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बेइज्जती

 सरला जी कमरे में बैठकर टीवी देख रही थीं, तभी उनको याद आया कि अब तक उनकी बहू के घर से त्योहार का सामान नहीं आया। उन्होंने अपनी बहू रश्मि को आवाज लगाते हुए कहा,

"बहू, इधर तो आना जरा।"

"जी माजी, आपने बुलाया... कुछ काम था क्या?"

"अरे बहू, इस साल अभी तक तुम्हारे मायके से होली नहीं आई। पिछले साल तो तुम वहां थी तो कोई बात नहीं, लेकिन इस बार तो भेजनी चाहिए ना तुम्हारे मायके वालों को। होली आखिर उनका करते हुए बनता है। मेरी सभी सहेलियों के यहां बहू के मायके से होली के उपहार आ गए हैं, सिर्फ तुम्हारे ही मायके से अभी तक कुछ नहीं आया है। सबने अगर होली के दिन मुझसे पूछ लिया तो मैं क्या जवाब दूंगी?"

इतना सुनकर रश्मि ने कहा,
"मांजी, लोग सब गिले-शिकवे भूलकर एक-दूसरे के साथ मिलकर त्योहार मनाते हैं, लेकिन हम लोगों ने हर त्योहार को लेन-देन का त्योहार बना दिया है। कहां और किस ग्रंथ-पुराण में यह लिखा है कि बहू के घर से बिना होली आए होली नहीं मनाई जाएगी?"

सरला जी ने गुस्से में रश्मि से कहा,
"हर बात में तुम ज्यादा लेक्चर मत दिया करो। जितना बोला जाए, उतना ही सुना करो और किया करो, समझी? तुम्हारे मां-बाप ने तो पहले ही मेरा नाक कटवा दिया था। शादी में कोई भी ढंग की चीज न देखकर तब मैंने कैसे-कैसे बहाना बनाकर तुम्हारे मायके वालों की इज्जत रखी थी। अब तुम चाहती हो कि मैं हर बार समाज में सबके सामने बहाना करती रहूं?"

रश्मि को पहले से ही पता था कि सास को किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है, वो बस अपना हुक्म चलाना जानती हैं।

रश्मि सोचने लगी — उसकी मां ने पहले ही फोन करके बता दिया था,
"बेटी, इस बार हम लोग होली तुझे नहीं भेज पाएंगे, क्योंकि तुम्हारे पापा की तबीयत ठीक नहीं है। और तुम्हारे भाई-भाभी से कहकर कोई फायदा नहीं, क्योंकि तुम तो जानती हो, जिनको मां-बाप से मतलब नहीं, उनसे कोई उम्मीद रखना बेकार है।"

दरअसल, रश्मि के बड़े भाई-भाभी उसकी शादी से पहले ही अलग हो गए थे और घर से कोई मतलब नहीं रखते थे। बचत के पैसों और जैसे-तैसे जुगाड़ करके रश्मि के पापा ने उसकी शादी कर दी थी।

रश्मि शाम का खाना बना रही थी और मन ही मन सोच रही थी — लोग कहते हैं समाज बदल गया है, लेकिन आज भी त्योहार और रीति-रिवाज के नाम पर लड़की वालों से लेने की रस्मों में कोई बदलाव नहीं आया है। आज भी लोग बहू को दहेज देने वाली मशीन क्यों समझ लेते हैं?

रात में जब रश्मि अपने कमरे में गई तो अपने पति रमन से बिना कुछ बोले, चुपचाप बिस्तर पर करवट बदलकर सो गई। हमेशा बोलते रहने वाली रश्मि आज चुपचाप देखकर रमन ने कहा,
"क्या हुआ? इतना उदास क्यों हो?"

रश्मि ने सिर्फ दो टूक जवाब दिया,
"कुछ नहीं... बस ऐसे ही मन नहीं है।"

तब रमन ने रश्मि के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा,
"रश्मि, इतना तो हम एक-दूसरे को जानते हैं कि कब कौन उदास है, यह हम दोनों ही अच्छे से महसूस कर सकते हैं। इसी को तो जीवन साथी कहते हैं। प्लीज बताओ क्या बात है?"

