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रिश्ते निभाने के लिए बुद्धि नहीं, बल्कि दिल की शुद्धि होनी चाहिए..!!

 हाँ भैया, परसों नए मकान पर हवन है। रविवार का दिन है तो छुट्टी है, आप सभी को आना है। मैं गाड़ी भेज दूँगा।”

छोटे भाई लक्ष्मण ने बड़े भाई भरत से मोबाइल पर बात करते हुए कहा।

भरत बोला, “क्या छोटे, किराए के किसी दूसरे मकान में शिफ्ट हो रहे हो?”

लक्ष्मण बोला, “नहीं भैया, यह अपना मकान है, किराए का नहीं… अपना मकान।”

भरत के मुँह से भरपूर आश्चर्य के साथ निकला—
“छोटे, तूने बताया भी नहीं कि तूने अपना मकान ले लिया है।”

लक्ष्मण ने हँसते हुए कहा, “बस भैया, कैसे हो गया।” और फोन काट दिया।

“अपना मकान… बस भैया।”
यह शब्द अब भरत के दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहे थे।

भरत और लक्ष्मण दो सगे भाई थे और उन दोनों में उम्र का अंतर करीब 15 साल था। लक्ष्मण जब करीब साल भर का था तभी उनके माँ-बाप की एक दुर्घटना में मौत हो गई थी। अब लक्ष्मण के पालन-पोषण की सारी ज़िम्मेदारी भरत पर आ गई। इसी चक्कर में उसने जल्द ही शादी कर ली ताकि लक्ष्मण की देखरेख ठीक से हो जाए।

प्राइवेट कंपनी में क्लर्क का काम करते हुए भरत की तनख्वाह का बड़ा हिस्सा दो कमरे के किराए के मकान और लक्ष्मण की पढ़ाई-खर्च में चला जाता था। इसी कारण शादी के कई साल बाद तक भी भरत ने बच्चे पैदा नहीं किए। कहते हैं न—जितना बड़ा परिवार, उतना ज्यादा खर्चा।

पढ़ाई पूरी होते ही लक्ष्मण की नौकरी एक अच्छी कंपनी में लग गई और फिर जल्द ही उसकी शादी भी हो गई। बड़े भाई के साथ रहने की जगह कम पड़ने के कारण उसने एक दूसरा किराए का मकान ले लिया। वैसे भी अब भरत के दो बच्चे थे—एक बड़ी लड़की और एक छोटा लड़का।

लक्ष्मण के मकान लेने की खबर जब भरत ने अपनी पत्नी को बताई, तो उसकी आँखों में आँसू आ गए। वह बोली—
“देवर जी के लिए हमने क्या नहीं किया। कभी अपने बच्चों को अच्छे कपड़े नहीं दिलवाए, कभी घर में महंगी सब्ज़ी या महँगे फल नहीं आए। दुख इस बात का नहीं है कि उन्होंने अपना मकान ले लिया, दुख इस बात का है कि यह बात उन्होंने हमसे छुपा कर रखी।”

रविवार की सुबह लक्ष्मण द्वारा भेजी गाड़ी भरत के परिवार को लेकर एक सुंदर से मकान के आगे खड़ी हो गई। मकान को देखकर भरत के मन में एक हूक-सी उठी। मकान बाहर से जितना सुंदर था, अंदर से उससे भी ज्यादा सुंदर था। हर तरह की सुख-सुविधा का पूरा इंतज़ाम था। मकान के दो हिस्से देखकर भरत ने मन-ही-मन कहा—
“देखो, छोटे को अपने दोनों लड़कों की कितनी चिंता है। दोनों के लिए अभी से एक जैसे दो हिस्से तैयार कराए हैं। पूरा मकान डेढ़ करोड़ रुपए से कम का नहीं होगा। और एक मैं हूँ जिसके पास जवान बेटी की शादी के लिए लाख-दो लाख रुपए का भी इंतज़ाम नहीं है।”

मकान देखते समय भरत की आँखों में आँसू थे, जिन्हें उसने बड़ी मुश्किल से बाहर आने से रोका। तभी पंडित जी ने आवाज़ लगाई—
“हवन का समय हो रहा है। मकान के स्वामी हवन के लिए अग्निकुंड के सामने बैठें।”

लक्ष्मण के दोस्तों ने कहा—“पंडित जी तुम्हें बुला रहे हैं।”

यह सुनकर लक्ष्मण बोला—
“इस मकान का स्वामी मैं अकेला नहीं हूँ। मेरे बड़े भाई भरत जी हैं। आज मैं जो भी हूँ, सिर्फ़ और सिर्फ़ इनकी बदौलत हूँ। इस मकान के दो हिस्से हैं—एक उनका और एक मेरा।”

हवनकुंड के सामने बैठते समय लक्ष्मण ने भरत के कान में फुसफुसाते हुए कहा—
“भैया, बिटिया की शादी की चिंता बिलकुल मत करना। उसकी शादी हम दोनों मिलकर करेंगे।”

पूरे हवन के दौरान भरत अपनी आँखों से बहते आँसू पोंछते रहे। हवन की अग्नि में धुएँ का नामोनिशान नहीं था, पर भरत जैसे पिघल रहे थे।

इंसान तो आज भी मिल जाते हैं, पर लक्ष्मण जैसे भाई विरले ही मिलते हैं आजकल इस जहान में।


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