"रमा मैंनें तुम्हें जो रूपये रखने के लिए दिये थे. दे दो.रजत को पैसों की जरूर है उसे देने है."
"रजत और आप एक ही ऑफिस में काम करते हो.दोनों की एक सी सैलरी है. परिवार भी दोनों का बराबर है फिर उन्हें रूपयों की जरूर क्यों पड़ती रहती है और वो हर बार आपसे ही क्यों मांगते है.आप भी बिना सोचे समझे उन्हें पैंसे दे देते है.इस बार मैं उन्हें देने के लिए पैसे नही दूंगी."
"तुम्हें पता है मुझे न सुनना पसंद नही."
"सुनना पड़ेगा.जिसे आप अपना जिगरी दोस्त समझते हो वो आपको ही लूट रहा है."
"तुम उसे मुझसे ज्यादा जानती हो क्या ? छ साल से एक ही ऑफिस में काम करते है. एक दूसरे को अच्छे से जानते समझते है और पैसों का क्या आज नही तो कल दे देगा."
"आपका तो पता नही पर वो आपको अच्छे से समझते है.तभी तो हर चौथे पांचवें महीने पैसों की जरुरत है कह कर आपसे पैसे ले जाते है.आज से पहले मैं कुछ नही बोली सोच किसी की मदद करने में क्या बुराई.फिर आपका दोस्त है आप अच्छे से जानते होगे."
"है तो जानता तो हूँ."
"अच्छा, आपके दोस्त ने नई कार ली है आपको बताया तो होगा ही."
"तुम्हारा दिमाग खराब है.वो मुझसे पैसे ले कर बच्चों के लिए लेपटॉप लेने की सोच रहा है और तुम कह रही हो उसने कार खरीद ली."
"देखा, नही पता न.मेरी एक सहेली उनकी सोसायटी में रहती है.बहुत पहले मैंने उसे बताया था कि आप दोनों एक ही ऑफिस में काम करते हो.कल उससे फोन पर बात कर रही थी उसी ने बताया कि रजत जी ने नई कार ली है."
"ऐसा कैसे हो सकता है.वो मुझसे झूठ क्यों बोलेगा."
"अगर वो आपको बता देगें तो आपसे पैसे कैसे हड़पेगे.उन्होंने आजतक पहले के उधार लिए पैसे नही दिये.जब भी आप पैसे मांगने की बात करते हो वो आपको कोई नई कथा सुना देते है और आप फिर कभी दे देना कह कर रहने देते हो.आपने घर खरीदते समय उनसे पैसे मांगे थे पर उन्होंने मना कर दिया कि उनके पास पैसे नही है. किशोर मदद करना अच्छी बात है लेकिन उसकी जिसे मदद की जरूर हो.ऐसे झूठे और स्वार्थी इंसान की मदद करके आप उन्हें और प्रोत्साहित कर रहे हो."
"रमा वो दोस्त है और दोस्ती का फर्ज है दोस्तों की मदद करना."
" किशोर ऐसे स्वार्थी लोगों किसी के दोस्त नही होते.ऐसे लोगों को ना बोलना ही ठीक है जो अपने ही दोस्त को ठगते है. पहले आपको उनकी असलियत पता नही थी लेकिन अब पता है. सोच लीजिए आपको क्या करना है."
"हाँ रजत मैं पैसे नही दे पाऊंगा.सॉरी यार" किशोर फोन पर रजत से बोला.
रमा पास खड़ी मुस्करा रही थी.आखिर उसने अपने पति को ऐसे स्वार्थी दोस्त के चुंगल से आजाद कर दिया था.
दोस्तों, माता पिता और पति पत्नी से बड़ा कोई शुभचिंतक नही.इसलिए उनकी बातों, विचारों, सलाह को कभी अनसुना न करें.
शशि ध्यानी
दिल्ली
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