आज मेरी बहू ने गृहप्रवेश किया.मेरा पद और कद दोनों बड़ गये.अभी तक मैं बहू थी और आज के बाद सास कहलाऊंगी. सुकन्या अपने कमरें में सास कुंती जी की फोटो हाथ में लिए अतीत के गलियारों में चली गई.
अड़तालीस साल पहले सुकन्या कुंती जी की बहू बन कर आई थी. हिरणी सी चंचल, लापरवह, बातूनी. वही कुंती जी अनुशासन प्रिय,सख्त और समय की पाबंद.दोनों जैसे नदी के दो किनारे.शायद पति के असमय निधन ने उन्हें सख्त और कठोर बना दिया था.वो काम में जरा भी कोताही पसंद नही करती थी.उनकी नजरों से छोटी से छोटी गलती छुप नही पाती थी. वो खुद हर काम में निपुण थी शायद इसीलिए सब से ऐसी ही उम्मीद करती थी.
परिवार के सभी लोग उन पर आंख मूंद कर भरोसा करते थे.मुश्किल से मुश्किल परेशानी का उनके पास हल होता था. लेकिन अपने सख्त स्वभाव के कारण सभी लोग उन्हें पीठ पीछे खडूस बुलाते थे.
एक तो सासूमाँ, ऊपर से सख्त.सासूमाँ के डर से सुकन्या ध्यान से काम करती फिर भी कोई न कोई गलती हो जाती.फिर उन्हें कुंती जी के कोप का भाजन बनना पड़ता. उनकी डाँट से बचने के लिए धीरे धीरे सुकन्या को भी अनुशासन में रहने की आदत हो गई.समय पर काम खत्म करना, हर काम को ध्यानपूर्वक करना उन खडूस सासूमाँ की वजह से संभव हो पाया था.
कुंती जी ने सुकन्या को पूरी तरह बदल दिया.सुकन्या लापरवह बहू से जिम्मेदार बहू बन गई.घर गृहस्थी के काम में पारंगत हो गई.परिवार वाले उनकी तारीफ करते थकते नही थे.ये सब कुंती जी की वजह से संभव हो पाया था.लेकिन जैसे नदी के दो किनारे साथ हो कर भी दूर होते है .वैसे ही कुंती जी और सुकन्या सास बहू ही बने रहे. प्यार,विश्वास,अपनेपन का रिश्ता उनके बीच कभी अंकुरित नही हो पाया.कुंती जी सुकन्या के लिए जिन्दगी भर खडूस सासूमाँ ही बनी रही.
"सासूमाँ आपने मुझे कोई कमी नही होने दे,पर जिस माँ के प्यारे के लिए मैं जीवन पर तरसती रही आप वो प्यार नही दे पाई. आप के साथ रहते रहते मैं भी आपके जैसी सख्त और कठोर बन गई.अब मैं भी अनुशासन और समय की पाबंद हो गई. लापरवाही मुझे भी बिल्कुल पसंद नही.
लेकिन मैं अपनी बहू के लिए अपना व्यवहार बदलने की कोशिश करूँगी.बहू की गलती पर उसे डाँटूगी भी. क्योंकि जानती हूँ कही न कही उसे आगे चल कर मजबूत इंसान बनाने में मदद करेगी.उसे गलती दोहराने से रोकेगी. लेकिन साथ ही दोनों के बीच प्यार,विश्वास का अंकुर भी प्रस्फुटित करूँगी.कभी सास बहू की तकरार होगी तो कभी माँ बेटी सा प्यार.तब शायद मैं उसकी खडूस सासूमाँ के साथ साथ प्यारी सासूमाँ भी बन जाऊं." भविष्य के सपने बुनते हुए सुकन्या कुंती जी की तस्वीर से बोली.
शशि ध्यानी
दिल्ली
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