Skip to main content

गुलाबी शॉल

 माँ की तबियत ,अचानक से ख़राब हो गयी, खबर सुनकर ,शशि का मन बेचैन हो उठा। उसने तुरन्त अपने पतिदेव, सुधीर के ऑफिस में कॉल किया और  टिकिट बुक करने को कहा।

सुधीर ने आई. आर .टी .सी. की वेबसाइट में सर्च किया, शशि को बताया कि अभी कन्फर्म टिकिट नही मिल पा रही है, जब मिल जायेगी,  तुम तब चली जाना । किन्तु शशि नहीं मानी।

"मुझे तो बस ,आज ही जाना है" जब तक माँ से मिल ना लूँ,मन को शांति नहीं मिलेगी" ,कहकर फोन रख दिया...

आनन फानन में अपना कुछ सामान बटोरकर, जल्दी से शुटकेस तैयार किया।

जाड़े के दिन थे, सो एक ओवर कोट पहनकर, उसके ऊपर ,उसने अपनी पसन्दीदा 'गुलाबी शॉल' डाल ली ।

शाम पाँच बजे ट्रेन थी,स्टेशन पहुँची तो,बिलासपुर  के लिए ट्रेन आ चुकी थी । प्लेटफार्म पर भागती हुई ट्रेन की ओर गई और जो डिब्बा सामने दिखा, उसमें ही वो चढ़ गयी।

किस्मत से ट्रेन में, खिड़की के पास उसे एक खाली सीट भी दिखाई दे गयी । उसनें अपना बैग सीट के नीचे खाली जगह देख, व्यवस्थित कर दिया। सीट पर बैठने के बाद  खिड़की के बाहर झाँका तो, अचानक उसकी नज़र प्लेटफ़ॉर्म पर बैठे एक छोटे बच्चे पर पड़ी। लगभग तीन चार बरस का ,साँवला सलोना, मासूम सा बच्चा, मैले कुचैले फ़टे कपड़ों में, ठण्ड में ठिठुर रहा था।

ट्रेन खड़ी थी,शशि को उसे देख दया हो आयी । मन किया  ट्रेन से उतकर ,अपनी शॉल उसे ओढ़ाकर आ जाएं। फिर उसे  लगा,कहीं ट्रेन न चल पड़े...

इसी कश्मकश में उसनें,सामने सीट पर बैठे पैसेन्ज़र से पूछा,"भाईसहाब, क्या बता सकते हैं,ट्रेन छूटने में अभी कितना वक़्त है"

" जी, अभी तो टाइम है ,

10 मिनिट बाद  ट्रेन चलना शुरू होगी...आज बिफ़ोर आ गयी है" उन्होंने बताया ।

ओह अच्छा, जी धन्यवाद ! कहकर, वह  फिर खिड़की से उस बच्चे को देखनें लगी।

अपनी गुलाबी शॉल को कंधे से उतारा..हाथ में ली , कश्मीरी कढ़ाई को सहलाया,अचानक से उसे याद आया ,

"अरे! ये तो वही शॉल है ,जो हनीमून पर ,शिमला की मॉल रोड से सुधीर ने ख़रीदा था और कैसे स्नेह से उसके कांधे पर ओढ़ा दिया था..."

मधुर स्मृति में खोकर ,उस शॉल को ,बच्चे को ओढ़ाने का, उसनें इरादा ही बदल दिया...।

बच्चे पर तरस भी बहुत आ रहा था, लेकिन खुद को वह समझाती रही ,मन ही मन तसल्ली देती रही...

"कितने लोग तो आ जा रहे है प्लेटफार्म में । कोई न कोई उस बच्चे की सुध ले ही लेगा और उसकी माँ भी तो होगी ,यहीं कहीं ,भीख वीक माँग रही होगी। वो ही आकर संभाल लेगी उसे !

तभी ट्रेन चल पड़ी।  शशि की नज़रें , खिड़की के बाहर, उस बच्चे को देखती रही...

