"शिवानी, टिकट कंफर्म हो गई है, अब तुम पैकिंग शुरू कर दो। दो साल हो गए हमें घर गए हुए। अम्मा-बाबूजी कितना खुश होंगे बच्चों से मिलकर!" अमन ने ऑफिस से आकर कहा।
"ठीक है अमन, मैं तैयारी करती हूं, तुम भी अपना सारा सामान दे दो," शिवानी ने जवाब दिया।
शिवानी और अमन अपने घर जाने का प्रोग्राम बना रहे थे। "अमन, तुम तो पिछले साल घर गए थे, मैं तो जा नहीं पाई। बच्चों के बोर्ड के पेपर थे। अम्मा जी भी बीमार रहती हैं, अब काम कौन करता है? घर में कोई कामवाली लगाई है कि नहीं?" शिवानी ने पूछा।
"मैंने बोला तो था उनसे, पैसे भी लेकर आया था। अब तो जाकर ही पता चलेगा," अमन ने जवाब दिया।
शिवानी और अमन बच्चों के साथ ट्रेन पकड़कर घर पहुंचे। पूरी रात का सफर—दिल्ली से इलाहाबाद—बहुत ही थका देने वाला था। घर के बाहर पहुंचते ही अमन ने गेट खोला। तभी अम्मा जी के खांसने की आवाज आई—"आ गए बेटा! कब से इंतजार कर रही थी।"
"अरे अम्मा, तुम बर्तन क्यों मांज रही हो? कामवाली नहीं आती क्या? मैं तो उसको लगवा कर गया था।"
अम्मा बोलीं, "अरे बेटा, ये कामवालियां बड़ी बदमाश होती हैं। रोज छुट्टी करती हैं और काम भी ढंग से नहीं करतीं। मुझे तो नहीं आता इनका काम, समझ में ही नहीं आता क्या है। मैं तो अपने आप ही कर लेती हूं, पैसा भी मुंह फाड़कर मांगती हैं।"
"अरे अम्मा, अपनी उम्र भी तो देखो, कितना बीमार रहती हो। फिर आपको पैसों की क्या चिंता? हम दे तो रहे हैं। अच्छा लगता है इस उम्र में बर्तन घिस रही हो, लोग भी क्या कहते होंगे!" पर अम्मा जी पर अपनी बेटी की बात का कोई असर नहीं हुआ, वह तो बर्तन चमकाने में लगी हुई थीं।
शिवानी और अमन को बहुत बुरा लग रहा था। तभी कुछ देर में अमन के चाचा-चाची आ गए। अम्मा जी को बर्तन मांजते हुए देख कर बोले—"अरे अमन, हद कर दी तुमने! इतनी अच्छी नौकरी है तुम्हारी, सर्वेंट नहीं आती? तुम्हारी मां इस उम्र में बर्तन और झाड़ू-पोछा कर रही हैं? क्या इसी दिन के लिए तुम्हें पढ़ाया-लिखाया था?"
अमन बहुत शर्मिंदगी महसूस कर रहा था, पर उसके पास कोई जवाब नहीं था। उसने कहा, "चाचा जी, अम्मा जी ही कोई कामवाली नहीं लगातीं, मैं तो पैसे भी देकर जाता हूं, पर वो मेरी मानती ही नहीं हैं," अमन ने धीरे से सुर में कहा।
तभी चाची ताना मारते हुए बोलीं, "बहू को शर्म नहीं आ रही, बुजुर्ग सास बर्तन मांज रही है! क्या जमाना आ गया है, आजकल तो बहू-बेटे का कोई सुख नहीं है!"
बेचारी शिवानी सफर से थकी हुई, बर्तन मांजने बैठ गई। अभी बहू बर्तन मांज के हटी ही थी कि अम्मा जी आईं और बोलीं, "अरे बहू, अब सारा दिन बर्तन ही मांजोगी, खाना बनेगा कि नहीं?" बेचारी शिवानी रसोई की तरफ चल पड़ी। पूरे घर के लिए खाना बनाया, कोई भी रसोई में मदद को नहीं आया।
अम्मा जी ने अमन के आने पर अपने रिश्तेदारों को बुला रखा था। शिवानी ने रसोई का काम खत्म किया, अब शाम के 4:00 बज गए। शिवानी खाना खाने बैठी ही थी कि अम्मा जी आईं और बोलीं, "बहू, खाना खाकर बर्तन मांज लेना, मेरी रसोई में झूठे बर्तन नहीं रखे जाते।"
बेचारी शिवानी थककर, बदन दर्द कर रहा था, पर क्या करती! आंगन में बर्तन लेकर बैठ गई, क्योंकि अम्मा जी का फरमान था कि झूठे बर्तन रसोई में नहीं रहेंगे, बाहर बैठकर मांजने होंगे।
अब तो शिवानी को ससुराल में आना किसी सजा से कम नहीं लग रहा था। वह सोच रही थी कि आखिर क्यों ये सासू मां अपनी जिद पर अड़ी रहती हैं, अपने पुराने विचारों को क्यों नहीं छोड़तीं। अगर बेटा-बहू उन्हें आराम देना चाहते हैं, तो उन्हें यह गवारा क्यों नहीं होता? वो क्यों चाहती हैं कि घर का सारा काम बहू ही करे? क्यों उन्हें कामवाली लगाना फिजूल खर्ची लगता है? अगर बेटा उनके आराम के लिए पैसे खर्च करके कामवाली लगाता है, तो उन्हें बुरा क्यों लगता है?
