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यकीन

 मैं सच बता रही हूं, कल रात रोहित भैया स्नेहा भाभी के लिए एक बड़ा पैकेट लेकर आए। लगता है उन्हें घर का खाना अच्छा नहीं लगता। मुझे पूरा यकीन है, कुछ खाने-पीने का ही सामान था। अब आज पड़ोस के लोग देखने वाले तो यही कहेंगे— "आप बहू को खाने को नहीं देतीं, इसलिए पति छुपकर अपनी पत्नी के लिए चीजें लाता है"। मम्मी, बदनामी सिर्फ आपकी होने वाली है, अभी रोक लीजिए वरना…

बेटी अंजलि ने अपनी मां को मिर्च-मसाला लगाते हुए यह बात बताई।

प्रमिला जी कान की ज़रा तेज़ थीं, तुरंत अपनी बेटी की बातों में आकर चिल्लाईं—
"ऐसा क्यों भला? हमारे घर में तो सब कुछ बनता है। मैं तो स्नेहा बहू का कितना ख्याल रखती हूं, उसके खाने-पीने पर कभी पाबंदी नहीं लगाती। बल्कि कितनी बार वो अपनी पसंद का खाना खाती है, और तो और कितनी बार तुम लोग ऑनलाइन पिज़्ज़ा, पास्ता भी मंगवाते हो, मौके पर बाहर जाकर भी खाते हो। तो फिर क्यों अच्छा नहीं लगता होगा? और मैंने इस स्नेहा को पहले ही समझा दिया था, हमारे घर में कुछ भी छुपाकर नहीं आएगा। जो आएगा, सबके सामने आएगा। फिर भी उसने ऐसी हरकत की, मेरे बेटे को बरगलाने की कोशिश की!"

प्रमिला जी अपनी बेटी की बात सुनकर गुस्से से तमतमा उठीं, जिसे देखकर अंजलि मन ही मन मुस्कुरा रही थी क्योंकि उसने सास-बहू के बीच में फूट डालने का काम कर दिया था।

रोहित और स्नेहा की शादी को 1 साल हुआ है और वो प्रेग्नेंट है। अब आए दिन उसका मन कभी खट्टा-तीखा तो कभी मीठा खाने का करता। कभी-कभी खुद का बनाया खाना भी उसे पसंद नहीं आता, तो दही-अचार से रोटी खाकर संतुष्ट हो जाती, तो कभी पूरी-हलवा ही खा लेती थी।

इसी परेशानी का फायदा उठाकर अंजलि ने उसके खिलाफ अपनी मां के कान भर दिए।

क्यों? जानते हैं…

कुछ दिन पहले अंजलि अपनी भाभी के कमरे में पहुंची—
"भाभी, क्या मुझे अपनी घड़ी दे सकती हैं? मुझे कॉलेज जाना है, शाम को लौटा दूंगी।"

स्नेहा एक बहुत ही सूझ-बूझ वाली लड़की थी, इसीलिए उसने अपनी ननद से बड़े प्यार से कहा—
"अंजलि, बुरा मत मानना, वह घड़ी मेरी मौसी अमेरिका से लाई थीं और मुझे बहुत पसंद भी है, वह मैं तुम्हें नहीं दे सकती। तुम चाहो तो कुछ और मांग लो।"

"वाह भाभी, दो कौड़ी की घड़ी मांगी तो मना कर दिया। अब कुछ और क्या मांगूं? अभी आपकी साड़ी मांगूंगी तो कहेंगी— बुआ की साड़ी है, और पर्स मांगूंगी तो कहेंगी— दीदी ने दिया है। क्या मुझे ममता समझ रखा है? आपको अपना समझकर मांग लिया था, मगर आपका दिल तो बहुत छोटा निकला।"

