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जीवन साथी

 "मिथिला जी, आप कुछ कमजोर सी दिखाई पड़ रही हैं। क्या समय से फल और दूध लेना बंद कर दिया है?" छत पर कपड़े फैलाकर लौटती मिथिला जी को हफ्तों बाद देखकर महेश जी ने पूछा।

"नहीं, ले तो रही हूँ। अब तो उम्र हो गई है हमारी, ये सारी तकलीफें तो लगी ही रहेंगी।" मिथिला जी ने हल्का मुस्कुराते हुए कहा, मगर दिल में एक दर्द सा उठ गया। वह महेश जी को क्या बतातीं कि इधर कुछ दिनों से उन्हें फल और दूध नहीं दिया जा रहा है। कभी दूध की खीर बन जाती थी तो कभी कस्टर्ड, रात को पीने के लिए दूध बचता ही नहीं था। एक हफ्ते का फल भी तीन-चार दिन में ही खत्म हो जा रहा था।

महेश जी और मिथिला जी दोनों ही शुगर के मरीज हैं। अभी पिछले महीने ही मिथिला जी की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी, तो डॉक्टर ने दवाई के साथ-साथ पौष्टिक आहार लेने को भी कहा था। इस कारण घर में दूध और फल ज्यादा लाने को कहा गया था।

महेश जीवन मिथिला जी के दो बेटे हैं और दोनों की शादी हो चुकी है। रिटायरमेंट लेते ही महेश जी ने अपने दोनों बेटों का बंटवारा कर दिया था। ऊपर का हिस्सा दो भागों में बंटता था, तो उन्होंने अपने दोनों बेटों को एक-एक भाग दे दिया था और नीचे के हिस्से में वह खुद अपनी पत्नी के साथ रह रहे थे। लेकिन खाना खाने और बनाने के लिए दोनों बहुओं को नीचे यानी उन्हीं के हिस्से में आना पड़ता था। खाना बनाने की जिम्मेदारी दोनों बहुओं ने बांट कर रखी थी—सुबह का खाना बड़ी बहु और रात का खाना छोटी बहु बनाती थी। इसी तरह घर का राशन भी बारी-बारी से दोनों बेटे ही भरते थे।

रिटायरमेंट से पहले ज्यादातर बाहर के काम महेश जी ही किया करते थे और रसोई घर में मिथिला जी की चलती थी, लेकिन महेश जी ने अपनी रिटायरमेंट के साथ-साथ मिथिला जी को भी रसोई घर से रिटायरमेंट दिलवा दी थी।

एक दिन मिथिला जी की तबीयत ज्यादा खराब हो गई, तो महेश जी ने कहा कि वे रात को दूध हाल बना लेते हैं। रसोई घर में देखा तो वहां दूध खत्म हो चुका था। उन्हें एक बार को तो बहुत गुस्सा आया कि इतना सारा दूध आखिर खत्म कैसे हो गया। फ्रिज खोल कर देखा तो फ्रिज में भी दो-चार फल ही बचे थे, जबकि अभी महीने के पूरे चार दिन बाकी थे। वापस आकर मिथिला जी से बोले, "दूध तो खत्म हो गया है, आप ये फल खा लीजिए।"

अगली सुबह जब बड़ी बहु खाना बनाने के लिए आई तो महेश जी ने उससे पूछा, "कल रात को दूध खत्म हो गया था, अगर दूध कम पड़ रहा हो तो मैं और मंगवा लूं?" बड़ी बहु घबरा गई और बोलने लगी, "उसका कम तो सुबह ही खत्म हो जाता है, इसलिए मुझे नहीं पता।" छोटी बहु से पूछने पर उसने भी ऐसा ही उत्तर दिया।

शाम को महेश जी को सोच में देख, मिथिला जी ने कारण पूछा, तो उल्टा महेश जी पूछ बैठे, "आप बताइए, घर में कुछ ऐसा तो नहीं हो रहा जो मैं नहीं जानता? आपको मेरी कसम!" मिथिला जी मना करने वाली थीं, मगर कसम की बातें सुनकर खामोश हो गईं। मन में कुछ दिनों की घटना जीवंत हो उठी—बहुओं की कही बातें कानों में गूंजने लगीं—

"अरे, इन बुड्ढे-बुड्ढी को खाने-पीने के अलावा कुछ सूझता ही नहीं है, बंटवारा करके भी इन्हीं के हिसाब से ही चलो," बड़ी बहु ने तल्खी से कहा था।
"अरे, राशन मंगवाना आता नहीं, मगर इन्हें तो बस हमेशा 56 भोग की पड़ी रहती है, कभी पकौड़े की फरमाइश तो कभी नमकीन की। शुगर के मरीज हैं तो कितना कम और नापा-तुला खाते हैं, मगर इन्हें देखो, दूध और फल तो चाहिए ही!"
"बुड्ढे ने तो बुढ़िया को भी कोई काम करने से मना कर रखा है, बस सारा दिन रसोई घर में हम खपें और वो आराम से बैठे रहें," छोटी बहु भी पीछे नहीं थी।

यह सब सुनकर मिथिला जी की आंखों में आंसू आ गए थे। कारण सिर्फ यही नहीं था कि बहुएं ऐसा अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर रही थीं, बल्कि यह था कि बजाय उन्हें समझने के, दोनों बेटे वहीं बैठे चुपचाप उनकी बातें सुन रहे थे।

अब कसम देने के बाद मन में उलझन की स्थिति थी—महेश जी को बताएं या ना बताएं?

