"समधन जी आपको कूक्कू (पोता) के मुंडन संस्कार में दो चार दिन पहले आना है. आराम से बैठ कर बात करेगे. मेहमान आ जायेगे तो बैठने का समय नही मिलेगा."
"कोशिश करेगें समधन जी."
"नही ..नही कोशिश नही आपको परिवार सहित पहले आना है.लो बहू तुम भी कह दो समधन समधी से.शायद बेटी की बात मान ले." राशि की फोन पकड़ाते हुए सासूमाँ भानुमति जी बोली.
"क्या बात है मम्मी."
"देखो न तुम्हारी सास पहले आने के लिए बोल रही है.लेकिन हम मुंडन के दिन ही आ पायेगे."
"मम्मी जो आपको सही लगे वही करिये. किसी के दबाव में आने की जरूरत नही."
"बहू क्या कहा समधन जी ने."
"मम्मी कह रही थी कि पहले नही आ पायेगे.पापा की तबीयत ठीक नही रहती. यहाँ आप सब भी परेशान हो जायेगें."
"जैसी उनकी मर्जी. लेकिन पहले आ जाते तो अच्छा था." बड़ी मायूसी से भानुमति जी बोली.
राशि सोच रही थी. पैंसे वाला हाथ हो तो सब अपने हो जाते है.आज जो सास ससुर उसके मम्मी पापा को फोन करके आने के लिए अनुय विनय कर रहे है.कल तक उन्हें पूछते भी नही थे.सच में बीते कल और आज में कितना अंतर है.कहते है इंसान सुख के दिन भले ही भूल जाये पर दुख के दिन चाह कर भी नही भूला पाता.राशि भी बीते कल की यादों में खो गई.
जब राशि की शादी जतिन से हुई तो उसके दोनों छोटे भाई पढ़ रहे थे.एक पापा थे जिनकी आमदनी पर पूरा परिवार पलता था.राशि की शादी में अपने समर्थ के हिसाब से उसके मम्मी पापा जितना दहेज दे सकते थे दिया.लेकिन भानुमति जी खुश नही थी.
"इतना कम सामान.बहू क्या तुम उनकी बेटी नही हो.इतना तो हम अपनी बेटी को त्यौहार, जन्मदिन पर दे देते है.दहेज कम मिलने पर उसे भानुमति जी तानें सुनने पड़े.वो अपना सारा गुस्सा दिनभर उसे काम में लगा कर निकालती या उसके मम्मी पापा को भला बुरा कह कर.जो मन करता बोलने से नही हिचकती.घर में किसी की हिम्मत नही थी कि वो भानुमति जी को समझा सकें. जतिन देख कर भी सब बातों से अंजान बना रहा.क्योंकि उसकी सैलरी इतनी नही थी कि राशि को ले कर अलग रह सकें.राशि भी अपने मम्मी पापा को बता कर उनका दिल नही दुखाना चाहती थी जानती थी उसके मम्मी पापा चाह कर भी उसकी सास की ख्वाहिश पूरी नही कर पायेंगे.समय बीतता रहा.किस्मत ने साथ दिया और राशि के मायकेवालों के अच्छे दिन आ गये. एक भाई ने अपना ग्रोसरी स्टोर खोल दिया जो बहुत अच्छा चलने लगा और छोटा भाई इंजीनियरिंग बन गया. उनके दिन पलट गये.साथ ही सास ससुर की नजरे भी.अब जब भी राशि के मम्मी पापा उससे मिलने या त्यौहार पर आते साथ में बहुत सामान लाते.वही बहू जिसे भानुमति जी कल तक गरीब की बेटी कहते नही थकती थी आज सबसे प्यारी हो गई थी.
"बहू कहाँ खोई हो.जल्दी तैयार हो जाओ. मार्केट जाना है समधी समधन जी और रेणु (ननद) के परिवार वालों के लिए कपड़े लाने."
"जी मम्मी जी " राशि बीते कल से आज में आ गई.
शशि ध्यानी
दिल्ली
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