"ऐसा मत कहो अंजलि, पिछली बार मैंने तुम्हें लहंगा दिया था, तुमने पार्टी में खाने-पीने के दाग लगाकर खराब कर दिया। उसके बावजूद भी मैंने अपनी सबसे सुंदर सैंडल दी थी, वह भी तुम तोड़कर ले आई थी, तब भी मैंने कुछ नहीं कहा। वह घड़ी मेरी मौसी की है, इसलिए तुम चाहो तो शाम को अपने भैया के संग जाकर अपने लिए पसंद से सुंदर सी घड़ी ले लो।"

"हद होती है भाभी! घर में चीज़ रखी है, वह तो दे नहीं सकतीं, भैया के नाम का एहसान बताती हैं। जाइए, मुझे नहीं चाहिए आपकी घड़ी। मुझे तो पहले ही पता था, आपको मुझसे कुछ लेना-देना नहीं, आपको तो बस भैया प्यारे हैं। हम लोग आपके अपने थोड़े ना हैं!"

इतना कहकर अंजलि दरवाज़ा पटककर अपने कमरे से चली गई। बस, इसी बात से चिढ़कर उसने स्नेहा से बदला लेने का मन बना लिया और अपनी मां से डांट पड़वाने का प्लान बना लिया।

उसने अपनी मां को भड़का दिया, ताकि सास-बहू के बीच में तू-तू मैं-मैं हो जाए और मज़ा आए।

गुस्से में प्रमिला जी स्नेहा के कमरे में पहुंचीं तो देखा, एक डिब्बा पलंग के सिरहाने रखा था। उसे देखकर उनका शक यकीन में बदल गया कि रोहित स्नेहा के लिए छुपाकर कुछ खाने के लिए लाया था।

वो बोलीं—
"स्नेहा बहू, हमने तुम्हें किस बात की कमी रखी है, जो तुम मेरी बेटी से चोरी-छुपे खाने-पीने की चीज मंगवाती हो? जबकि मैंने तुम्हें पहले ही कह दिया था, हमारे घर में यह सब नहीं चलता। जो करना है, तुम मुझे बता कर भी सब मंगवा सकती हो, फिर यहां छुपकर घर में सामान लाना क्यों? अभी भी वक्त है, सुधार जाओ।"

स्नेहा अचानक से अपनी सास की बातें सुनकर हड़बड़ाते हुए बिस्तर से उठी—
"मांजी, आप क्या कह रही हैं? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा।"

"हां, तुम्हें क्यों समझ में आएगा? तुमने मेरी बेटी को गुलाम जो बना लिया है, अब तुम जैसे चाहोगी वैसे ही नाचेगा। और इस घर में कल को दो चूल्हे भी हो जाएंगे क्योंकि तुम्हें हमारी रसोई का खाना पसंद नहीं आता। इसलिए चुगली कर अपने पति से छुपकर खाना मंगवाती हो। सही कहते हैं लोग, आजकल की लड़कियां सास-ससुर के नियम-कायदे में रहना नहीं चाहतीं, उनकी सेवा नहीं करना चाहतीं, बस उन्हें तो अपना पति प्यारा है, उसे काबू में करने के लिए साम, दाम, दंड, भेद लगा देती हैं।"

चिल्लाने की आवाज़ सुनकर ससुर राकेश जी कमरे में आए और बोले—
"ऐसा क्या हो गया जो तुम अपनी बहू पर चिल्ला रही हो? कोई बात है तो आराम से भी तो बोल सकती हो। और अगर रोहित कुछ लाया भी है, तो इसमें गलत क्या है? बहू का मन इन दिनों कुछ भी खाने का कर सकता है, इतना तो तुम समझो।"

"नहीं जी, मैं कुछ नहीं समझूंगी। समझना इसे पड़ेगा। घर मेरा है और यहां इसकी मनमानी नहीं चलेगी। अरे, यह कोई अकेली है जो बच्चा पैदा करने वाली है? मैंने भी दो बच्चे जनें हैं, मगर ऐसी हरकतें नहीं कीं, किसी को पता नहीं था।"

अचानक रोहित बाथरूम से बाहर निकला और बोला—
"मां, सुधारने की जरूरत बहू को नहीं, बेटी को है।"

भाई को अचानक सामने देख अंजलि घबरा गई। उसे लगा भाई घर पर नहीं है, तब तक भाभी की क्लास लगा ली जाए।

"क्यों, गलती तो बहू की है, बेटी को क्यों कुछ बोलना?"

