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एक प्याला चाय का रिश्ता

 अभी शादी को पाँच दिन ही हुए थे। पूरा घर नए रंग और खुशबुओं से महक रहा था। दुल्हन अन्वी के कदमों से घर में जैसे चाँद उतर आया था। सब रिश्तेदार लौट चुके थे, अब घर में बस परिवार के अपने लोग ही रह गए थे।

सुबह-सुबह अन्वी किचन में गई। सासु माँ सरोज जी वहाँ पहले से मौजूद थीं। वह सबके लिए चाय बना रही थीं।

“अरे बहू, तू क्यों उठ गई? अभी तो शादी हुई है, आराम कर ले।” – सरोज जी ने प्यार से कहा।

अन्वी ने मुस्कुराते हुए कहा—
“माँ, मैं भी चाय बना लेती हूँ। आप बैठ जाइए।”

“नहीं बेटी, तेरे हाथों में अभी मेहंदी की खुशबू बाकी है। तू क्यों तकलीफ़ करेगी? और वैसे भी मुझे घर के काम करने में मज़ा आता है।”

अन्वी कुछ पल चुप रही, फिर धीरे से बोली—
“माँ, मेरी मम्मी कहती थीं कि नए घर में अपनेपन से काम करने से जल्दी घुल-मिल जाते हैं। मैं चाहती हूँ कि यह घर मेरा भी लगे।”

यह सुनकर सरोज जी का मन पिघल गया। उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
“ठीक है, आज की चाय तू बना। देखूँ, मेरी बहू के हाथों का स्वाद कैसा है।”


अन्वी ने बड़े मन से चाय बनाई। कप में डालकर सासु माँ को दी। सरोज जी ने जैसे ही पहला घूँट लिया, चाय ज़रा ज्यादा मीठी लगी।

“अरे वाह, बहुत मीठी है।” – उन्होंने हँसते हुए कहा।

अन्वी का चेहरा एकदम उतर गया। वह घबराकर बोली—
“सॉरी माँ, शायद चीनी ज़्यादा डाल दी।”

सरोज जी ने तुरंत उसका हाथ पकड़कर कहा—
“अरे पगली, मैं तो कह रही हूँ कि मीठी चाय का मतलब है मीठा रिश्ता। अगर मिठास ज़्यादा हो भी गई तो कोई बात नहीं, हमारी ज़िंदगी में भी मिठास ऐसे ही बनी रहे।”

इसी बीच पड़ोसन रीना आंटी घर आईं। उन्होंने नई बहू को देखते ही कहा—
“बहू जी, संभलकर रहना। नई-नई बहुएँ तो बड़ी लाड़ली होती हैं, पर फिर असली रंग तो सासू माँ ही दिखाती हैं। यहाँ भी ऐसा ही होगा, देख लेना।”

अन्वी थोड़ा असहज हो गई। लेकिन सरोज जी ने हँसते हुए कहा—
“रीना जी, हम पुराने जमाने की सास नहीं हैं। मेरी बहू मेरी बेटी जैसी है। मुझे इसके दिल का रंग जीतना है, रंग रूप तो दो दिन में फीका पड़ जाता है।”

रीना आंटी चुप होकर चली गईं। अन्वी को लगा जैसे माँ ने उसका मान रख लिया।

रात को जब सब सो गए तो अन्वी को नींद नहीं आई। वह अपने मायके के दिनों को याद करने लगी। उसे याद आया कि उसके बड़े भैया की शादी के बाद क्या हुआ था।

भाभी पूजा दीदी बहुत अच्छी थीं, पर माँ ने शुरू से उन्हें अपनी मर्यादाओं और नियमों में बाँध दिया।

“इतनी देर क्यों हो गई? बहुएँ देर तक नहीं सोतीं।”
“खाना बनाना सीख लो, मायके जैसी आदतें यहाँ मत दिखाना।”
“भैया को बार-बार बाहर मत ले जाया करो।”

ऐसे ही ताने रोज़ चलते रहते। पूजा दीदी का चेहरा हमेशा उतरा-उतरा रहता। शादी के एक साल के भीतर ही भैया-भाभी अलग घर में रहने लगे।

अन्वी ने खुद से वादा किया था कि वह शादी से बहुत डरती है, क्योंकि उसे लगता था ससुराल में हमेशा यही होता है।

लेकिन यहाँ तो बिल्कुल उल्टा था। सरोज माँ का व्यवहार देखकर उसका डर धीरे-धीरे मिट रहा था।