इतना सुनते ही रश्मि की आंखों से आंसू छलक पड़े। उसने रमन को दिन की सारी बातें बता दीं।

तब रमन ने मुस्कुराते हुए कहा,
"अच्छा, तो यह समस्या है! देखो रश्मि, मम्मी की बातों को दिल से मत लगाया करो। परिवार की कुछ बातों को इग्नोर भी करना पड़ता है। तो बस ऐसी बातों को इग्नोर करके तुम खुश रहा करो।"

तब रश्मि ने कहा,
"कोई कैसे खुश रहेगा, रमन, जब कोई किसी को दिनभर ताने मारता रहेगा? मैं इतनी महान नहीं कि हर बार हर बात इग्नोर कर सकूं। मैं इंसान हूं और मुझे बुरा लगता है।"

अगले दिन रात में रमन ने अपनी मां से कहा,
"मां, यह लो, 1000 रुपये रश्मि के पापा ने मेरे अकाउंट में भेजे हैं। फोन करके बोला कि आपको देने के लिए, क्योंकि वो इस बार घर पर नहीं आ पाएंगे। उनकी तबीयत शायद ठीक नहीं है। उन्होंने आपको फोन लगाया था, शायद लगा नहीं, इसलिए मुझे फोन करके बोल दिया।"

सरला जी ने कहा,
"अच्छा, कोई बात नहीं। नहीं आ पाएंगे तो पैसे डालकर अच्छा ही किया। अब अपनी पसंद का सामान ले लूंगी।"

रमन जैसे ही वहां से उठकर अपने कमरे में आया, पीछे से रश्मि भी कमरे में आ गई। उसने कहा,
"रमन, तुम्हें क्या जरूरत थी झूठ बोलने की?"

रमन ने कहा,
"कैसा झूठ?"

रश्मि ने कहा,
"अभी जो तुमने माजी से बोला कि तुम्हारे अकाउंट में पापा ने पैसे भेजे हैं... आखिर कब तक झूठ बोल पाओगे? और क्या फायदा इसका? जिस दिन तुम्हारा यह झूठ मांजी के सामने आ गया, तब क्या होगा? यह भी सोचा है तुमने?"

तब रमन ने रश्मि को अपनी बांहों में लेते हुए कहा,
"देखो रश्मि, जो तुम कह रही हो, बिल्कुल सही है। लेकिन ना तो हमारा जीवन कोई फिल्म है जो अभी हम मां को समझाएंगे और मां को बात समझ आ जाएगी, और ना ही कोई कहानी, जो अच्छी-अच्छी बातें बोल देने से पूरी हो जाएगी। अभी तो मुझे यही ठीक लगा, तो मैंने यह कर दिया। बात का बाद में देखेंगे। और अगर तुम्हें और मां को खुश रखने के लिए, इस घर की सुख-शांति बनाए रखने के लिए, अगर पूरी उम्र यह झूठ बोलना पड़े, तो मैं बोलने के लिए तैयार हूं।"

इतना कहते ही रमन की नजर दरवाजे की तरफ गई। देखा, सामने सरला जी खड़ी हैं। उसने घबराकर कहा,
"मां, आप यहां? क्या हुआ? अंदर आइए ना, दरवाजे पर क्यों खड़ी हैं?"

कमरे में अंदर आते हुए सरला जी ने रश्मि को गले लगाते हुए कहा,
"बहू, होली मुबारक हो! तुम सही कह रही हो। आखिर कब तक यह झूठा दिखावा हम करते रहेंगे? त्योहार पर नेग लेने-देने की प्रथा को बंद करके हमें उसे प्यार और खुशियों के साथ मनाने की शुरुआत कहीं न कहीं से तो करनी ही होगी। अब मैं खुद के घर से ही शुरुआत करूंगी।"

फिर रमन की तरफ देखते हुए बोलीं,
"और तू इतना बड़ा हो गया कि मां से झूठ बोलना सीख गया, और साथ में मेरी बहू को भी झूठ बोलना सिखा रहा है? वैसे मैं तो तुझे पूछने आई थी कि ये तो 25 हजार हैं, तूने इतने पैसे क्यों दिए, लेकिन यहां तो बात ही कुछ और थी। बेटा, एक झूठ को छुपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं, यह हमेशा याद रखना। वैसे, मैं तुझे यह पैसे वापस तो नहीं दूंगी, क्योंकि ये तेरे झूठ बोलने की सजा है। इससे हम सास-बहू शॉपिंग करेंगे, समझा?"

"अरे मां, वो 5,000 एक्स्ट्रा तो मेरे जेब खर्च के थे जो मैंने निकाले थे। वो तो दे दो, कम से कम। आप सास-बहू के चक्कर में मेरा तो नुकसान हो गया।"

रमन के इतना कहते ही रश्मि और सरला जी हंसने लगीं।


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