जैसे जैसे ट्रेन स्पीड पकड़ती गयी , वो बच्चा भी पीछे छूटता गया, आँखों से ओझल होता चला गया।

माँ के घर पहुँची तो,माँ की हालत देख शशि की आँखे नम हो गयी । उनकी सेवा में वह पूरी तरह से जुट गयी।

लेकिन, गाहे बगाहे वो 'प्लेटफॉर्म वाला बच्चा'  उसे याद आ ही जाता...

जब भी वो अपनी गुलाबी शॉल को  देखती, ओढ़ने का मन न करता...मन में 'आत्मग्लानि' सी  होने लगती।

"कैसे ,इतनी स्वार्थी बन गयी ?"

एक शॉल तक न दे सकी ,उस  गरीब को.."

"ऐसे तो जाने कितने तीज -त्यौहार ,जप-तप ,पूजा- पाठ करती रहती हूँ, मन मे खूब दया भाव भी रखती हूँ। फिर भी ,कितना मोह कर बैठी ,इस शॉल से मैं "

"सुधीर तो मुझे सुन्दर से सुन्दर और भी शॉल दिला सकते हैं...मैं भी न ,सच में ,बहुत छोटे दिल की निकली, सोंचकर मन ही मन खुद पर खीझती भी रही...."

अक्सर ही  घूम फिर कर, शशि को वह ठण्ड में ठिठुरता हुआ बच्चा,  स्मरण हो आता...जिससे बेचैन सी हो जाती वह।

ख़ूब सोच -विचार कर,  उसने आखिर निश्चय कर लिया  कि

चाहे जो हो ,वापसी में ,स्टेशन पर रुककर ,सबसे पहले उस बच्चे को शॉल देगी, तभी घर जायेगी ।

शायद ! तब कहीं जाकर ही,उसके कलेजे में ठंडक मिले...

सप्ताह भर बाद,माँ की हालत में सुधार दिखा। माँ के कहनें पर ही, उसनें वापसी का प्लान बनाया।

आखिर! वह दिन भी आ गया ,जब उसकी ट्रेन वापिस नागपुर स्टेशन पहुँची। स्टेशन आने के पूर्व ही ,उसने अपनी उस गुलाबी शॉल को ऊपर निकाल कर रख लिया था।

सुधीर, स्टेशन लेने आये थे...उन्हें बताया ,तो वे भी शशि के साथ, बच्चे को प्लेटफार्म में  ढूंढने लगे ।

बच्चा कहीं दिखाई न दिया..कुछेक बुक स्टॉल,टी-स्टॉल वालों से पूछा ,तो वे हैरत में देखते ,फिर मना कर देते....सुधीर ने झिड़की दी,

" तुम भी न शशि ,थकी हारी आयी हो , कहाँ कहाँ ढूंढोगी,इतना बड़ा स्टेशन है, जाने कहाँ होगा वो..."

"चलो ,अभी घर चलो ,फिर शॉल देने आ जायेंगे, किसी दिन ।

लेकिन शशि ने तो ,जैसे संकल्प कर रखा था ,किसी भी हाल में आज ही शॉल देना है । सो सुधीर की सारी कोशिशे... नाक़ाम.. ..।

आखिरकार, बेमन से,झुंझलाते हुए, सुधीर ने सामान 'क्लॉक रूम'में रखवाया ।  फिर सारे प्लेटफ़ॉर्म में ढूँढ़ते रहे उसे ,पर वो बच्चा कहीं न मिला और न ही किसी से उसकी कोई जानकारी मिली।

थक हार कर, उदास मन से अन्ततः सामान उठाकर ,वे घर आ गए.....।

समय बीतता गया...जब कभी भी, शशि का रेल्वे स्टेशन जाना होता ,आँखे उस बच्चे को ही खोज़ती, पर वो बच्चा, दोबारा कभी न दिखा।

लगभग एक साल बाद, उनका ट्रांसफर हो गया । नागपूर से बनारस शिफ्ट होना पड़ा उन्हें।

हर साल जाड़ा आता , शशि अपनें सारे ऊलन के कपडों को  धूप दिखाती।

अपनी उस "गुलाबी शॉल" को देख, उसका मन दुःख सा जाता...उसे छूती तो ,जो कोमल अहसास पहले हुआ करते, अब न होते, हाँ ! मन में 'टीस' ज़रूर उठती...

