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गंगा

 आज सुबह जब से मेन्स का रिजल्ट आया है तब से कामायनी अपने कमरे में पड़ी रो रही थी। उसने अपना मोबाइल स्विच ऑफ कर रखा था। इंटरकॉम और लैंडलाइन फोन का रिसीवर भी हटा दिया था। बहुत आशा थी पास होने की, सभी पेपर अच्छे गए थे। न जाने कहाँ चूक हो गयी। वह अनुत्तीर्ण हो गयी थी। पिताजी को क्या जवाब देगी? उन्हें तो बहुत अधिक लज्जित होना पड़ेगा। एक युवा इकलौती बेटी को, जिसने दो वर्ष पहले ही अपनी माँ को खोया हो, अपने से 200 किमी दूर किसी अनजाने शहर में अकेले भेजने के निर्णय पर उन्हें अपने भाइयों और पारिवारिक सदस्यों द्वारा खूब खरी-खोटी और ऊँच-नीच सुनाई गयी थी किंतु उन्होंने किसी की भी नहीं सुनी और वे कामायनी की माँ की इच्छा के अनुरूप उसे पीसीएस की कोचिंग के लिए कानपुर भेजने पर अडिग रहे थे।

जाने माने व्यापारी पिता ने बहुत से सम्बन्धी होने के बावजूद कानपुर में कोचिंग मंडी के नाम से प्रसिद्ध काकादेव मुहल्ले में ही ऊँची दर पर पीजी की व्यवस्था कर दी थी। एक सरदार जी का घर था किंतु घर मे गृहस्वामिनी अकेले ही रहती थीं। उनके पति का स्वर्गवास हो चुका था जबकि बच्चे कनाडा में सेटल्ड थे। बच्चों ने माँ को भी ले जाना चाहा किन्तु माँ ने अंतिम साँस तक इस घर को न छोड़ने की बात कह कर इस कनाडा के चेप्टर को बंद कर दिया था। ऊपर पहली मंजिल में उनके बच्चों के तीन कमरे थे जो वेल फर्निश्ड  थे। एसी, एलईडी टीवी, लैंडलाइन की एक लाइन, एक इण्टरकॉम, फ्रिज और वाशिंग मशीन आदि सभी कुछ था उनमें। वे कोचिंग के लिए आने वाली एकाकी और सम्पन्न लड़कियों को ही कमरे देती थीं ताकि अधिक भीड़ भी न हो और झंझट भी न हो। बिना उनकी सहमति के रहने वालों के अतिरिक्त किसी अन्य को गार्ड आने ही नही देता था। इसवर्ष एक कमरा कामायनी ने  लिया हुआ था जबकि दो अन्य कमरों में एक में गोरखपुर के एक डॉ की बेटी नित्या तथा दूसरे में आगरा के एक चमड़ा व्यापारी की बेटी महक रह रही थीं।

दरवाजे पर थाप सुनकर कामायनी बोली - "कौन है?"

- "दीदी जी मैं रज्जो। आन्टी जी नाश्ते के लिए बुला रही हैं। नित्या दी और खुशबू दी भी हैं टेबल पर। आपका इण्टरकॉम भी काम नहीं कर रहा है।" यह घर की विश्वासपात्र मेड-कम-केयरटेकर रज्जो थी।

-"रज्जो! आज तबियत खराब है। आन्टी से बोलो कि वे सभी नाश्ता कर लें। मैं बाद में आ जाऊंगी।" कामायनी ने लेटे लेटे जी उत्तर दिया।

- "ठीक है दीदी जी।" फिर सीढ़ियों पर रज्जो के उतरने के स्वर धीरे धीरे मन्द पड़ने लगे।

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गंगा-बैराज के ऊपर पहुँचते ही कामायनी ने ऑटो को रोककर किराया चुकता किया और स्थिर कदमों से उस स्थान की तरफ बढ़ चली जहाँ पर नीचे गंगा जी बहुत गहरी थी और तीव्र गति से बहती थीं। उसने देखा कि वहॉं पर एक लड़की पहले से ही खड़ी थी और आस पास पुलिस के जवान भी टहल रहे थे जिनमें महिला व पुरुष दोनों ही थे।

गंगा बैराज में उस स्थल को "डेथ पॉइंट" कहा जाने लगा है क्योंकि जब भी किसी परीक्षा का परिणाम घोषित होता है तब कई असफल छात्र छात्राएं यहॉं से कूद कर जान दे देते हैं। अब प्रशासन भी चौकन्ना हो गया है। रेलिंग ऊँची कर दी गयी हैं। नीचे लोहे का जाल लगाया गया है। जिस दिन परिणाम आने होते हैं उस दिन सुबह से ही यहॉं पर अतिरिक्त पुलिसबल और गोताखोरों की टोली नियुक्त की जाती है।

समीप पहुँच कर कामायनी ने देखा कि वह लड़की रेलिंग को पकड़ कर सुबुक रही थी। तनिक और समीप जाकर उसने उसके कन्धे पर हाथ रखा तो वह चौंक गयी।

कामायनी बोली- "क्या तुम भी मेन्स में अनुत्तीर्ण हो गयी हो?"

