पर चर्चा करना, अलौकिक आनंद की अनुभूति दे रहा था, जिसे मैं शब्दों में नहीं बांध सकती.

मैंने लिस्ट बनाई कि किस-किस से मिलने का मन करता था और अब तक  उनसे मिलना टालती रही थी. सबसे पहले मुझे मुंबई में रहनेवाली अपनी बचपन की सखी पूनम का ख़्याल आया. उससे चार साल पहले उसके बेटे के विवाह पर ही मिली थी और विवाह की व्यस्तता के कारण 3 दिन में अधूरे मन से वापिस आना पड़ा था. मैंने झटपट वहां जाने की घोषणा अपने पति और बेटे समर के सामने कर दी और एक हफ़्ते के बाद ही वहां जाने का प्रोग्राम बना लिया. मुझे याद आया कि एक बार जब मेरी मां बीमार थीं, मैं मन मसोस कर रह गई थी, क्योंकि बच्चों के इम्तिहान और अपनी नौकरी के कारण उनको देखने भी नहीं जा पाई थी और वे दुनिया से भी चली गईं. कई बार तो घर पर मेहमान रहते थे और मुझे मजबूर होकर स्कूल जाना पड़ता था. उन दिनों की बेचारगी याद करके मेरा मन कसैला हो गया.

अभी मुझे पूनम के पास गए दो दिन भी नहीं हुए थे कि समर का फोन आया कि उसकी कंपनी उसे बहुत जल्दी लंदन ट्रांसफर करना चाहती है. मैंने प्रत्युत्तर में ख़ुशी ज़ाहिर की, तो वह बोला, “मैं जानता था कि आप सुनकर ख़ुश होंगी, जबकि आपका और पापा का अपनी पोती और हमारे बिना रहना काफ़ी कठिन होगा और नए सिरे से अपनी ज़िंदगी आरंभ करनी होगी, लेकिन मैं आपको अधिक दिन तक अपने से दूर नहीं रहने दूंगा, जल्दी ही आप दोनों को अपने पास बुला लूंगा. पहले थोड़ा मुझे वहां सेटल होने दीजिए.” इससे पहले कि मैं कुछ उत्तर देती, फोन कट गया.

पूनम के साथ एक हफ़्ता रहकर बहुत आनंद आया. हम दोनों अतीत की यादें ताज़ा करके, मानो उसी युग में पहुंच गए थे. समय के बहाव ने हमारी दोस्ती पर रत्तीभर भी प्रभाव नहीं छोड़ा था. संतुष्ट मन से मैं वापिस दिल्ली आ गई.

समर एक महीने बाद ही अपने परिवार के साथ लंदन चला गया. एक बार तो उसके जाने से हमें झटका लगा कि अकेले कैसे रहेंगे? लेकिन जल्दी ही हमने अपने आपको संभाल लिया. उसके साथ रहते हुए, कुछ कार्यों के लिए अपने को असमर्थ समझकर उस पर आश्रित रहते थे, उसके जाने के बाद उन्हें स्वयं करने के लिए हमारे अंदर नई ऊर्जा का संचार हुआ और हम उसे करने में सक्षम हो गए. कहते हैं ना ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है’. मुझे आरंभ से ही पढ़ने में बहुत रुचि थी, जो विवाह के बाद कभी पूरी नहीं कर पाई थी. अब ऑनलाइन किताबें मंगवाकर पढ़ने में व्यस्त रहने लगी. लाइब्रेरी की मेंबरशिप ले ली. वहां जाने से पढ़ने का शौक़ तो पूरा होता ही था, बहुत से पढ़ने के शौक़ीन लोगों से वहीं जान-पहचान भी हो गई और पुस्तकों के बारे में उनसे चर्चा करने में जहां ज्ञान की वृद्धि होती थी,

वहीं जान-पहचान के लोगों का दायरा भी बढ़ गया था. इंटरनेट पर भी बहुत से परिचित लोगों से कनेक्टेड होने से अकेलेपन का एहसास ही जैसे समाप्त हो गया था. फिल्मों का शौक़ भी मनचाही फिल्में देखने से पूरा हो रहा था. सबसे मिलने-जुलने में और फोन पर लंबी बातें करने में समय कहां बीत रहा था, पता ही नहीं चला. ऐसा लग रहा था जैसे बचपन के केयरफ्री दिन फिर लौटकर आ गए थे. किसी ने सही परिभाषा दी है कि ‘प्रौढ़ावस्था बचपन का पर्याय होता है’.

