Skip to main content

कल हम भी इस अवस्था में आयेंगे

 "क्या दीदी मै तो तंग आ गई मम्मी जी की चाय की आदत से.कभी भी किसी भी वक्त चाय पीने की इच्छा करने लगती है.देखो न रात के ग्यारह बज रहे है और उन्हें चाय पीनी है और ऊपर से चाय में दस चीजे डालो.घर में और कोई मसाला चाय पीना पसंद नही करता.हर बार उनकी चाय अलग बनानी पड़ती है और अपनी अलग." देवरानी ज्योति जेठानी राधिका से फोन पर बोल रही थी.

"तो क्या हुआ एक कप चाय ही तो बनानी है और वैसे भी मम्मी जी कभी कभी तो तुम्हारे पास आती है."

"हाँ तो एक साथ सारी कसर भी निकाल देती है.आपने ही उनकी आदत खराब कर रखी है.आपको परेशानी नही होती पर मुझे होती है.मुझसे दो अलग अलग चाय नही बनाई जाती."

राधिका और ज्योति दोनों देवरानी जेठानी अलग अलग शहर में रहती थी वैसे तो सास कमला जी को बड़ी बहू के साथ रहना ही अच्छा लगता था क्योंकि वो काम के साथ साथ जवान की भी मीठी थी.कमला जी का पूरा ख्याल रखती थी जबकि ज्योति काम से जी चुराने के साथ साथ जवान की तेज थी.लेकिन माँ तो माँ होती है.बेटे और पोता पोती का मोह कमला जी को छोटे बेटे के पास खींच लाता.कमला जी का शरीर उम्र के साथ कमजोर होने लगा था. फिर भी राधिका या ज्योति के बीमार पड़ने या कही जाने पर या बच्चों की पसंद का खाना बनने में खाने पीने में न नुकुर नही करती थी.जो मिल जाता खुशी से खा लेती.लेकिन अब ठंड उनसे सहन नही हो पाती थी.एक दिन राधिका ने चाय में अदरक, इलायची, दालचीनी,काली मिर्च, तुलसी डाल कर उनके लिए चाय बनाई. जिससे उन्हें ठंड से बड़ी राहत मिली.तब से राधिका उनके लिए  ऐसी ही चाय बनाती थी और जब कमला जी ज्योति के पास कुछ दिन रहने गई तो राधिका ने ज्योति को भी सासूमाँ के लिए ऐसी चाय बनाने को कह दिया था.

"ऐसा नही कहते.मम्मी जी पहले ही हमारी वजह से खाने पीने में कितने समझौते करती है तो क्या एक कप चाय हम उनकी पसंद की नही बना सकते.ज्योति ये मत भूलों कि एक दिन हमें भी इसी अवस्था से गुजरना है.तब तुम्हारी बहू तुम्हारे साथ ऐसा करेगी तो तुम्हें कैसा लगेगा.वो बुजुर्ग हो गई है. ठंड सह नही पाती.अगर मसाला चाय पी कर उन्हें अच्छा महसूस होता है तो तुम मना कर रही हो."

"सॉरी दीदी.मैं भूल गई कि एक दिन हम भी इसी अवस्था में आयेंगे. अब से मैं मम्मी जी को शिकायत का मौका नही दूंगी और कोशिश करूँगी आप की तरह अपनी सोच सकारात्मक रखूं."

"ठीक है." राधिका ने फोन रख दिया उसे खुशी थी कि अब सासूमाँ छोटे बेटे के घर भी मजबूरी में नही खुशी खुशी रहेगी.

शशि ध्यानी

दिल्ली


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...