उस शॉल को, इतने सालों में, फिर कभी ,ओढ़ ही नहीं पायी वह। कई बार शॉल को निकाला भी ,पर ओढ़ने का मन ही न किया।  वापस तह करके, अलमारी में रख देती ,वहीँ पड़ी रहती .....

बनारस में शशि ,अपने पति सुधीर के साथ ,'अस्सी घाट' पर, शाम को अक़्सर ही जाया करती थी।

सीढ़ियों में बैठ, गंगा के पवन जल को घंटो निहारने में, उसे बड़ा सुकून मिलता था । एकदिन,शशि और सुधीर घाट की सीढ़ियों पर बैठे हुए थे ,तभी शशि का ध्यान, एक पागल सी औरत की ओर गया , जो कटें फ़टे चीथड़ों में लिपटी हुई , ठण्ड की सिरहन से ठिठुर रही थी ।

शशि ,बार बार उसे ही देखती जा रही थी। अचानक वह उठ  खड़ी हुई और उसने सुधीर से  धीरे से कहा-- "सुनो न, मैं घर जाकर, आती हूँ, आप इस पगली को देखते रहना, कहीं चली न जाएं "

"क्यों क्या हुआ" सुधीर ने पूछना चाहा।

"बस अभी कुछ मत पूछों,घर जाकर आती हूँ...."

"तुम भी न शशि ,जाने क्या सनक सवार हो जाती है तुम्हें"

"हद करती हो यार! घूमने आयी हो तो बैठो न शांति से...."

सुधीर ने उसे झिड़की दी।तो

"प्लीज़sss प्लीज़ss हाथ जोड़कर आपसे विनती करती हूँ...बस यूँ गयी और यूँ आयी...  मान भी जाओ न ",कहकर शशि ने हाथ जोड़ लिए।

सुधीर चुप ही रहा....उसकी चुप्पी को, हाँ समझकर, जल्दी से ऑटो  की ओर भागी । ऑटो में बैठ...ऑटो वाले को पहले ही हिदायत दी।

"भईया घर जाकर तुंरत ही, वापस इसी घाट में आना है ,सो घर के बाहर इन्तज़ार करना "

"मैं जल्द ही  वापस आ जाउंगी....."

घर के सामने, ऑटो रुकवाकर ,कहीं वह भाग न जाये ,डर से, बिना पैसे दिए, तेज कदमों से घर पहुँची,ताला खोलकर, सीधे बेडरूम में गयी और अपनी आलमारी से "गुलाबी शॉल" निकाल ली। उसे एक पॉलीथिन बैग में डाला, फिर तेज़ कदमों से बाहर निकलकर ,ऑटो की ओर देखा,ऑटो वहीँ खड़ा था।  वह जाकर ऑटो में बैठ गयी।  चलिए भैया जल्दी चलिए वापिस अस्सी घाट, ऑटो वाले से कहा।

ऑटो में बैठे हुए शशि , मन ही मन भगवान को मनाती जा रहा रही थी ,"हे भगवान ! बस वो 'पगलिया' मिल जाये...निकल न जाये कहीं...!"

"इनका क्या भरोसा ,रोके न रोके...! झुंझला जो रहे थे...."

"हे गंगा मैया ! वो पगलिया मिल जाये तो, एक सौ एक दीपक छोडूंगी आज ही ..सच्च में.... "

"भैया थोड़ा, तेज़ चलाओं न",ऑटो वाले से भी वह  बार बार मनुहार करती जा रही थी ।

घाट पहुँची तो देखा , सुधीर उस पगलिया से थोड़े दूर पर ही बैठे  थे और वो पगलिया मज़े से कचौरी खा रही थी....