समर ने कुछ महीनों बाद ही हमारा वीज़ा प्रोसेस करना आरंभ कर दिया और जल्दी ही हमें अपने पास बुला लिया. उसकी सुखी गृहस्थी देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई. जब हमारे साथ रहता था, तब  मुझे अक्सर चिंता होती थी कि वह हमसे इतना अटैच्ड था कि कभी हमारे बिना रह भी पाएगा, लेकिन यह देखकर कि अकेले रहकर वह बहुत स्वावलंबी हो गया था और दैनिक क्रिया-कलाप सुचारु रूप से हो रहे थे. मैंने महसूस किया कि बच्चों में अपने माता-पिता से दूर रहकर ही आत्मनिर्भरता आती है, इसलिए उनसे कुछ समय के लिए दूर रहना भी आवश्यक है. हमें उनके साथ रहते हुए छह महीने बीत गए, तो मुझे इंडिया की याद आने लगी और मैंने समर को जब अपने लौटने की इच्छा बताई, तो वह बोला, “ममा, आप लोग वहां जाकर क्या करेंगे? दूर रहेंगे तो मुझे भी आप लोगों की चिंता रहेगी.”

मैंने प्रत्युत्तर में कहा, “नहीं बेटा, तुम हमारी चिंता बिल्कुल नहीं करो, हमारी वहां की और यहां की जीवनशैली भिन्न होते हुए भी अपनी जगह दोनों ही बहुत महत्वपूर्ण हैं और मैं दोनों में से पूर्णरूप से किसी से भी कटकर नहीं रहना चाहती. यहां कुछ महीनों के लिए तुम लोगों के साथ रहकर तुम्हारे जीवन-चर्या के अनुसार ज़िम्मेदारी-मुक्त होकर जीने का अलग ही आनंद है. मैं  हमेशा के लिए तुम्हारे साथ रहकर तुम्हारी ज़िम्मेदारियों को बढ़ाना नहीं चाहती, इसलिए इंडिया में रहकर अपना जीवन, अपनी दिनचर्या के अनुसार भी जीना चाहती हूं. बेटा बुरा मत मानना, मैं यह भी चाहती हूं कि हर लड़की की तरह गीता भी अपना घर अपनी इच्छानुसार सजाने-संवारने का अपना सपना पूरा करे और तुम भी अपने परिवार की ज़िम्मेदारी हमारे बिना संभालते हुए अपना जीवन स्वतंत्र रूप से अपनी इच्छानुसार जीयो और हमें भी जीने दो. तुम्हें जब भी हमारी ज़रूरत होगी, हम तुरंत तुम्हारे पास आ जाएंगे.” मैंने दृढ़ स्वर में जब अपना प्रस्ताव समर के सामने रखा और सुनील ने भी उस पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी, तो उसे मेरी बात अधूरे मन से माननी पड़ी.

हम वापिस इंडिया आ गए और अपने रूटीन के अनुसार तनावरहित जीवन जीने लगे. हमें अपने स्वास्थ्य के लिए भी टहलने  और व्यायाम करने का भरपूर समय मिलता था. मैं सोचती थी कि समर लंदन चला गया, तो हमें अकेले रहने का मौक़ा मिला, लेकिन इंडिया में एक शहर में रहते हुए भी बेटा-बहू से अलग रहा जाए, तो क्या बुराई है? जिसके लिए समाज की प्रतिक्रिया तो नकारात्मक ही होगी. अब समय के बदलाव के अनुसार ज़रूरत है हमें हमारी सोच बदलने की, क्योंकि अब बच्चों की और प्रौढ़ लोगों की जीवनशैली में इतना अंतर आ गया है कि दोनों को ही साथ रहने में असुविधा होती है. हर उम्र में हरेक को अपने निजी जीवन को अपनी इच्छानुसार जीने के लिए स्वतंत्रता चाहिए होती है, जो साथ रहकर नहीं मिलती. इसका दूसरा सकारात्मक परिणाम यह है कि दोनों पीढ़ियों के पास दो घर हो जाते हैं और जब भी बदलाव का मन हो, तो एक-दूसरे के घर आ-जा सकते हैं और बच्चे भी आत्मनिर्भर होकर अपनी ज़िम्मेदारी संभालना सीख जाते हैं.