"बताइए, मिथिला जी, क्या बात है? कहां खो गई आप?"
"कुछ भी तो नहीं, आप यूं ही परेशान हो रहे हैं।"

माएं तो होती ही हैं बच्चों की गलतियों पर पर्दा डालने वाली। यही मिथिला जी ने भी किया। लेकिन कहते हैं ना, सच को कितना भी छुपाने की कोशिश करो, वह एक ना एक दिन बाहर जरूर आ ही जाता है। और ऐसा ही हुआ।

एक दिन महेश जी कटहल ले आए और बहु को देते हुए कहा, "इसकी सब्जी खा लें, काफी दिन हो गए हैं, तो आज यही बना लो। सैर से वापस आ रहा था तो बगल के शर्मा ने दिया है।" बहु ने मन ही मन से कटहल ले लिया।

"अरे जीजी, ये कटहल कहां से लाई?" छोटी बहु ने पूछा।
"और कहां से, आज बुड्ढे को कटहल की सब्जी खाने का शौक चढ़ा है, तो ले आए। अब इसे बनाने में मेहनत तो हमें करनी पड़ेगी, ये नहीं कि ये सब फरमाइशें अपनी पत्नी से करें। बंटवारा करके भी हमें तो नौकर बना रखा है, उन बुढ़ों को बस आराम करना है। छोटी, थोड़ी मेरी मदद कर दे।"
"ना, ना, कल रात मैंने लौकी के कोफ्ते बनाए थे, अब आप खुद कर लो।"

छोटी बहु जैसे ही जाने के लिए मुड़ी, सामने रुक गई—महेश जी का चेहरा गुस्से में तमतमा रहा था, उनकी आंखें लाल हो रही थीं। बैठक में जाकर आवाज देकर उन्होंने अपने बेटों और बहुओं को भी बुलाया।

"आज तक मैंने जिंदगी में बहुत बड़े-बड़े फैसले लिए हैं, लेकिन कभी भी मैं अपने किए हुए फैसलों पर पछताया नहीं हूँ। मगर आज मुझे ऐसा लग रहा है कि अपने घर को जोड़ने की कोशिश करके मैंने बहुत बड़ी गलती कर ली। और मेरा आंशिक बंटवारे का फैसला गलत था। मैंने सोचा था कि बच्चों को अलग-अलग कर दूं, तो उनका अपना पर्सनल स्पेस रहेगा, लेकिन साथ में अगर पूरा परिवार एक साथ खाना बनाए और खाए तो रिश्तों में मिठास बनी रहेगी। इस कारण ही मैंने रसोईघर का बंटवारा नहीं किया था, क्योंकि रिश्ते तो रसोईघर में ही पकते हैं। लेकिन मेरा यह सोचना बिल्कुल ही गलत था।"

"आज दोनों बहुओं की बातों को सुनकर मुझे मेरी गलती का एहसास हो रहा है।" मिथिला जी ने महेश जी को शांत करने की कोशिश की और कहा, "जाने दो, घर में छोटी-मोटी बातें तो होती रहती हैं।"

"नहीं, मिथिला जी, शायद आपको इन सब बातों का पहले से पता था और आप उस पर पर्दा डाल रही थीं। लेकिन मैं अब ऐसा नहीं होने दूंगा। अभी भी मैं इतना सक्षम हूं कि अपना और अपनी पत्नी का अच्छे तरीके से ख्याल रख सकता हूं।"

"ऐसा क्या हो गया, बाबूजी, जो आप इतना गुस्सा हो रहे हैं?" बेटों ने पूछा।

"यह तो तुम बाद में अपनी बीवियों से पूछ लेना कि हमें किन-किन नामों से संबोधित किया जाता है। पहले तुम लोग मेरी बात सुनो—आज मैं अपनी गलती सुधार रहा हूं और रसोईघर का बंटवारा भी कर रहा हूं। आज से तुम दोनों अपना रसोई अपने कमरे के हिस्से में ही बनाना, और हमारी चिंता करना छोड़ दो। मैं अभी इतना भी बूढ़ा नहीं हुआ कि अपनी बीमार पत्नी की सेवा न कर सकूं, और मेरा पेंशन हमारे खर्चे के लिए काफी है।"

"मैंने सोचा था कि हम सब एक साथ रहेंगे, लेकिन शायद तुम लोगों को अपने मां-बाप की छोटी-छोटी खुशियां भी भारी लगने लगी हैं। आज मुझे पता चल रहा है, सीमा को जब भी पूछता था कि फल और दूध लिया कि नहीं, तो वह टाल जाती थी। जिस मां ने जिंदगीभर तुम लोगों की फरमाइशें और जिद पूरी की, आज इस वक्त तुम लोगों के पास उनके लिए दूध और फल के भी पैसे नहीं हैं। अगर ऐसी बात थी तो मुझसे कहा होता, मैं खरीदकर ला देता।"

उनकी बातों को दोनों बहुएं सिर झुकाए सुन रही थीं, आखिर गलती तो उन्हीं की थी और उनकी इस गलती में साथ दिया महेश जी के बेटों ने भी।

महेश जी, मिथिला जी को लेकर अपने कमरे में चले गए। अपनी जीवनसंगिनी की आंखों में आंसू देखकर महेश जी ने कहा, "आप रोती क्यों हैं, मैं हूं ना। मैं अभी बूढ़ा नहीं हुआ हूं।"


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