शशि उसके पास गयी और झट से पूरी शॉल को खोलकर उसे ओढ़ा दिया....

वो पगलिया तो बेसुध सी कचौरी खाने में मगन  थी...

शशि ने बड़ी तसल्ली के साथ उसे देखा, जैसे जंग जीत ली हो।  फिर सुधीर के पास पहुँची तो, उसे देख सुधीर ने मुस्कुराते हुए कहा,"देखो ! रोक रखा था न, तुम्हारी उस 'अमानत' को"...

"कचौरी भी लाकर दी, ताकि रुकी रहे वो "

सुनकर ,शशि की आँखो में से मोती झरनें लगे...

"अरे! क्या हुआ" कहकर ,  सुधीर उठकर खड़े हुए... दुलार करते हुए उन्होंने शशि के कंधे को पकड़ा,उसे सँभालते हुए नदी की  सीढ़ियों से उतरते हुए कहा,

चलो गंगा जी में पृच्छालन कर लें। गंगा जी के करीब जाकर, माँ गंगा को देख, शशि का मन शांत हो गया। अपूर्व आनंद की अनुभूति होने लगी । लगा जैसे वर्षों से सीने पर रखा कोई भारी बोझ हट गया हो ,जैसे किसी ऋण से मुक्त हो गयी हो वह आज।

"कुछ कहोगी नहीं शशि  "

"इतनी ख़ामोश क्यों हो गयी"

सुधीर के पूछने पर , धीरे से उसने कहा,

"सुनो न, मुझे  एक सौ एक दीपक प्रज्जलवित कर, गंगा में प्रवाहित करना है "

"एक सौ एक" ? आश्चर्य से सुधीर ने पूछा ,

"हाँ पूरे "एक सौ एक"

"आज ही...अभी.. "

सुधीर ने जैसे भेद समझ लिया हो, हँसकर शशि की ओर देखकर कहा---"मेरी पगलिया"...


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...

दो परिवारों का मान

  शाम का समय था। घर के दरवाज़े पर गाड़ी रुकी और भीतर से बेटा राघव और बहू किरण उतरे। दोनों अभी-अभी किरण के मायके से लौटे थे, जहाँ उसके छोटे भाई की सगाई हुई थी। माँ शांति देवी दरवाज़े पर ही खड़ी थीं। बेटे को देखते ही बोलीं— “आ गए बेटा? कैसा रहा तेरे ससुराल का प्रोग्राम? कैसी रही तेरी साली की सगाई?” राघव वहीं माँ के पास बैठ गया। लेकिन किरण का चेहरा बुझा-बुझा था। वह सीधे अपने कमरे की ओर बढ़ गई। शांति देवी ने तंज कसते हुए कहा— “ये महारानी का मुँह क्यों फूला हुआ है?” राघव ने हँसते हुए कहा— “अरे मम्मी, पूछिए ही मत। क्या खाक प्रोग्राम था वहाँ! मुश्किल से पचास-साठ लोग भी नहीं आए थे सगाई पर। और मम्मी, वहाँ के तौर-तरीके भी… बिल्कुल देहाती। खाने का मेन्यू देखकर तो मुझे हँसी ही आ गई। फिर ऊपर से सिर्फ़ दस हज़ार का लिफाफ़ा पकड़ा दिया। और इनकी होने वाली भाभी? बस मत पूछो, बिल्कुल गँवार लग रही थी।” राघव की बातें सुनकर शांति देवी के चेहरे पर भी व्यंग्य भरी मुस्कान आ गई। “अरे बेटा, अब ये लड़की मिल गई, वो भी गनीमत है। तीन साल से तेरा रिश्ता अटका हुआ था।” राघव ने ठहाका मारते हुए कहा— “हाँ माँ, य...