शिवानी ने पूरे 15 दिन ससुराल में बड़ी ही मुश्किल से काटे, क्योंकि यहां आकर उसका सारा दिन रसोई और बर्तन मांजने में ही जाता था। अपने घर आकर शिवानी ने चैन की सांस ली, क्योंकि इन 15 दिनों में शिवानी पर काम का इतना बोझ था कि वह बीमार सी हो गई थी। अब तो उसने अमन से साफ कह दिया कि अब वो कभी ससुराल नहीं आएगी। "अम्मा जी को आना है तो यहीं बुला लिया करो, क्योंकि जब तक अम्मा जी के पुराने विचार ऐसे ही चलते रहेंगे, तब तक कुछ नहीं हो सकता।"
शिवानी और अमन को वापस आए 6 महीने हो गए। अब तो फोन पर ही बात होती थी। होली आने वाली थी। अमन चाहता था कि वह घर जाए, पर उसे पता था कि शिवानी को फिर वही सब सहना पड़ेगा। तभी उसका मोबाइल बजा—उसके बाबूजी का फोन था। "बेटा, तुम जल्दी से बहू को लेकर घर आ जाओ। तुम्हारी अम्मा सीढ़ी पर पोछा लगा रही थी, उसका पैर फिसल गया, कूल्हे की हड्डी टूट गई है।"
अमन ने तुरंत बाबूजी को दिलासा दिया, "हम आते हैं, आप चिंता मत करो।" अमन और शिवानी तत्काल में रिजर्वेशन कराकर घर पहुंच गए। बिस्तर पर अम्मा जी दर्द से कराह रही थीं। शिवानी ने अम्मा जी के पैर छुए और बोली, "आप जल्दी ठीक हो जाइए, मैं एक महीना रहूंगी, अमन और बच्चे वापस चले जाएंगे।"
"अरे बहू, अमन क्या खाएगा इतने दिन? बच्चे भी कैसे रहेंगे?"
"मां जी, मैंने कामवाली को बोल दिया है, वह एक महीने खाना भी बना देगी, आप चिंता मत करो।" शिवानी ने घर आते ही अम्मा जी की देखभाल शुरू कर दी। उसने एक कामवाली भी लगा ली, जो घर की सफाई और बर्तन साफ करती। शिवानी अम्मा जी के पास बैठकर बातें कर रही थी, तभी अम्मा जी बोलीं, "बहू, रसोई साफ किया? नहीं न, बर्तन ऐसे ही पड़े होंगे। अब तुम तो मेरी सेवा में लगी हो, सारा घर गंदा पड़ा होगा।"
"नहीं मां जी, आप टेंशन मत लो, मैंने कामवाली लगा ली है, सब अच्छे से करती है।"
एक महीना पूरा हो गया, अम्मा जी भी ठीक हो गईं। सबसे पहले वह रसोई में गईं। वहां चमकते हुए बर्तन और सफाई देखकर हैरान रह गईं। पूरा घर बहुत ही साफ-सुथरा था। अब वह सोच रही थीं कि वह बेकार में ही जिद पर अड़ी रहती थीं। इसी कारण हुआ कि जितना पैसा वह बचाना चाहती थीं, उससे कहीं ज्यादा उनके हॉस्पिटल में खर्च हो गया। वो सोच रही थीं—'इससे तो बेचारी कामवाली को ही दे देती, गरीब की मदद भी हो जाती।'
तभी अमन भी आ गया शिवानी को लेने। अम्मा जी बोलीं, "बहू ने मेरी खूब सेवा की है बेटा।" तभी अमन बोला, "अम्मा, अब जा रहा हूं, पर आप कामवाली मत हटाना। देखा न, आपकी जिद की वजह से आपको कितनी परेशानी हुई।"
"अरे हां बेटा, बहू ने मेरी आंखें खोल दीं। अब मुझे समझ आ गया कि बच्चों की बात माननी चाहिए। मेरी जिद बेकार ही थी। अगर प्यार से काम लो, तो कामवाली भी खूब अच्छा काम करती है।" पास खड़ी शिवानी मुस्कुरा रही थी। अमन भी अब खुश था, आखिर अम्मा जी की बेकार की जिद तो खत्म हो गई थी।
तभी अम्मा जी ने बोला, "बेटा, होली पर घर तो आओगे न?"
"क्यों नहीं मां जी, अब तो हम हर त्योहार आपके साथ ही मनाएंगे।"
अम्मा जी बहुत खुश थीं। शिवानी और अमन भी अब चिंता से मुक्त हो गए थे, क्योंकि शिवानी को अब ससुराल में काम का कोई बोझ नहीं था।
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