Skip to main content

वो चार दिन

 छोटी-छोटी आंखों में बड़े-बड़े सपने लिए 14 वर्षीय सोनू अपने गांव से भागकर मुंबई आ गया था। मुंबई की ऊंची ऊंची आलीशान इमारतें देखकर बहुत अचंभित था। दिनभर मस्ती में घूमता रहा, वह बहुत खुश था। सोच रहा था, अब पता चलेगा बाबू को, जब देखो मुझे डांटते रहते हैं और जब मैं गाना गाकर प्रसिद्ध हो जाऊंगा तब आएंगे मेरे पास मिलने के लिए।

       इधर-उधर घूमते हुए शाम हो गई। अब सोनू को रात बिताने की चिंता सताने लगी। सड़क पर सोए हुए लोगों के साथ ही लेट गया। सुबह लोगों ने उसे खदेड़ कर वहां से भगा दिया। फिर भी वह खुश था। सोच रहा था आज तो मैं फिल्म स्टूडियो जाऊंगा ही, वहां गाना सुनकर सब मुझसे खुश हो जाएंगे बस फिर तो समझो मेरी निकल पड़ी।

       अच्छे कपड़े पहन कर रास्ता पूछता हुआ बड़ी मुश्किल से शूटिंग वाली जगह पर पहुंचा, पर गार्ड ने उसे अंदर झांकने तक न दिया। अंदर पहुंचकर गाना सुनाना तो बहुत दूर की कौड़ी थी। 

गार्ड के सामने रोता गिड़गिड़ाता रहा, पर कुछ नहीं हुआ। हार कर वापस लोकल ट्रेन में चढ़ा, भीड़ में किसी ने जेब काट दी और 2 जोड़ी कपड़े लाया था, वह भी गए। भूख से आंतें कुल बुला रही थी। घर की, बापू की, सब की बहुत याद आ रही थी। भूखा बेबस पटरी  पर सो गया।

सुबह ना जाने किसने जोर से लात मारी तो उठ बैठा। सुबह फिर भूख नहीं सताना शुरू किया तो मां की याद आ गई। मां कैसे प्यार से कभी मक्का की, तो कभी बाजरे की रोटी गरमा गरम दाल और बैंगन के भरथे के साथ खिलाती थी। तब वो कभी चाव से खा लेता था, तो कभी सौ नखरे दिखाता था। सोनू की आंखों से आंसू बह रहे थे।

आखिर किसी तरह हिम्मत बांध कर उठा और रेलवे प्लेटफार्म पर बूट पॉलिश कर रहे एक लड़के से डरते डरते बोला-"मुझे भी यह सिखा दो"उस लड़के ने उसे घूर कर देखा और फिर ना जाने क्या सोचकर उसने सोनू को शू ब्रश पकड़ा दिया। सोनू उसके सामने खड़े ग्राहक के जूते को अनाड़ियों  की तरह पॉलिश करने लगा। पॉलिश उस आदमी की पेंट पर लग गई और उसने गुस्से में सोनू को कसकर एक थप्पड़ जड़ दिया और उस लड़के ने उसके हाथ से ब्रश छीन कर एक जोरदार धक्का दिया।

दोपहर हो चुकी थी, सोनू को लग रहा था कि वह कहीं बेहोश होकर गिर न पड़े। प्लेटफार्म पर लगे नल से उसने बहुत सारा पानी पी लिया और साइड में जमीन पर बैठ गया। तभी उसने देखा कि एक कुत्ता मुंह में रोटी लिए आ रहा है। सोनू ने उस कुत्ते को डरा कर उससे रोटी छीन ली और खा गया। बाद में उसे अपने ऊपर बहुत शर्म आई। यही सोचते-सोचते रात हो गई कि वापस घर जाकर माफी मांग लूं या यहीं पर कोई छोटा मोटा काम ढूंढ लूं, पर कोई काम करना आता भी तो नहीं है।

वहीं पड़े पड़े उसे नींद आ गई। सुबह फिर चिंता और भूख ने अपना असर दिखाना शुरू किया। उसने अपनी कमीज़ उतार कर गाड़ी साफ करना शुरू किया, तो वहां पहले से गाड़ियां साफ कर रहे लड़कों ने उसे मारकर वहां से भगा दिया। मार खाकर अपनी चोटों को सहलाता समुद्र के किनारे जाकर बैठ गया और लहरों को देखता रहा।

तभी कुछ लोगों की भीड़ वहां आई और यही है, यही है कहकर उस पर टूट पड़ी। उसके बाद किसी ने नहीं सुनी। वह चिल्लाता रहा-"मुझे क्यों मार रहे हो मैंने क्या किया है छोड़ दो मुझे।"भीड़ उसे कूट कर चली गई।

धीरे से हिम्मत करके उठा। शरीर मार के कारण दुख रहा था। पैर से खून बह रहा था। लंगड़ाता लंगड़ाता एक भुट्टा पकाने वाले के पास जाकर बैठ गया। भुट्टे वाले ने कहा-"मैं दूर से देख रहा था लोग तुम्हें पीट रहे थे, क्या किया तुमने?"

सोनू-"मुझे भी समझ नहीं आ रहा कि मुझे क्यों पीटा गया। मैं तो चुपचाप बैठा लहरों को देख रहा था।"

भुट्टे वाला-"अच्छा मैं समझ गया यह वही होगा, जिसके कारण आज तुम पिट गए।"

सोनू-"कौन वही?"

भुट्टे वाला-"वही बेशर्म मंगलू, लोगों की पाकेट और दूसरी चीजें मार लेता है, और जब देखता है कि मेरे पकड़े जाने की नौबत आ गई है तो चोरी का सामान किसी भी अनजान के पास रखकर खुद छिप जाता है या फिर जिसके पास सामान रखता है उसे पीटना शुरू कर देता है और लोग समझते हैं कि चोर को पकड़कर पीट रहा है। सब उसे मारने लगते हैं और वह मौका देखकर माल उड़ा कर चंपत हो जाता है।" सोनू उसकी बात सुनकर बहुत हैरान था।

भुट्टे वाले ने उसे एक भुट्टा खाने को दिया और पुराने कपड़े से उसकी चोटों को पोंछा। सोनू को पहली बार मुंबई में कोई अपना सा लग रहा था। भुट्टे वाले ने उसकी पूरी कहानी सुनी और कहा कि आज रात को मेरी खोली में सो जाना और सुबह मैं तुम्हें कुछ पैसे दूंगा, तुम अपने गांव लौट जाना। घर से भागकर तुमने बहुत गलत किया है। ईश्वर का शुक्र है कि तुम किसी गलत हाथों में नहीं पड़े। अपने गांव जाओ, पढ़ाई लिखाई करो, अपने गाने के हुनर को बढ़ाओ और जब घर वाले राजी हो, तब उनसे पूछ कर आगे कदम बढ़ाओ। "

अगले दिन सोनू ट्रेन में बैठा सोच रहा था कि पिछले 4 दिनों ने उसे जीवन की कितनी बड़ी सच्चाई दिखा दी है।


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...