"मां, आप तो जानती हैं, स्नेहा को कभी भी एसिडिटी और उल्टियां हो जाती हैं। कल रात खाना खाने के बाद उसे उल्टियां हो गईं, फिर भी वो चुपचाप सोने की कोशिश करने लगी। अचानक बोली, 'कुछ मिल जाता तो मुंह का स्वाद ठीक हो जाता।' मैंने सोचा, आपको जगा कर आते का हलवा बनवाऊं, पर देखा आप सो रही थीं, इसलिए मैं खुद उसके लिए गाजर का हलवा बाजार से ले आया। और जब इसे खिलाने लगा तो कहने लगी, 'नहीं, मम्मी जी को यह बिल्कुल पसंद नहीं आएगा कि मैं अकेले चुपचाप कुछ खाऊं। वो मेरे लिए कितना कुछ बनाती हैं, मेरा बहुत ध्यान रखती हैं, मैं उनका दिल नहीं दुखाऊंगी। आप यह हलवा रख दीजिए, कल सुबह हम सब मिलकर खाएंगे। मेरे लिए ठंडा दूध ला दीजिए, वही पी लूंगी।' इसलिए वो बंद डिब्बा ऐसे का ऐसा ही रखा है। शायद आपकी लाडली बिटिया ने मुझे बाजार से आते हुए देख लिया, इसलिए आपके कान भरकर यह बखेड़ा खड़ा कर दिया।"

"आप दोनों के बीच गलतफहमी फैलाकर अपनी भाभी को डांट पड़वाने की कोशिश कर रही थी, जो कि बिल्कुल गलत है। पिछली बार भी आपको सामान न देने की बात पर कितना भड़काया था, तब भी आपने स्नेहा को न जाने क्या-क्या नहीं सुनाया।"

"मां, स्नेहा मुझे इसकी हर आदत के बारे में बताती है, पर हम इसकी हर गलती को नादानी समझकर माफ कर देते हैं। अब आप ही फैसला कीजिए किसका क्या करना है, वरना सच में गलतफहमियों के बीच वो कल ही आपके घर में दो चूल्हे करवा देगी।"

प्रमिला जी ने बेटी अंजलि को एक जोरदार थप्पड़ लगाने ही वाली थीं कि स्नेहा ने उन्हें रोक दिया। मगर गुस्से से बोली—
"कॉलेज का आखिरी साल है, पढ़ाई पर ध्यान दो और अपने पैरों पर खड़े होने की सोचो। ऐसे घर में कलह मचाकर बुरी ननद बनने से अच्छा है एक अच्छा इंसान बनो। आइंदा बिना सोचे-समझे अपनी भाभी के बारे में बोला तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"

अंजलि ने भी अपनी भाभी-भैया से माफी मांगी और कहा—
"आगे से इस तरह की कोई गलती नहीं होगी।"

स्नेहा ने उसके आंसू पोंछे और बोली—
"अगर तुम्हारा होने वाला भतीजा-भतीजी अपनी बुआ को ऐसे रोते हुए देखेगा तो रूठ जाएगा, इसलिए मुस्कुराओ। और यह लो, मैंने तुम्हारे लिए अपनी घड़ी से भी सुंदर घड़ी मंगवाई है।"

यह देखकर अंजलि को बहुत आत्मग्लानि हुई और तुरंत अपनी भाभी के गले लगकर सारे गिले दूर कर लिए।


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