अगले दिन सरोज जी थोड़ी थकी-थकी लगीं। अन्वी ने तुरंत कहा—
“माँ, आज की चाय मैं बनाऊँगी। आप बैठिए।”

चाय लेकर जब अन्वी आई, तो सरोज जी ने कप हाथ में लेते ही मुस्कुरा कर कहा—
“बेटी, पता है चाय का प्याला रिश्तों जैसा होता है। अगर बहुत गरम हो तो जीभ जला देता है, अगर ठंडा हो तो स्वाद नहीं आता। ठीक उतना ही संतुलन चाहिए जितना घर में रिश्तों में चाहिए।”

अन्वी ध्यान से सुन रही थी। उसने मन ही मन सोचा—
काश मेरी मम्मी भी भाभी से ऐसे ही बोलतीं।

शाम को परिवार में सब लोग बैठे थे। तभी अन्वी के हाथ से प्लेट फिसल गई और ज़ोर की आवाज़ के साथ टूट गई। उसके मन में पुराने अनुभव उभर आए—अब तो डाँट पड़ेगी।

लेकिन सरोज जी तुरंत बोलीं—
“कोई बात नहीं बेटी, प्लेट ही टूटी है, तू नहीं। याद रख, घर का सामान टूटे तो चिंता मत करना, पर दिल कभी मत टूटने देना।”

अन्वी की आँखें नम हो गईं। उसने सास के पैर छू लिए।

कुछ दिन बाद मायके से अन्वी की माँ आईं। उन्होंने धीरे से बेटी से कहा—
“सब ठीक है न? तेरी सास कुछ कहती तो नहीं? तू दबकर मत रहना। हमारी पूजा तो आज भी दुखी है अपनी सास से।”

इससे पहले कि अन्वी कुछ कहती, सरोज जी वहीं आ गईं। उन्होंने हँसते हुए कहा—
“अरे बहन जी, मैं तो सोचती हूँ बहू को अपनी बेटी ही मानूँ। बेटी को डाँटकर घर का माहौल क्यों खराब करना?”

अन्वी ने अपनी माँ की ओर देखते हुए कहा—
“माँ, आप जानती हैं, जब प्लेट टूटी थी तो सासू माँ ने क्या कहा? – ‘दिल कभी मत टूटने देना।’ माँ, अगर आप भी पूजा भाभी के साथ ऐसा ही करतीं, तो आज घर बिखरता नहीं।”

अन्वी की माँ चुप हो गईं। उनके गले में शब्द अटक गए। पहली बार उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ।

धीरे-धीरे अन्वी और सरोज जी का रिश्ता इतना गहरा हो गया कि लोग उन्हें माँ-बेटी समझने लगे। जब भी कोई कहता—“तुम्हारी बहू कितनी भाग्यशाली है,” तो सरोज जी तुरंत कहतीं—
“नहीं, मैं भाग्यशाली हूँ जो मुझे ऐसी बेटी मिली।”

अन्वी को भी लगता कि उसे दो माँ मिलीं—एक जन्म देने वाली और दूसरी अपनाने वाली।

एक दिन चाय पीते हुए सरोज जी ने कहा—
“बेटी, चाय के प्याले की तरह रिश्ते भी बार-बार धोकर साफ़ करने पड़ते हैं। अगर मन का मैल जम जाए तो मिठास खत्म हो जाती है। तू हमेशा ध्यान रखना, घर में चाहे कितने प्याले टूट जाएँ, पर दिल का प्याला कभी मत टूटने देना।”

अन्वी ने आँखों में आँसू भरकर कहा—
“माँ, जब तक आप हैं, यह प्याला कभी नहीं टूटेगा। आपने मेरे डर को प्रेम में बदल दिया। आपने मुझे माँ का खोया हुआ साया फिर से दे दिया।”

उस दिन दोनों माँ-बेटी गले लगकर रो पड़ीं।

घर में सामान टूटना स्वाभाविक है, पर दिल टूटना नहीं चाहिए।
अगर सास बहू को बेटी मान ले और बहू सास को माँ, तो रिश्तों की नींव इतनी मज़बूत हो जाती है कि कोई आँधी उसे हिला नहीं सकती।
चाय का प्याला चाहे गिरकर बिखर जाए, पर रिश्तों का प्याला हमेशा संभालकर रखना चाहिए।


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