मुझे याद आया कि जब मेरे रिटायर होने  में कुछ महीने ही शेष रह गए थे, तब मेरी कलीग मिसेज़ पारीख बोलीं, “मैं भी अगले साल रिटायर हो जाऊंगी, आपके साथ तो आपका बेटा रहता है, इसलिए आपको घर में अकेलापन नहीं लगेगा. मेरी तो एक बेटी ही है, उसकी भी शादी हो गई है. मैं अकेले कैसे रहूंगी?”

मैंने उनको जवाब दिया था, “हमारे उम्र के इस पड़ाव तक आते-आते बेटा हो या बेटी, दोनों ही अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं. बेटी विवाह के कारण दूर जा सकती है, तो बेटा भी नौकरी के कारण हमसे दूर जा सकता है, यह सब स्वाभाविक है. ऐसा तो कभी न कभी होना ही है. यह जानते हुए भी हम अपने को ख़ुश रखने के लिए अपने बच्चों पर आश्रित रहते हैं, तो रिटायरमेंट के बाद का समय हमारे लिए अभिशाप बन जाता है. इसलिए आत्मनिर्भर रहकर अपने को ख़ुश रखने के अन्य रास्ते तलाशने चाहिए. अपनी दबी हुई इच्छाओं को पूरा करने का सुनहरा मौक़ा रिटायरमेंट के बाद ही मिलता है. वह हम बिना किसी पर आश्रित रहकर ही पूरा कर सकते हैं.” उन्हें मेरी बातें व्यावहारिक ना लगकर मात्र उपदेश लगीं. प्रत्युत्तर में बोलीं,  “ठीक है. आपका वह समय भी जल्दी ही आनेवाला है, तब देखूंगी…” और अब वह समय आ ही गया.

मेरे इंडिया पहुंचने पर वे मुझसे मिलने आईं और मेरे चेहरे की चमक देखकर हतप्रभ होकर बोलीं, “मैं तो समझी, अब तुम वहीं रहोगी!” तो मैं उनकी बात पूरी होने से पहले ही बोली, “देखो जो मैं कह रही थी, उसे मैंने सच कर दिखाया. मैं यहां अकेले बहुत ख़ुश हूं, ऐसा लग रहा है, जैसे कि मेरे नए पंख उग आए हैं और मैं जहां चाहूं उड़ सकती हूं.” मेरी बात सुनकर वे बोलीं, “सच में मैंने तो हमेशा लोगों को रिटायरमेंट के बाद बीमारियों का रोना रोते ही देखा है. आपसे मिलकर मुझे इस उम्र को जीने की कला सीखने को मिली है. आपका बहुत धन्यवाद.”

“वास्तव में ऐसे लोगों का शरीर बीमार नहीं होता, उनकी सोच बीमार होती है. वे अपने को बूढ़ा सोचकर अपने को असहाय और अक्षम मान लेते हैं और अपने शेष जीवन को जीने का एकमात्र उद्देश्य मृत्यु की प्रतीक्षा करना ही समझने लगते हैं. उनकी इस नकारात्मक सोच का प्रभाव उनके शरीर पर भी पड़ता है. उम्र के अनुसार शरीर पर बाहरी बदलाव तो आता है, लेकिन हमारी सोच हमारी बढ़ती उम्र के प्रति सकारात्मक हो, तो उसका प्रभाव हमारे मन पर कभी नहीं पड़ता. मन हमेशा उमंग से भरा होना चाहिए, उम्र को अपने मन पर कभी हावी नहीं होने देना चाहिए और यह कला मुझे भी अपने आप नहीं आई, मैंने भी किताबें पढ़कर सीखी है. एक किताब में मैंने पढ़ा था, जब तुम अपनी सोच को नियंत्रित कर लेते हो, तो अपने मस्तिष्क में आए विचारों को भी नियंत्रित कर लेते हो और जब तुम अपने मस्तिष्क में आए विचारों को नियंत्रित कर लेते हो, तो अपने जीवन को भी नियंत्रित कर लेते हो… इस बात का प्रभाव मुझ पर जीवनपर्यंत रहा और मेरी जीवन के प्रति सोच ही सकारात्मक हो गई.” मेरी बात सुनकर मिसेज़ पारीख के चेहरे की प्रतिक्रिया ऐसे लग रही थी, जैसे कि मैंने जीवन के चौथे पड़ाव को ख़ुशी से जीने की कला ही उन्हें सिखा दी हो.

सुधा कसेरा


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