- भी? मतलब तुम्हारा भी क्लियर नहीं हुआ?" उसने चौंकते हुए कहा।

कामायनी मुस्कुरा पड़ी फिर हँसते हुए  बोली - "क्या खूब मिलन हुआ है हम दोनों का बहन!"

ऊपर आसमान की तरफ देखते हुए वह फिर बोली - "वाह रे! भगवान, तेरी माया को कोई नहीं समझ पाया है। एक ही झटके में दो जानें बचा दीं। धन्य हो भगवन!" फिर हाथ जोड़ कर माथे से लगाया और सिसकने लगी।

अब वह लडक़ी कामायनी के कंधे पर हाथ रख कर उसे दिलासा देने लगी।

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अटल घाट पर बनी एक हट से दो ग्लास ऑरेंज जूस लेकर वे दोनों, जहाँ तक जनसामान्य व विजिटर्स को जाने मंजूरी थी, गंगा जी के उथले पानी में पड़े पत्थरों पर बैठ गयीं और बातें करने लगीं। थोड़ी थोड़ी दूर पर नियुक्त पुलिस कर्मियों की दृष्टि उन जैसे बहुत से लोगों पर बराबर दौड़ रही थी।

उस लड़की ने अपना नाम विद्या और स्वयं को फतेहगढ़ की निवासी बताया। पिताजी फौज में हैं और मां प्राइमरी टीचर हैं। बड़ा भाई विकलांग है और छोटी बहन इंटर में पढ़ रही है। यहाँ कल्यानपुर में लड़कियों के एक प्राइवेट छात्रवास में रहकर कोचिंग ले रही थी। फेल हो जाने के कारण बैराज पर आत्महत्या करने गयी थी किन्तु पुलिसकर्मियों के कारण हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी।

कामायनी ने अपने विषय में संक्षिप्त जानकारी दी और कहा-"आओ चलो।"

-"कहाँ"

-"मेरे पीजी रूम में"

कुछ आनाकानी के बाद विद्या राजी हो गयी।

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कामायनी अंदर आन्टी से विद्या के लिए परमीशन लेने गयी। पहुँच कर देखा कि उसके पिताजी अंदर आन्टी से बातें कर रहे थे।  बाप बेटी गले मिले और दोनों रोने लगे। पिताजी बोले- "बेटी, मैंने तुम्हारा रिजल्ट देख लिया था। फेल देख कर मैंने तुमसे बात करनी चाही तो तुम्हारा फोन बंद मिला। कई प्रयासों के बाद जब तुमसे बात न हो पाई तब आन्टी का नम्बर खोजा। इनसे बात हुई तो इन्होंने बताया कि तुमने आज नाश्ता  भी नहीं किया और बिना बताए कहीं चली भी गई हो। मैं घबरा गया कि कहीं तुम कोई गलत कदम ना उठा लो.. बस कार  उठाई और भागता हुआ यहाँ आ गया।"

"पापा,आइये कमरे में चलें। वहीं बात करते हैं।" झुकी नज़रों से कामायनी बोली।

अनुमति मिलते ही विद्या अंदर आयी फिर वह कामायनी व उसके पिताजी के साथ कमरे पर आ गयी।

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सब व्यथा कथा सुनने के बाद पिताजी बोले- "यह क्या करने जा रही थी तुम कामायनी! एकबार भी तुम्हारे मन मे पापा का विचार  नही आया। अरे! बिटिया, तुम्हारी मम्मी के जाने के बाद मेरा यह जीवन सिर्फ तुम्हारे लिए ही तो है। न बिटिया न..भविष्य में कितनी भी बड़ी समस्या क्यों न आ जाय पर आत्महत्या जैसा पाप करने को कभी मत सोचना। यह सफलता और असफलता तो जीवन का अंग है। सफलता घमण्ड को जन्म दे सकती है किन्तु असफलता तो विनम्र ही बनाती है। और हाँ, तुम्हारा यह विचार मुझे अच्छा लगा कि विद्या को यहीं अपने साथ रखना चाहती हो। मैं आन्टी जी से बात कर लूँगा। कुछ पैसे बढाना चाहेंगीं तो भी कोई बात नहीं। इसवर्ष तुम दोनों लोग मन लगा कर फिर से तैयारी करो। अभी तो कई अटेम्ट और ले सकती हो न.. । दोनों की फीस मैं भेजता रहूँगा। देखो! फेल भी हो जाओगी तो फिर प्रयास करना। किन्तु  गंगा बैराज की तरफ ...न न न .."

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अगले साल के रिजल्ट सभी के चेहरों पर चमक लाने वाले साबित हुए। विद्या और कामायनी बढ़िया रैंक से पास हुई थी। हाँ, आन्टी जी अवश्य दुःखी थीं क्योकि अब ये दोनों प्यारी सी बेटियाँ उनसे पृथक हो जाएंगी।


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